सुभाष चन्द्र जिला आबकारी अधिकारी गांजा विक्रेताओं का सरदार, काले कारोबार से अपनी तिजोरी भर रहा अपरम्पार
चंदौली में नशे का साम्राज्य नशामुक्ति के नारों के बीच गांजा सिंडिकेट का बेखौफ राज

● सुभाष चन्द्र जिला आबकारी अधिकारी गांजा विक्रेताओं का सरदार, काले कारोबार से अपनी तिजोरी भर रहा अपरम्पार
● चंदौली में नशे का साम्राज्य नशामुक्ति के नारों के बीच गांजा सिंडिकेट का बेखौफ राज
● नशामुक्त प्रदेश के दावे, चंदौली में खुलेआम गांजे की बिक्री
● आबकारी अधिकारी सुभाष चंद्र की भूमिका पर गंभीर सवाल
● थाना क्षेत्रों में फैला नेटवर्क, हर गली में माल उपलब्ध
● कारखास-बिचौलिया तंत्र से चल रही कथित वसूली
● युवाओं को निगलता नशा, स्कूल-कॉलेज तक पहुंच
● उड़ीसा, बिहार, चंदौली रूट से तस्करी के आरोप
● मीडिया रिपोर्टिंग के बावजूद कार्रवाई शून्य क्यों?
● सत्ता संरक्षण या प्रशासनिक मिलीभगत?
◆ राजकुमार सोनकर
चंदौली। उत्तर प्रदेश सरकार के नशामुक्त प्रदेश अभियान के तहत बड़े-बड़े होर्डिंग, सरकारी विज्ञापन, शपथ कार्यक्रम और भाषण लगातार जनता के सामने परोसे जा रहे हैं। मंचों से कहा जा रहा है कि प्रदेश का युवा नशे से दूर है, प्रशासन सतर्क है और अवैध नशे के कारोबार पर सख्ती से प्रहार किया जा रहा है। लेकिन यदि इन दावों को ज़मीन पर उतारकर देखा जाए, तो चंदौली जिले की तस्वीर इन नारों का मखौल उड़ाती दिखाई देती है। यहां नशा न तो छिपकर बिक रहा है, न ही अंधेरी गलियों तक सीमित है।
आरोप है कि गांजा आज चंदौली में उतनी सहजता से उपलब्ध है, जितनी रोज़मर्रा की जरूरत की कोई सामान्य वस्तु। रेलवे क्षेत्र, बस स्टैंड, बाजार, ढाबे, ग्रामीण इलाकों के खाली मकान और खेत—सब कथित तौर पर इस अवैध कारोबार के हिस्से बन चुके हैं। हालात यह बताए जा रहे हैं कि जो तलाशे, उसे माल मिल ही जाता है।
स्थानीय ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सूत्रों के मुताबिक यह कोई इक्का-दुक्का तस्करों का खेल नहीं है, बल्कि एक संगठित, संरक्षित और सुनियोजित गांजा सिंडिकेट सक्रिय है, जिसकी जड़ें जिले के कई थाना क्षेत्रों में फैली बताई जाती हैं। इस नेटवर्क के बारे में कहा जा रहा है कि यह बिना किसी डर के इसलिए फल-फूल रहा है, क्योंकि इसे सिस्टम के भीतर से मौन समर्थन और संरक्षण मिल रहा है। सबसे गंभीर और चौंकाने वाले आरोप आबकारी विभाग को लेकर सामने आ रहे हैं। जिले में तैनात आबकारी अधिकारी सुबाश चंद्र की भूमिका पर खुलेआम सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीण पूछ रहे हैं कि जब हर गली, हर मोहल्ले और हर थाना क्षेत्र से नशे की शिकायतें आ रही हैं, तो आबकारी विभाग की सक्रियता आखिर कहां है? क्या विभाग को कुछ दिख नहीं रहा या फिर सब कुछ दिखते हुए भी अनदेखी की जा रही है? लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन ईमानदारी से केवल कुछ दिनों के लिए भी वास्तविक अभियान चला दे, तो आधा नेटवर्क खुद-ब-खुद उजागर हो जाएगा। फिर यह खामोशी क्यों? यह सवाल अब सिर्फ फुसफुसाहट नहीं, बल्कि गांव-चौराहों और चाय की दुकानों पर खुलकर पूछा जा रहा है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नशे की चपेट में अब सिर्फ हाशिये के युवा नहीं, बल्कि स्कूल-कॉलेज जाने वाले किशोर भी आ चुके हैं। कई शिक्षक बताते हैं कि पहले जहां बच्चों का ध्यान पढ़ाई में रहता था, वहीं अब वे गलत संगत में फंसकर धीरे-धीरे नशे और अपराध की ओर बढ़ रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं, चोरी-लूट और घरेलू हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन प्रशासनिक संवेदनशीलता कहीं दिखाई नहीं देती।
