शेख हसीना: कभी बंग्लादेश की रही हुक्मरान,अब फाँसी की सजा से जाएगी जान!
1971 की कुर्बानियों पर 2025 का कुठाराघात क्या यह वही देश है!

● शेख हसीना: कभी बंग्लादेश की रही हुक्मरान,अब फाँसी की सजा से जाएगी जान!
● बांग्लादेश की उबलती हकीकत : क्या 1971 का सपना 2025 में फांसी के फंदे पर लटका दिया
● अदालत में तालियां… और लोकतंत्र मूक क्या यह फैसला या भीड़ की भूख
● हसीना की फांसी न्याय का दिन या सत्ता की वापसी की रात
● 1971 की कुर्बानियों पर 2025 का कुठाराघात क्या यह वही देश है!
● नई सरकार, पुराना खेल विपक्ष जेल में, तख्तापलट सत्ता में
● पाकिस्तान का रिप्ले लोकप्रिय नेता जेल में, मुकदमे पक्षपातपूर्ण, भीड़ राजी
● भारत-बांग्लादेश में कूटनीतिक भूकंप, हसीना की वापसी बनेगी आग का धुआं
● ढाका में बम, सड़कों पर नफरत, अदालतों में राजनीतिक गोटियां
● बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था चमकीली… पर लोकतंत्र का भयावह खोखलापन
◆ सुरेश बहादुर सिंह
(अतिथि लेखक व वरिष्ठ स्तम्भकार)
1971 में बांग्लादेश पाकिस्तान की तानाशाही, अत्याचार और भीड़ तंत्र से आजाद हुआ। लोग एक लोकतांत्रिक, जनता-केन्द्रित, धर्मनिरपेक्ष और इंसाफ पर टिका देश चाहते थे। पर 54 साल बाद, वही बांग्लादेश आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां अदालतें तालियां बजा रही हैं, अपराध और साजिश में फर्क मिट गया है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा सुनाकर भीड़तंत्र को लोकतंत्र का नाम दिया जा रहा है। अब बांग्लादेश अपने जन्म के उद्देश्य को ही दफना चुका है या फिर वह पाकिस्तान का चमकदार, मंहगा, लेकिन खोखला रीमिक्स बन चुका है।
बांग्लादेश पाकिस्तान नहीं बनना चाहता, लेकिन बन क्या रहा
1971 में बांग्लादेश ने पाकिस्तान की सेना, उसकी अत्याचारी राजनीतिक व्यवस्था और सैन्य तानाशाही से छुटकारा पाने के लिए लाखों जानें दी थीं। शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में एक देश बना, जिसका सपना था लोकतंत्र जनता की मुट्ठी में होगा, न कि बंदूकधारियों और सत्ता-लोलुपों की जेब में। आज बांग्लादेश जो बन गया है, वह 1971 के सपने के बिलकुल उलट है।
अदालत में तालियां… मौत की सजा… और लोकतंत्र की चिता?
17 नवंबर 2025 ढाका की विशेष अदालत, जिसे खुद शेख हसीना ने 2010 में युद्ध अपराधों के लिए बनाया था, उसी अदालत ने आज उन्हें फांसी की सजा सुना दी।
453 पन्नों का फैसला पढ़ा गया और जैसे ही मौत की सजा शब्द आया अदालत में तालियां बज उठीं। तालियां किसी लोकतांत्रिक देश के न्यायालय में नहीं बजती, भीड़ तंत्र में बजती हैं, उन समाजों में बजती हैं जहां फैसला कानून नहीं, गुस्सा देता है। सवाल उठा क्या यह न्याय था, या सिर्फ राजनीतिक विरोधियों का सार्वजनिक वध?
हसीना पर आरोप, क्या ये कानून का मामला या सत्ता का खेल?
अदालत ने हसीना पर 5 मुख्य आरोप लगाए। पहला प्रदर्शनकारियों पर हेलीकॉप्टर से हमले का आदेश। दूसरा पुलिस को गोली चलाने के लिए उकसाना। तीसरा प्रदर्शनकारियों की हत्या रोकने में विफलता चौथा अबू सय्यादी की हत्या का प्रत्यक्ष आदेश पांचवां वो अंतिम आरोप शवों को जलाने और सबूत मिटाने की साजिश।
ये आरोप गंभीर हैं लेकिन क्या हसीना को निष्पक्ष सुनवाई मिली, क्या वे अदालत में खुद को बचा सकीं?
उनका दावा है कि यह कंगारू कोर्ट है। मुझसे मेरा पक्ष रखने का अधिकार छीन लिया गया। दूसरा बड़ा सवाल जिस सरकार ने अदालत चलाई, वह खुद जनता द्वारा चुनी हुई नहीं है तो फिर एक निर्वाचित प्रधानमंत्री को फांसी कौन सुना रहा।
2024 का तख्तापलट जब बांग्लादेश की दिशा बदल गई
जुलाई 2024 में छात्रों ने आरक्षण नीति के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू किए। जल्द ही पुलिस गोलीबारी, हेलीकॉप्टर हमले, आगजनी और मर्डर की घटनाएं सामने आईं। सैकड़ों छात्र मारे गए, हजारों घायल हुए, और ढाका खून में डूब गया। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना बांग्लादेश छोड़ने को मजबूर हुईं। वे भारत आईं और उसी दौरान मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में नई सरकार बनी। यूनुस की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी है लेकिन उनकी सरकार पर गंभीर आरोप यह है कि वे पाकिस्तान के दबाव में चल रहे हैं। वे चुनाव टाल रहे हैं, वे डीप स्टेट की पसंद हैं, वे विपक्ष का सफाया कर रहे हैं। यानी वही मॉडल, जिससे निकलकर बांग्लादेश ने जन्म लिया था उसी मॉडल की वापसी।
पाकिस्तान वाली कहानी कॉपी पेस्ट फॉर्मेट में
पाकिस्तान का इतिहास देखें लोकप्रिय नेता जेल में जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी। नवाज शरीफ को देश निकाला। इमरान खान जेल में सड़ रहे और बांग्लादेश में
लोकप्रिय नेता शेख हसीना को फांसी की सजा। पार्टी पर प्रतिबंध सैकड़ों नेता जेल में। नया तख्तापलट तंत्र सत्ता में यह संयोग नहीं यह पैटर्न है।
भारत और हसीना क्या भारत उन्हें वापस ढाका भेज देगा?
