News

राजनैतिक ‘सुधार’ या सत्ता का नया हथियार

  • 130वां संविधान संशोधन विधेयक और लोकतंत्र की असली परीक्षा
  • अपराधमुक्त राजनीति की आड़ में सत्ता का नया औजार
  • न्याय का सिद्धांत और निर्दोषता पर हमला, दोष सिद्ध होने से पहले ही सजा
  • धीमी अदालतें बनाम तेज राजनीति सत्ता को लाभ, न्याय लंबित
  • जनादेश से बड़ा एजेंसियों का शिकंजा लोकतंत्र की जड़ें हिलाने वाला प्रावधान
  • असली अपराधों पर खामोशी किसान, मजदूर और बेरोजगार के सवाल गायब
  • उद्योगपति बनाम आंदोलनकारी कानून का असली निशाना कौन
  • सत्ता का केंद्रीकरण और लोकतंत्र का संकट चुने हुए नेताओं की जगह एजेंसियों का राज

 

लोकसभा में 20 अगस्त 2025 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जब 130 वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया तो माहौल तालियों और नारों से गूंज उठा। सरकार ने दावा किया यह कानून राजनीति को अपराधमुक्त करेगा, जनता का भरोसा लौटाएगा और लोकतंत्र को मजबूत बनाएगा। विधेयक कहता है अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री लगातार 30 दिन जेल में रहता है और उस पर ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें 5 साल या उससे अधिक की सज़ा हो सकती है, तो उसका पद खत्म माना जाएगा। अगर प्रधानमंत्री जेल में हैं तो 31वें दिन पद स्वतः समाप्त। अगर मुख्यमंत्री या मंत्री जेल में हैं तो भी वही नियम लागू होगा। सरकार इसे संविधान की खामी दूर करने वाला संशोधन बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था सचमुच लोकतंत्र को मजबूत करेगी? पहली नजर में यह कदम साफ-सुथरा लगता है। लगता है कि अपराधी नेता अब सत्ता का सुख नहीं भोग पाएंगे। लेकिन गहराई में जाने पर तस्वीर उलट है। यह संशोधन राजनीति को साफ करने से ज्यादा सत्ता को नियंत्रित करने का औजार बन सकता है। लोकतंत्र की जड़ें तभी मजबूत होती हैं जब न्याय का सिद्धांत, निर्दोष मानने की धारणा और जनता का जनादेश सुरक्षित रहे। लेकिन इस संशोधन से यह सब खतरे में पड़ सकता है।

 

अपराधमुक्त राजनीति का दावा सिर्फ दिखावा

सरकार का पहला दावा है कि यह संशोधन राजनीति से अपराधियों को बाहर करेगा। लेकिन यह दावा आधा सच है। राजनीति में अपराधी इसीलिए आते हैं क्योंकि व्यवस्था उन्हें पैदा करती है। चुनावों में जीतने के लिए धन, मांसपेशी शक्ति और सत्ता के संरक्षण की जरूरत होती है। उद्योगपति चुनाव फंडिंग करते हैं, अपराधी वोट दिलाते हैं, और बदले में सत्ता उन्हें संरक्षण देती है। यानी अपराध और राजनीति का रिश्ता केवल बुरे व्यक्तियों का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। यह संशोधन उस असली समस्या को छूता तक नहीं। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए चुनाव सुधार नहीं हुआ। राजनीतिक फंडिंग पर कोई रोक नहीं लगी। मुकदमों को तेज़ी से निपटाने की कोई गारंटी नहीं है। इसके बजाय सरकार कहती है कि “अगर मंत्री जेल में है तो 30 दिन बाद उसका पद खत्म।” लेकिन जेल में जाना और अपराध सिद्ध होना अलग-अलग चीजें हैं। यही वजह है कि यह कानून असली सुधार की बजाय जनता को दिखावे में फंसाने का खेल है।

निर्दोष मानने की धारणा पर हमला

न्याय का सबसे बुनियादी सिद्धांत है निर्दोषता की धारणा जब तक अदालत दोष सिद्ध न करे, तब तक कोई अपराधी नहीं है। यानी जब तक अदालत दोष सिद्ध न कर दे, तब तक कोई अपराधी नहीं। मंत्री केवल जेल में रहने भर से पद गंवा देगा। दोष सिद्ध होने की जरूरत नहीं। सिर्फ गंभीर अपराध में आरोप लगने और 30 दिन जेल में रहने से ही राजनीतिक करियर खत्म हो सकता है। सत्ता पक्ष चाहे तो किसी भी विपक्षी को गंभीर धाराओं में फंसाकर जेल भेज सकता है। अदालत में मुकदमा 10 साल चले, पर 30 दिन में पद गया। निर्दोष मानने की धारणा खत्म हो जाएगी। यह न्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार है।

धीमी न्याय-व्यवस्था और तेज राजनीतिक लाभ

भारत की अदालतें लाखों मामलों से लदी हैं। किसी मुकदमे का फैसला आने में 10-15 साल लग जाते हैं। अरविंद केजरीवाल महीनों से जेल में रहे। अभी तक अदालत ने दोष साबित नहीं किया। हेमंत सोरेन को भी ईडी ने गिरफ्तार किया, लेकिन मामला अधूरा है। महाराष्ट्र के नवाब मलिक और अनिल देशमुख लंबे समय जेल में रहे, बाद में अदालत ने कहा सबूत पुख्ता नहीं।
अगर यह संशोधन पहले होता तो ये सब मुख्यमंत्री/मंत्री 30 दिन में पद से बाहर हो जाते। भले ही अदालत बाद में निर्दोष मान ले, तब तक उनका राजनीतिक जीवन खत्म हो चुका होता। यानी यह संशोधन अदालत की धीमी गति और सत्ता की तेज राजनीति का घातक मेल है।

