राहुल गांधी एक दर्जे के राजनैतिक मूर्ख, ऐसे तो पा चुके सत्ता का सुख
अथ श्री कांग्रेस कथा : अड्डम–बड्डम–गड्डम पार्टी की बिहार महागाथा

● राहुल गांधी एक दर्जे के राजनैतिक मूर्ख, ऐसे तो पा चुके सत्ता का सुख
● अथ श्री कांग्रेस कथा : अड्डम–बड्डम–गड्डम पार्टी की बिहार महागाथा
● टाइमिंग की टांय टांय फिस्स : राजनीति नहीं, गली क्रिकेट भी नहीं खेल पाए
● भारत जोड़ो यात्राएं : चलने में 10 हजार किमी, समझ में 10 कदम भी नहीं
● चुनाव आयुक्त वाला मौका : कांग्रेस को नींद प्यारी, लोकतंत्र भारी
● पप्पू यादव प्रकरण : कांग्रेस में बाहुबली सलाहकार युग का आगमन
● सीमांचल के चार सितारे : बड़े पद, छोटी सोच, और शून्य परिणाम
● कन्हैया कुमार : बेगूसराय में ‘क्रांति’ को 30 हजार वोटों की पटखनी
● राहुल बाबा के कारनामे : इमिरती-मछली-जूता बनवाने का महाअभियान
● एक तरफ अमित शाह का अथक प्रबंधन, दूसरी तरफ राहुल का दक्षिण अमेरिका भ्रमण
कांग्रेस का बिहार चुनाव में 6 सीटों पर सिमटना किसी दुर्घटना का परिणाम नहीं था। यह एक सुविचारित, योजनाबद्ध, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक गड़बड़ी अभियान का चरम था। यह वही कांग्रेस है जो राजनीति को उतनी गंभीरता से लेती है जितनी कोई गुस्से में पत्नी के सामने गलती मानने वाला पति हां हां, कर लेंगे… देख लेंगे… अच्छा ठीक है न! मगर बिहार में जनता ने कह दिया देख लिया, अब हट लिया। कांग्रेस अपने बूढ़े सलाहकारों, ऊंची पदों पर बैठे केवल-फोटो-खिंचाऊ नेताओं, और बाहरी पप्पू-नेतृत्व वाले फार्मूले के साथ चुनाव लड़ने उतरी, और वही हुआ जिसकी उम्मीद देश के सबसे पुराने मजाक को भी नहीं थी। पार्टी बिहार में अड्डम-बड्डम-गड्डम होकर रह गई।
राजनीति का पहला सिद्धांत : टाइमिंग सही, वरना गेंद बल्ले से नहीं… आपकी किस्मत से टकराती
कांग्रेस बिहार में क्रिकेट खेलने उतरी थी, मगर बैट पकड़ने का तरीका भी भूल गई थी। राहुल गांधी की टाइमिंग उतनी खराब है जितनी किसी सरकारी ऑफिस में 4 बजे जाने वाले आदमी की उम्मीद काम तो हो ही जाएगा! राहुल गांधी ने 12,000 किमी की पदयात्रा की, हाइब्रिड यात्रा भी कर ली, मगर यात्रा का मकसद क्या था? सरकार पर दबाव, किसी मुद्दे को उठाना, कोई मांग नहीं। बस चलना था, तो चल दिए। बीच में स्लोगन नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान। मगर बिहार की जनता ने जवाब दे दिया भाई दुकान खोलने से पहले ग्राहक और माल तो देख लेते!
चुनाव आयुक्त वाला महा-विकल्प जो कांग्रेस की नींद की भेंट चढ़ गया
28 दिसंबर 2023 को सरकार ने नया कानून लाया चुनाव आयुक्तों की चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया। यह एक ऐसा मौका था जब कांग्रेस चाहे तो लोकतंत्र की ऐतिहासिक रक्षा कर सकती थी। रामलीला मैदान में आंदोलन, अनशन, जनसैलाब… सब कुछ संभव था। मगर कांग्रेस ने सोचा करना क्या है रहने दो। जो काम अन्ना आंदोलन ने कर दिखाया था, कांग्रेस वह भी नहीं कर पाई और आज वही कांग्रेस रोज रो रही है वोट चोरी… वोट चोरी…अरे साहब, जिसके घर में दरवाजा ही न हो, उसे चोरी का क्या गिला।
अड्डम–बड्डम–गड्डम चुनाव अभियान
एक तरफ भाजपा, उसकी मैनेजमेंट टीम, और अमित शाह जैसे चुनाव-युद्ध-जनरल। दूसरी तरफ कांग्रेस जिसके प्रदेश अध्यक्ष तक टिकट वितरण में निर्णय लेने लायक नहीं। 18 सितंबर 2025 की बैठक में पप्पू यादव आये कांग्रेस को हाइजैक करने। कहा कि हमारे हिसाब से चुनाव लड़ने दीजिए, जितनी सीटें कहेंगे जिता देंगे! कांग्रेस ने…सुन भी लिया, विचार भी किया और कुछ हद तक मान भी लिया। यानी कांग्रेस के पास सदस्यता कार्ड भी नहीं, मगर सलाहकार बनकर पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने वाला आदमी पप्पू यादव। यह वही पप्पू यादव हैं जो तेजस्वी को मंचों से खरी-खोटी सुनाते रहे, लालू यादव का नाम सुनते ही मंच छोड़कर भाग जाते हैं, और कांग्रेस के भीतर इतनी पहुंच कि सीडब्ल्यूसी की बैठक में भाषण देते हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम तक कह चुके थे कि टिकट मेरे नहीं, पप्पू यादव के हिसाब से बंट रहे और नतीजा? पप्पू यादव अपने ही इलाके पूर्णिया की 7 सीटों में से एक भी नहीं जिता पाए। उल्टे परिहार से महागठबंधन की बागी रितु जायसवाल को समर्थन देकर आधिकारिक उम्मीदवार को हरवा दिया, वोट भी कटवाए और बाद में जाकर फोटो खिंचवा कर आभार भी ले लिया। कांग्रेस हाथ मलती रह गई।
