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लाशों की राजनीति, आस्था से सत्ता तक का रक्तरंजित सफर,कार सेवको पर टूटा था नृपेंद्र मिश्रा का कहर

* अयोध्या आंदोलन आस्था या दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति?

* कार सेवा के आश्वासन और अदालतों में दिए गए हलफनामे

* प्रशासनिक नियंत्रण किसके हाथ में था, इतिहास के अनुत्तरित सवाल

* गोलियों की गूंज से चुनावी नारों तक का सफर

* वरिष्ठ नौकरशाहों की वापसी और सत्ता के केंद्र में पुनर्स्थापन

* मंदिर निर्माण ट्रस्ट और राजनीतिक निरंतरता पर बहस

* त्रासदी से राजनीतिक पूंजी तक क्या यह सुनियोजित रूपांतरण था?

* आस्था, संविधान और वैचारिक वर्चस्व का टकराव


लखनऊ अयोध्या केवल एक धार्मिक स्थल का विवाद नहीं था, वह स्वतंत्र भारत की राजनीति का सबसे लंबा, सबसे जटिल और सबसे भावनात्मक अध्याय रहा है। दशकों तक चली यह लड़ाई अदालतों, सड़कों और चुनावी मंचों पर समानांतर रूप से लड़ी गई। एक ओर श्रद्धा और आस्था का प्रश्न था, तो दूसरी ओर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने की रणनीति। यही कारण है कि जब हम अयोध्या की बात करते हैं, तो केवल एक मंदिर या एक ढांचे की बात नहीं करते हम उस राजनीतिक परियोजना की बात करते हैं जिसने भारतीय लोकतंत्र की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा दिया गया। उससे पहले कार सेवा के नाम पर यह आश्वासन दिया गया था कि संरचना को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी। सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामे दिए गए थे। राज्य सरकार ने भरोसा दिलाया था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखी जाएगी। लेकिन घटनाक्रम ने दूसरी दिशा ले ली। ढांचा गिरा, देशभर में दंगे भड़के, हजारों जानें गईं, और एक धार्मिक विवाद स्थायी राजनीतिक पूंजी में बदल गया। इस पूरे दौर में प्रशासनिक तंत्र की भूमिका, राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी और न्यायपालिका के निर्देशों की अवहेलना ये सब प्रश्न इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, पर सार्वजनिक विमर्श में अक्सर भावनाओं की धुंध में खो जाते हैं। बाद के वर्षों में अदालतों में मुकदमे चले, जांच आयोग बने, और अंततः 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित भूमि पर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया। आज उसी स्थान पर भव्य राम मंदिर खड़ा है, जिसका उद्घाटन राष्ट्रीय उत्सव की तरह मनाया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह यात्रा केवल धार्मिक न्याय की थी या राजनीतिक विस्तार की भी? क्या उस दौर की त्रासदी गोलियां, दंगे, लाशें राजनीतिक सीढ़ी में बदल दी गईं? क्या प्रशासनिक संरचना के वे चेहरे, जो उस समय निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में थे, बाद में सत्ता की धुरी पर फिर से स्थापित हुए? 2014 के बाद जब केंद्र में नई सरकार बनी और नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली, तब सेवानिवृत्ति की दहलीज पार कर चुके कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों को वापस बुलाया गया। उनमें से एक को प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधान सचिव जैसा अत्यंत शक्तिशाली पद सौंपा गया। बाद में वही व्यक्ति मंदिर निर्माण से जुड़े ट्रस्ट ढांचे में केंद्रीय भूमिका में दिखाई दिए। यह महज प्रशासनिक दक्षता का सम्मान था या राजनीतिक विश्वास का पुरस्कार।

आस्था की जमीन पर राजनीति की बिसात

अयोध्या विवाद की जड़ें औपनिवेशिक काल तक जाती हैं। स्वतंत्रता के बाद यह मामला अदालतों में रहा। 1980 के दशक में इसे संगठित राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया गया। भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठनों ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया। रथयात्राएं निकलीं, सभाएं हुईं, और भावनात्मक अपीलों ने जनमानस को आंदोलित किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल धार्मिक पुनर्स्थापन का प्रश्न नहीं था; यह सामाजिक ध्रुवीकरण के माध्यम से व्यापक राजनीतिक आधार तैयार करने की रणनीति भी थी। 1990 के दशक में यही मुद्दा भाजपा के राष्ट्रीय विस्तार की धुरी बना।

अदालतों में हलफनामे और जमीनी सच्चाई

6 दिसंबर से पहले सर्वोच्च न्यायालय को भरोसा दिलाया गया था कि ढांचे को नुकसान नहीं पहुंचेगा। राज्य सरकार की ओर से आश्वासन दिए गए। लेकिन जिस दिन कारसेवक अयोध्या पहुंचे, प्रशासनिक नियंत्रण शिथिल दिखाई दिया। यह प्रश्न आज भी उठता है कि क्या यह प्रशासनिक विफलता थी या राजनीतिक दबाव? नियंत्रण किस स्तर पर था? आदेश किसने दिए? किसने रोका और किसने नहीं रोका? इतिहास इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर नहीं देता, पर संदेह की परतें छोड़ जाता है।