जनता की चुनी हुई सरकार बनाम एजेंसियों का शिकंजा

लोकतंत्र का आधार है कि सरकार जनता को जवाबदेह हो। लेकिन यह संशोधन जनता को नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों को निर्णायक बना देता है। ईडी, सीबीआई, एनआईए जैसी एजेंसियों पर हमेशा सत्ता के दुरुपयोग के आरोप रहे हैं। विपक्षी नेताओं पर छापे, गिरफ्तारी और लंबी हिरासत आम बात है। सत्ता पक्ष के नेता शायद ही कभी निशाने पर आते हैं। अगर एजेंसियां किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को जेल भेज दें तो 30 दिन में पद खत्म, यानी जनता का जनादेश अब एजेंसियों की मेहरबानी पर टिका होगा। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हत्या है।

असली अपराध पर खामोशी

सरकार कहती है कि वह जनता का भरोसा बचा रही है। लेकिन जनता पर रोज जो अपराध ढाए जा रहे हैं, उन पर यह संशोधन चुप है। किसानों को कर्ज में डुबाकर आत्महत्या की ओर धकेलना, मजदूरों को न्यूनतम वेतन से वंचित करना, बेरोजगारी की आग में युवाओं को झोंकना, शिक्षा और स्वास्थ्य को अमीरों के कब्जे में छोड़ना क्या ये अपराध नहीं हैं पर इन अपराधों पर कोई मंत्री जेल नहीं जाता। क्योंकि यह सत्ता की नीतियों का हिस्सा हैं।

उद्योगपतियों बनाम आंदोलनकारियों का फर्क

कानून और नैतिकता कभी तटस्थ नहीं होते। बड़े उद्योगपतियों के आर्थिक अपराध अरबों-खरबों में होते हैं, लेकिन वे शायद ही जेल जाते हैं। वहीं किसी आंदोलनकारी पर धारा 124 ए या यूएपीए लगा दी जाए तो वह आसानी से पांच साल की सजा वाली श्रेणी में आ जाता है। नतीजा यह कि यह संशोधन गरीब, विपक्षी और असहमत आवाजों को ही ज्यादा प्रभावित करेगा।

सत्ता का केंद्रीकरण और लोकतंत्र का संकट

संविधान संशोधन तभी न्यायसंगत होता है जब वह सत्ता और जवाबदेही में संतुलन बनाए। लेकिन यह संशोधन सत्ता को और केंद्रीकृत करता है। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी को भी ‘सत्ता से हटाने’ का आधार बना दिया गया है, पर यह हटाना जनता का नहीं, एजेंसियों का फैसला होगा। यानी लोकतंत्र के चुने हुए प्रतिनिधि जनता से नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों के सामने जवाबदेह होंगे।

राजनीति को अपराधमुक्त करना है तो असली सुधार

तेज न्याय प्रक्रिया मुकदमे 6 महीने से ज्यादा न चलें। एजेंसियों को स्वतंत्रता हो ईडी, सीबीआई को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त किया जाए। चुनाव सुधार पैसे और कारपोरेट फंडिंग पर लगाम लगे। गिरफ्तारी राजनीति का हथियार न बने। सत्ता जनता की उत्तरदायी बने, न कि कारपोरेट या एजेंसियों की। तभी लोकतंत्र सचमुच साफ होगा, वरना यह संशोधन सिर्फ सत्ता का नया डंडा बनेगा।

* 130वां संविधान संशोधन : 30 दिन जेल मंत्री पद खत्म।
* पहली नज़र में साफ-सुथरा, पर असल में सत्ता के हित में सुरक्षित।
* न्याय सिद्धांत का उल्लंघन : दोष साबित होने से पहले ही सजा।
* धीमी अदालतें, तेज राजनीति : विपक्षी नेताओं को आसानी से सत्ता से बाहर किया जा सकेगा।
* जनादेश बनाम एजेंसियां : जनता की चुनी सरकार एजेंसियों के शिकंजे में।
* असली अपराध पर खामोशी : किसान-मजदूर-विरोधी नीतियों पर कोई सजा नहीं।
* कारपोरेट और आंदोलनकारी का फर्क : बड़े उद्योगपति बचते हैं, आंदोलनकारी फंसते हैं।
* सत्ता का केंद्रीकरण : लोकतंत्र कमजोर, दमन मजबूत।
* जरूरी असली सुधार : न्याय-प्रक्रिया तेज, एजेंसियां स्वतंत्र, चुनाव-व्यवस्था पारदर्शी।

संविधान संशोधन 130 का असली चेहरा

संविधान संशोधन 130 का असली चेहरा यह है कि यह लोकतंत्र को मजबूत करने की बजाय कमजोर करता है। अपराधियों को राजनीति से बाहर करना जरूरी है, लेकिन केवल आरोप या हिरासत के आधार पर किसी को सत्ता से बाहर करना न्याय नहीं, बल्कि दमन है। यह संशोधन तब तक कारगर नहीं होगा जब तक मुकदमों का निपटारा तेज न हो, एजेंसियां सत्ता से मुक्त न हों, चुनावों में धनबल और कारपोरेट का हस्तक्षेप खत्म न हो। लोकतंत्र का असली मतलब है जनता की इच्छा। जनता ने जिसे चुना, वही सत्ता चलाए। एजेंसियों का काम न्याय देना है, सत्ता तय करना नहीं। अगर यह संशोधन जनता की ताकत को कमजोर करता है और सत्ता को और केंद्रीकृत करता है, तो यह सुधार नहीं, बल्कि लोकतंत्र पर हमला है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button