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सड़क सुरक्षा को नई धार,डीजी राजीव कृष्ण नियमो के उल्लंघन पर करेंगे वार

* सड़क सुरक्षा को नई धार,डीजी राजीव कृष्ण नियमो के उल्लंघन पर करेंगे वार

* जागरूकता और तत्काल दंड से हादसों पर लगाम-डीजीपी

* सड़क हादसों में कमी के लिए तत्काल दंड और सख्त इंफोर्समेंट पर जोर

* पुलिस मुख्यालय में दो दिवसीय राज्यस्तरीय सड़क सुरक्षा कार्यशाला

* यातायात निदेशालय यूपी व आईआरटीई फरीदाबाद का संयुक्त आयोजन

* सड़क सुरक्षा के पांच स्तंभों एजुकेशन, एनफोर्समेंट, इंजीनियरिंग, इमरजेंसी केयर, इनवायरनमेंट पर फोकस

* जीरो फैटेलिटी डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रम के पहले चरण में सकारात्मक नतीजे

* अलीगढ़, बुलंदशहर, कानपुर, हमीरपुर, लखनऊ, सीतापुर मार्गों पर 30 फीसदी से 58 फीसदी तक हादसों में कमी

* दूसरे चरण में 55 जनपदों के 245 क्रिटिकल थाने शामिल

* तकनीक, वैज्ञानिक जांच और विभागीय समन्वय से सड़क सुरक्षा को मजबूत करने का संकल्प

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सड़क हादसों को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों और चिंताओं के बीच पुलिस मुख्यालय में आयोजित दो दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला ने यह साफ संकेत दिया है कि अब सड़क सुरक्षा को लेकर ढिलाई नहीं, बल्कि सख्ती और निरंतरता का रास्ता अपनाया जाएगा। इस कार्यशाला का मूल संदेश स्पष्ट था सड़क दुर्घटनाओं में कमी केवल पोस्टर, स्लोगन या एक महीने के अभियान से नहीं आएगी, बल्कि इसके लिए सालभर चलने वाली जागरूकता, हर उल्लंघन पर तत्काल दंड और तकनीकी व प्रशासनिक समन्वय अनिवार्य है। यातायात निदेशालय, उत्तर प्रदेश और इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रैफिक एजुकेशन (आईआरटीई), फरीदाबाद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य प्रदेश में लगातार बढ़ते सड़क हादसों पर प्रभावी नियंत्रण लगाना और दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या को न्यूनतम स्तर तक लाना रहा। उद्घाटन सत्र में डीजीपी राजीव कृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारी जुर्माने से ज्यादा जरूरी है हर उल्लंघन पर तुरंत कार्रवाई। दंड का डर तभी प्रभावी होता है, जब वह निश्चित और त्वरित हो। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और घनी आबादी वाले राज्य में सड़क सुरक्षा केवल यातायात पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह शासन, प्रशासन, शहरी निकायों, परिवहन विभाग और समाज सभी की साझा जिम्मेदारी है। इसी व्यापक सोच के साथ इस कार्यशाला में सड़क सुरक्षा के पांच मूलभूत स्तंभों एजुकेशन, एनफोर्समेंट, इंजीनियरिंग, इमरजेंसी केयर और इनवायरनमेंट पर गहन विमर्श किया गया। कार्यशाला में यह भी सामने आया कि सड़क हादसों के पीछे केवल मानवीय लापरवाही ही नहीं, बल्कि खराब सड़क डिजाइन, ब्लैक स्पॉट्स, कमजोर संकेतक, अपर्याप्त प्रकाश व्यवस्था और दुर्घटना के बाद समय पर चिकित्सा सहायता न मिल पाना भी बड़ी वजहें हैं। इसी कारण सरकार और पुलिस अब दुर्घटनाओं की जांच को केवल औपचारिक प्रक्रिया न मानकर वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। प्रदेश में नवंबर 2025 में शुरू किए गए जीरो फैटेलिटी डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रम को इस दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। पहले चरण में 20 जनपदों के 242 क्रिटिकल थानों, 89 क्रिटिकल कॉरिडोर और 3233 क्रिटिकल क्रैश लोकेशनों की पहचान की गई। इन इलाकों में केंद्रित पेट्रोलिंग, सघन जांच, इंजीनियरिंग सुधार और जागरूकता अभियानों के जरिए उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला। डीजीपी ने अलीगढ़-बुलंदशहर, कानपुर-हमीरपुर और लखनऊ-सीतापुर मार्गों का उदाहरण देते हुए बताया कि केवल दो महीनों के भीतर इन कॉरिडोरों पर दुर्घटनाओं में 30 प्रतिशत से लेकर 58 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई। यह साबित करता है कि यदि नीति स्पष्ट हो, अमल सख्त हो और निगरानी निरंतर रहे, तो सड़क हादसों को काफी हद तक रोका जा सकता है।