गोलियों की गूंज और दंगों की आग

ढांचा गिरने के बाद देशभर में सांप्रदायिक हिंसा भड़की। मुंबई, सूरत, कानपुर, भोपाल कई शहर जल उठे। हजारों लोग मारे गए। लाशें केवल आंकड़े नहीं थीं, वे परिवारों की दुनिया थी। लेकिन राजनीति ने इन मौतों को प्रतीक में बदला। शहादत और बलिदान के आख्यान गढ़े गए। विरोधियों को ‘आस्था-विरोधी’ घोषित किया गया। चुनावी सभाओं में अयोध्या स्थायी मुद्दा बन गया।

त्रासदी से चुनावी पूंजी तक

1996, 1998 और 1999 के चुनावों में अयोध्या का प्रभाव स्पष्ट दिखा। यह मुद्दा भाजपा की वैचारिक पहचान बन गया। समय के साथ गठबंधन राजनीति आई, मुद्दे बदले, लेकिन अयोध्या की स्मृति राजनीतिक पूंजी के रूप में बनी रही। 2014 में जब भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला, तो इसे अयोध्या आंदोलन की दीर्घकालिक परिणति के रूप में देखा गया।

प्रशासनिक निरंतरता और सत्ता की धुरी

2014 के बाद केंद्र में बनी सरकार ने कुछ वरिष्ठ नौकरशाहों को सेवानिवृत्ति के बाद पुनः महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया। प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधान सचिव का पद अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। बाद के वर्षों में मंदिर निर्माण से जुड़े ट्रस्ट में भी वही नाम सामने आया। आलोचकों का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास का प्रतीक था। समर्थकों का तर्क है कि अनुभवी अधिकारियों की सेवाएं लेना सरकार का अधिकार है।

न्यायिक फैसला और नया अध्याय

2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित भूमि मंदिर निर्माण के लिए देने का फैसला सुनाया। साथ ही मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि देने का निर्देश दिया। इस फैसले को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया। 2024 में भव्य राम मंदिर का उद्घाटन हुआ। इसे राष्ट्रीय गौरव के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि उद्घाटन का समय और उसका राजनीतिक उपयोग चुनावी रणनीति का हिस्सा था।

आस्था बनाम संविधान

संविधान धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की परिकल्पना करता है। राज्य की नीतियां किसी एक धार्मिक पहचान से संचालित नहीं हो सकतीं। सवाल यह है कि क्या अयोध्या आंदोलन ने इस संतुलन को चुनौती दी?
क्या धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक उपयोग संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप है? या यह वैचारिक नियंत्रण की परियोजना है?

लाशें, प्रतीक और सत्ता

इतिहास गवाह है कि राजनीति अक्सर त्रासदियों को भुनाती है। लाशें विचारधारा की नहीं होतीं, वे इंसान की होती हैं। लेकिन राजनीति उन्हें नारे में बदल देती है।
अयोध्या आंदोलन में भी यही हुआ। एक धार्मिक विवाद राष्ट्रीय पहचान का प्रश्न बना। पहचान चुनावी मुद्दा बनी। और चुनावी मुद्दा सत्ता में बदल गया। मंदिर निर्माण आज वास्तविकता है। लेकिन सवाल बना हुआ है। क्या यह केवल धार्मिक न्याय था या सत्ता-संरचना को स्थायी बनाने का माध्यम? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अयोध्या ने भारतीय राजनीति की भाषा बदल दी। अब चुनाव विकास और रोजगार के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द भी लड़े जाते हैं।

लोकतंत्र के लिए सबक

अयोध्या अध्याय लोकतंत्र को यह सिखाता है कि भावनाओं की राजनीति अत्यंत शक्तिशाली होती है। वह दशकों तक समाज को प्रभावित कर सकती है।
लेकिन लोकतंत्र की स्थिरता के लिए जरूरी है कि त्रासदियों को राजनीतिक सीढ़ी न बनाया जाए। संवाद, सहिष्णुता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सर्वोपरि हो।

* अयोध्या आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदली
* अदालतों के आश्वासनों और जमीनी घटनाओं में विरोधाभास
* ढांचा गिरने के बाद सांप्रदायिक हिंसा और राजनीतिक ध्रुवीकरण
* त्रासदी से स्थायी चुनावी पूंजी का निर्माण
* वरिष्ठ नौकरशाहों की पुनर्नियुक्ति पर उठे सवाल
* 2019 का न्यायिक फैसला और 2024 का उद्घाटन
* आस्था और संविधान के बीच संतुलन की चुनौती
* लाशों को प्रतीक और प्रतीकों को सत्ता में बदलने की राजनीति

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