सीमांचल चार-चार मुसलमान नेता, ओवैसी अंदर तक घर बना गया
कांग्रेस के पास सीमांचल में चार राष्ट्रीय मुस्लिम चेहरे कर क्या रहे थे कुछ नहीं बस सो रहे थे। पद संभाले हुए थे जैसे किसी सरकारी कालोनी की समिति के अध्यक्ष हों। तारिक अनवर सीडब्ल्यूसी मेंबर कटिहार की 7 सीटों में 6 हार। एक मनिहारी सीट बड़ी मुश्किल से जीते। जावेद सीईसी मेंबर किशनगंज की चार सीटों में से सिर्फ एक बचा पाए। डॉ.शकील खान सीएलपी लीडर
खुद अपनी सीट हार गए। तौकीर आलम राष्ट्रीय सचिव
अपनी बरारी सीट से 33,011 वोटों से हारे। कांग्रेस के ये बड़े पदाधिकारी ऐसी स्थिति में थे कि जैसे कोई क्रिकेट कप्तान अपनी गेंदबाजी तक न बचा सके। ऊपर से एएमयू कैंपस के लिए तक एक धरना आयोजित नहीं कर सके। जो नेता आंदोलन करना चाहते थे, उनको इन्हीं चार खंभों ने रोक दिया।
क्रांति का चिराग जो बेगूसराय में बुझ गया
कन्हैया कुमार कांग्रेस के स्टार प्रचारक। एनएसयूआई के इंचार्ज, सीडब्ल्यूसी सदस्य, मगर बेगूसराय जहां का वे खुद दावा करते हैं कि उनका गांव बदल देगा देश की राजनीति, वहां भाजपा 30,000 वोट से जीत गई।
कन्हैया प्रचार कम और राहुल गांधी के साथ फ्रेम में घुसने का अभियान ज्यादा चलाते रहे। तालाब में कूदना, मंच पर बत्तीमीजी, मीडिया से लड़ाई…सब किया, बस अपनी सीट नहीं बचा पाए।
राहुल गांधी इमरती–मछली–जूता अभियान के सुपरस्टार
बिहार चुनाव के ठीक समय भाजपा का सबसे बड़ा चुनाव संचालक अमित शाह पटना में बैठकर बागियों को मना रहे थे, ब्लॉक लेवल नेताओं से मिल रहे थे, रणनीति तैयार कर रहे थे, और राहुल गांधी बिहार चुनाव के मुहाने पर 16,000 किमी दूर दक्षिण अमेरिका कोलंबिया में मनोरम भ्रमण कर रहे थे। राहुल 57 दिन बिहार से दूर रहे। जबकि भाजपा रोज यही प्रचार कर रही थी कि राहुल भारत से ज्यादा विदेशों में रहते हैं।मगर राहुल को परवाह नहीं, जूता बनवाना, मछली पकाना, इमरती, तिलक लगवाना…बस यही उनका चुनावी कौशल था। नतीजा मल्लाहों का वोट उड़ गया।
उनके उम्मीदवार हार गए, कांग्रेस की सेवा में बस फोटो ही आए।
कांग्रेस ऐसे ही भाजपा को हराएगी
जब भाजपा के सांसद, मंत्री, कार्यकर्ता धूल में लोट-लोटकर चप्पल घिस-घिसकर 70 सीटें जीत लेते हैं, और कांग्रेस रथ पर चढ़ने व मोबाइल पर ‘फ्रेम’ फिट करने में लगी रहती है तो परिणाम यही आता है कि लोग कहते हैं कांग्रेस हो या न हो, फर्क क्या? कांग्रेस या तो अपने सलाहकारों को बदल दे, या खुद को बदल दे, या लोकतंत्र से विराम ले ले। वरना 2029 में यही हेडलाइन बनेगी अथ श्री कांग्रेस कथा अड्डम बड्डम गड्डम-भाग 2
* कांग्रेस चुनाव आयुक्त कानून पर आंदोलन करने में असफल रही। इससे लोकतंत्र का सबसे बड़ा मौका खो गया।
* पप्पू यादव ने कांग्रेस को अंदर से तोड़ा, टिकट वितरण तक नियंत्रित किया।
* सीमांचल में चार बड़े मुस्लिम नेताओं की असफलता, ओवैसी का विस्तार।
* कन्हैया कुमार और युवा चेहरे सिर्फ फोटो-फ्रेम नेता, कोई जमीनी मेहनत नहीं।
* राहुल गांधी की रणनीतिक विफलता, विदेश यात्राएं चुनाव से ऊपर।
* अमित शाह और भाजपा की आक्रामक मैनेजमेंट रणनीति, कांग्रेस की अड्डम-बड्डम चुनाव शैली की तुलना में कहीं आगे।
* प्रदेश संगठन कमजोर, बूढ़ा नेतृत्व जड़, युवा नेतृत्व भ्रमित।
* कांग्रेस की बिहार में पराजय योजनाबद्ध विफलता, दुर्घटना नहीं।