ग्रामीणों का आरोप है कि इस पूरे खेल को चलाने में एक कारखास बिचौलिया तंत्र बेहद सक्रिय है। यही कथित बिचौलिये तस्करों से वसूली करते हैं, सेटिंग बनाते हैं और ऊपर तक ‘मैनेजमेंट’ पहुंचाते हैं। यही वजह बताई जाती है कि कभी-कभार यदि कोई छोटा विक्रेता पकड़ा भी जाता है, तो वह कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित रहती है। असली सरगना, बड़े खिलाड़ी और नेटवर्क के संचालक हमेशा कानून की पकड़ से बाहर रहते हैं। इस कथित सिंडिकेट को लेकर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि इसे कुछ प्रभावशाली स्थानीय लोगों का संरक्षण प्राप्त है। हालांकि अभी तक किसी राजनीतिक चेहरे का नाम आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है, लेकिन लोगों का मानना है कि बिना सत्ता और सिस्टम के संरक्षण के इतना बड़ा अवैध कारोबार संभव नहीं हो सकता। गौर करने वाली बात यह भी है कि चंदौली में गांजे की खुलेआम बिक्री को लेकर पहले भी स्थानीय अखबारों और चैनलों में खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन हर बार वही कहानी दोहराई गई कुछ दिनों की चर्चा, फिर सन्नाटा। न बड़े स्तर पर छापेमारी, न अधिकारियों पर जवाबदेही और न ही नेटवर्क का पर्दाफाश। यही वजह है कि अब जनता सवाल पूछ रही है कि क्या चंदौली में नशा प्रशासनिक असफलता का परिणाम है, या फिर सुनियोजित मिलीभगत का नतीजा? क्या नशामुक्त प्रदेश का नारा केवल कागज़ और पोस्टरों तक सीमित रह गया है? और सबसे बड़ा सवाल क्या इस कथित गांजा सिंडिकेट पर कभी निर्णायक प्रहार होगा, या फिर यह फाइल भी बाकी तमाम मामलों की तरह धूल भरी अलमारियों में दफन हो जाएगी? चंदौली की यह तस्वीर केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि उस खाई की ओर इशारा करती है जो सरकारी घोषणाओं और ज़मीनी हकीकत के बीच लगातार चौड़ी होती जा रही है। अब निगाहें जिला प्रशासन, पुलिस और आबकारी विभाग पर टिकी हैं। देखना यह है कि वे सवालों से भागते हैं या जवाब देने की हिम्मत दिखाते हैं। इतना बड़ा संगठित गांजा का कारोबार चल रहा है वहीं दूसरी ओर जिला आबकारी अधिकारी सुभाष चन्द्र आँख पर पट्टी बांधे धृतराष्ट्र की तरह बैठा हुआ है।
पूरे जिले में आसानी से मिल जाता है गांजा
धानापुर, मुगलसराय, अलीनगर, धीना और सैयदराजा जैसे थाना क्षेत्रों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार अब यह पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि माल कहां मिलेगा, बल्कि जगहें पहले से तय हैं। धानापुर के एक समाजसेवी का कहना है कि पहले डर था, अब नहीं। बच्चे खुलेआम खरीदते हैं। शिकायत करो तो या तो बात दबा दी जाती है या शिकायतकर्ता ही डर जाता है।
चर्चित थाना क्षेत्र
मुगलसराय का चतुर्भुजपुर, कैली, सहजौर, गोधना मोड़, धर्मशाला रोड, खोवा मंडी, दुल्हीपुर, पड़ाव, साहुपुरी
अलीनगर का धपरी, घूस, गंज बसनी, लवंडा, भरछा, गगेहरा, धानापुर का रमरजा, सीतापोखरी, हिंगुतरगढ़, शहीदगांव, धीना का कमालपुर, पांडेपुर, सैयदराजा का नेवादा, महाराजगंज, दुधारी इन इलाकों में खेतों, खाली मकानों, ढाबों और रेलवे क्षेत्र को अस्थायी ठिकानों के रूप में इस्तेमाल किए जाने के आरोप हैं।
युवाओं पर नशे का कहर
शिक्षकों और काउंसलरों के मुताबिक नशा पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार को तेजी से बर्बाद कर रहा है। छात्र पढ़ाई छोड़ रहे हैं, अपराध की ओर झुक रहे हैं और पारिवारिक रिश्ते टूट रहे हैं।
तस्करी का कथित रूट
सूत्रों के अनुसार गांजा उड़ीसा से बिहार होते हुए चंदौली पहुंचता है। बसों, निजी वाहनों और मालगाड़ियों के जरिए सप्लाई की बात कही जा रही है। हर स्तर पर कमीशन तय है, चेकिंग से बचने के लिए समय और रास्ते बदले जाते हैं।
प्रशासन और आबकारी विभाग पर सवाल
जब हर गली में नशा बिक रहा है तो छापेमारी क्यों नहीं? बड़े तस्कर क्यों नहीं पकड़े जा रहे? कारखास और बिचौलियों की जांच क्यों नहीं? आरोप है कि यही तंत्र असली मैनेजर है।
* गांजा बिक्री खुलेआम, डर खत्म
* युवाओं और छात्रों पर सीधा असर
* आबकारी विभाग की भूमिका संदिग्ध
* कारखास–बिचौलिया तंत्र के आरोप
* मीडिया रिपोर्ट के बावजूद कार्रवाई शून्य
* नशामुक्त अभियान पर गहरा सवाल
यदि ग्रामीणों और समाजसेवियों के आरोप सही हैं, तो चंदौली में फैलता यह कथित गांजा सिंडिकेट केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जवाबदेही पर सीधा सवाल है। अब देखना यह है कि क्या यह रिपोर्ट भी फाइलों में दफन होगी या फिर चंदौली में सचमुच नशे के इस साम्राज्य पर चोट पड़ेगी?