भारत और बांग्लादेश के बीच 2013 की प्रत्यर्पण संधि कहती है कि अगर किसी अपराधी को 1 साल से ज्यादा की सजा हुई है और वारंट जारी है, तो उसे सौंपा जा सकता है। लेकिन यहां मामला अपराध का नहीं राजनीतिक शरण का है। भारत के वरिष्ठ राजनयिक साफ संकेत दे चुके हैं कि भारत शेख हसीना को नहीं सौंपेगा। क्योंकि हसीना भारत की दोस्त रही हैं, उन्होंने भारत की सुरक्षा को सहयोग दिया। बांग्लादेश को कट्टरपंथ से बचाने में भारत के हित जुड़े हैं। बांग्लादेश की नई सरकार भारत-विरोधी झुकाव दिखा रही है। हसीना को सौंपना भारत की साख पर अंतरराष्ट्रीय चोट होगा। ढाका कह रहा है कि भारत को उन्हें हर हाल में सौंपना होगा। भारत कह रहा है कि कभी नहीं। यही टकराव आने वाले महीनों में दक्षिण एशिया की भू-राजनीति बदल सकता है।
क्या भारत हसीना को तीसरे देश भेज देगा
भारत के सामने तीन विकल्प हैं पहला हसीना को ढाका सौंप दे जो बिल्कुल असंभव है। दूसरा हसीना को अपनी सुरक्षा में रखे जो राजनीतिक जोखिम है। तीसरा हसीना को यूएई, यूके, कनाडा जैसे तीसरे देश भेज दे जो सबसे ज्यादा व्यावहारिक है। सबसे सुरक्षित विकल्प तीसरा है।
यह भारत-बांग्लादेश तनाव को सीमित कर सकता है।
और हसीना की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर सकता है।
बांग्लादेश का भविष्य: चमकती अर्थव्यवस्था, टूटता लोकतंत्र
बांग्लादेश की जीडीपी 6 से 7 फीसदी की दर से बढ़ी है।
पावर सेक्टर, गारमेंट उद्योग, निर्यात सब मजबूत। मीडिया पर सेंसरशिप, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां, कट्टरपंथी समूहों का बढ़ना, अल्पसंख्यकों पर हमले, चुनाव टालने की रणनीति, न्यायपालिका का राजनीतिक दुरुपयोग यह वही रास्ता है जिसे पाकिस्तान 40 साल पहले पकड़ चुका था। प्रश्न यही है कि क्या 1971 का बांग्लादेश 2025 का पाकिस्तान बन चुका है? शेख हसीना 78 साल की हैं। वे वापस ढाका नहीं जाएंगी कम से कम जिंदा नहीं। वे आईसीसी में अपील करेंगी, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी लड़ाई लड़ेंगी। बड़ा सवाल यह नहीं है कि हसीना का क्या होगा बड़ा सवाल है कि
बांग्लादेश का क्या होगा। क्योंकि बांग्लादेश अपने जन्म के उद्देश्य से भटक गया है। 1971 में पाकिस्तान का अत्याचार, सत्ताधारी गिरोह, विपक्ष का दमन, सेना का हस्तक्षेप, राजनीतिक सजाएं, जनता की आवाज का दमन बांग्लादेश ने इन्हीं सबको खत्म करने के लिए स्वतंत्रता ली थी। 2025 में वही सब लौट आया है बस नए चेहरे, नए तख्तापलट, नए सभागार और नई तालियों की आवाज के साथ। अगर बांग्लादेश नहीं जागा तो वह अपने ही इतिहास की पुनरावृत्ति का शिकार होगा। बांग्लादेश को पाकिस्तान नहीं बनना चाहिए। 1971 की कुर्बानियां अभी भी जिंदा हैं और उम्मीद भी।
* 17 नवंबर 2025 को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा
* अदालत में मौजूद लोगों ने तालियां बजाईं न्याय प्रक्रिया पर अंतरराष्ट्रीय सवाल
* 1971 में पाकिस्तान मॉडल से अलग होने वाला बांग्लादेश अब उसी राह पर?
* विपक्षी नेताओं का गायब होना, गिरफ्तारियां, प्रतिबंध और दमन
* मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार पर पाकिस्तान व चीन की ओर झुकाव का आरोप
* भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण समझौते के बावजूद भारत का हसीना को न भेजने का संकेत
* हसीना पर 5 गंभीर आरोप हत्या, हिंसा, हेलीकॉप्टर हमले, आदेश, दमन
* बांग्लादेश में भीड़-न्याय और न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका
* ढाका में हिंदुओं पर हमले, कट्टरपंथी संगठनों की बढ़ती गतिविधियां
* भारत की पूर्वी सीमा पर अस्थिरता, शरणार्थियों का खतरा
* शेख हसीना तीसरे देश में शरण लेने की तैयारी
* 1971 की भावना के टूटने की सबसे बड़ी चेतावनी