कार्यशाला का आयोजन और उद्देश्य

पुलिस मुख्यालय में आयोजित यह दो दिवसीय कार्यशाला सड़क सुरक्षा को लेकर अब तक की सबसे व्यापक पहलों में से एक मानी जा रही है। इसमें दूसरे चरण के तहत शामिल 55 जनपदों के 245 क्रिटिकल थानों से राजपत्रित अधिकारी यातायात, यातायात निरीक्षक, उपनिरीक्षक और क्रिटिकल कॉरिडोर टीम के प्रभारी अधिकारी भाग ले रहे हैं।

डीजीपी का स्पष्ट संदेश तत्काल दंड जरूरी

डीजीपी राजीव कृष्ण ने कहा कि सड़क पर नियम तोड़ने वालों को यह संदेश मिलना चाहिए कि हर उल्लंघन का परिणाम तुरंत सामने आएगा। उन्होंने कहा कि केवल भारी जुर्माना लगाने से व्यवहार में बदलाव नहीं आता, बल्कि निरंतर और त्वरित कार्रवाई से ही अनुशासन पैदा होता है।

तकनीक का प्रभावी इस्तेमाल

डीजीपी ने मोबाइल अलर्ट सिस्टम, एआई आधारित कैमरे, स्पीड डिटेक्शन सिस्टम और ऑटोमैटिक चालान व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि तकनीक तभी सफल होगी, जब उसका इस्तेमाल पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से किया जाए।

‘यातायात माह’ पूरे साल

उन्होंने सुझाव दिया कि ‘यातायात माह’ को नवंबर तक सीमित न रखकर पूरे वर्ष चलाया जाए। इसके लिए स्कूलों, कॉलेजों, बाजारों और ग्रामीण क्षेत्रों में निरंतर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।

ब्लैक स्पॉट्स पर स्थायी समाधान

नगर निगमों से समन्वय कर ब्लैक स्पॉट्स पर स्थायी होर्डिंग्स, संकेतक और चेतावनी बोर्ड लगाने पर जोर दिया गया। सोशल मीडिया के माध्यम से भी सड़क सुरक्षा संदेशों को व्यापक स्तर पर फैलाने की रणनीति पर चर्चा हुई।

डॉ. रोहित बलूजा का तकनीकी दृष्टिकोण

आईआरटीई के अध्यक्ष डॉ.रोहित बलूजा ने दुर्घटना जांच को वैज्ञानिक और तथ्य-आधारित बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि तकनीकी साक्ष्य, सीसीटीवी फुटेज, वाहन डेटा और फॉरेंसिक विश्लेषण के जरिए मजबूत केस तैयार किए जा सकते हैं।

पुलिस-परिवहन समन्वय

डॉ. बलूजा ने पुलिस और परिवहन विभाग के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने भारतीय न्याय संहिता और मोटर व्हीकल एक्ट को जोड़कर प्रभावी अभियोजन की बात कही।

‘ट्रेनर्स को ट्रेन’ मॉडल

उन्होंने ‘ट्रेनर्स को ट्रेन’ मॉडल अपनाने का सुझाव दिया, जिससे प्रशिक्षित अधिकारी आगे अपने-अपने जिलों में अन्य कर्मियों को प्रशिक्षित कर सकें।

एडीजी ट्रैफिक की प्रस्तुति

एडीजी ट्रैफिक ए. सतीश गणेश ने प्रतिभागियों को सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम, डेटा एनालिसिस और प्रवर्तन रणनीतियों पर विस्तृत जानकारी दी।

जीरो फैटेलिटी डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रम का विस्तार

पहले चरण की सफलता के बाद अब दूसरे चरण में 55 जनपदों को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य प्रदेशभर में सड़क हादसों में समान रूप से कमी लाना है। सड़क हादसों में कमी से न केवल जानें बचेंगी, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ घटेगा, बीमा दावों में कमी आएगी और अर्थव्यवस्था को भी राहत मिलेगी।

* तत्काल दंड से नियम पालन सुनिश्चित।
* तकनीक आधारित प्रवर्तन पर जोर।
* वैज्ञानिक दुर्घटना जांच की पहल।
* जीरो फैटेलिटी डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रम का राज्यव्यापी विस्तार।
* विभागीय समन्वय से बेहतर परिणाम।
* निरंतर जन-जागरूकता अभियान।
* ब्लैक स्पॉट्स पर स्थायी समाधान।
* सुरक्षित सड़कों की दिशा में ठोस कदम।

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