चन्दौली

सुरक्षा की जंजीरे हुई चकनाचूर, चन्दौली इलिया बॉर्डर पर शराब तस्करी भरपूर

चन्दौली का इलिया बॉर्डर बना माफियाओं का गलियारा, प्रशासन मौन!

● सुरक्षा की जंजीरे हुई चकनाचूर, चन्दौली इलिया बॉर्डर पर शराब तस्करी भरपूर

● चन्दौली का इलिया बॉर्डर बना माफियाओं का गलियारा, प्रशासन मौन!

● इलिया बॉर्डर पर शराब तस्करी का खेल बेखौफ जारी

● देशी शराब ठेकों से होती है बड़ी मात्रा में सप्लाई

● तस्करी नेटवर्क को राजनीतिक संरक्षण का शक

● पुलिस की मौजूदगी के बावजूद तस्करों का मनोबल बुलंद

● ग्रामीणों में गुस्सा और प्रशासन से मोहभंग

● खुफिया जानकारी लीक होने के संकेत

● सुरक्षा बलों की तैनाती निष्फल साबित

● उच्चस्तरीय जांच और दोषियों की जवाबदेही तय हो

 

राजकुमार सोनकर

 

चंदौली। उत्तर प्रदेश व बिहार की सीमा पर सुरक्षा के सारे दावे खोखले साबित हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शून्य सहिष्णुता नीति और प्रशासनिक सख्ती की दुहाई देने वाली पुलिस अब इलिया बॉर्डर पर मूक दर्शक बन गई है। न दिन की परवाह, न रात का डर शराब से लदी मोटरसाइकिलें और छोटे वाहन खुलेआम बॉर्डर पार कर रहे हैं। यूपी की धरती से बिहार तक बहती नशे की नदी अब इतनी गहरी हो चुकी है कि उसे रोकना प्रशासन के बूते से बाहर दिखता है। सवाल सीधा है अगर 24 घंटे सुरक्षा बल तैनात हैं, तो तस्कर निकल कैसे जाते हैं? जवाब देने वाला कोई नहीं। न पुलिस, न खुफिया तंत्र, न प्रशासन। सबकी चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

बॉर्डर पर बेखौफ तस्करी, पुलिस बेबस

इलिया थाना क्षेत्र से लगे यूपी-बिहार बॉर्डर पर शराब तस्करी अब खुले कारोबार में तब्दील हो चुकी है।
सुबह-शाम शराब से लदी मोटरसाइकिलें, टेम्पो और चारपहिया गाड़ियां बिहार की ओर निकलती हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि ये सब कुछ पुलिस की आंखों के सामने होता है। कभी-कभी रोकथाम के नाम पर दिखावटी चेकिंग कर ली जाती है, लेकिन असल कार्रवाई का नाम नहीं। ग्रामीणों का कहना है कि यहां पुलिस नहीं, तस्करों के लिए सहूलियत डेस्क बैठी है।

ठेकों से निकलती शराब, बॉर्डर तक पहुंचती सप्लाई

सूत्रों की मानें तो यह पूरा तस्करी नेटवर्क देशी शराब की दुकान नंबर 1, 2 और कंपोजिट दुकानों से संचालित होता है। कुछ शराब ठेकेदारों ने एजेंटों और डिलीवरी चालकों की एक संगठित चैन बना रखी है, जो रोजाना हजारों लीटर शराब बिहार भेजते हैं। बिहार में शराबबंदी कानून लागू है, लेकिन यूपी से हो रही यह सप्लाई राज्य सीमा को छेद रही है। सवाल उठता है इतने बड़े स्तर पर सप्लाई कैसे होती है, अगर पुलिस हर रूट पर मौजूद है।

राजनीतिक संरक्षण और चुनावी गणित का नशा

स्थानीय सूत्र बताते हैं कि यह कारोबार केवल तस्करी नहीं, बल्कि राजनीतिक पूंजी का हिस्सा बन चुका है।
कुछ रसूखदार लोग इस नेटवर्क को संरक्षण दे रहे हैं ताकि चुनावी फंडिंग और प्रभाव दोनों बन सके। जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे शराब की मांग बढ़ती जा रही है। इसके चलते इलिया, नौगढ़, चकरघट्टा और औरवां बॉर्डर पर शराब की खेप दोगुनी रफ्तार से जा रही हैं। चुनावी मौसम में प्रशासनिक सन्नाटा और खुफिया तंत्र की विफलता कई सवालों को जन्म दे रही है।

पुलिस है, मगर जनता के लिए नहीं

इलिया के आसपास के गांवों गोधना, पिलिकिट, सिसौरा और जोगनीपुर के ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पुलिस की मौजूदगी अब केवल दिखावा बन गई है।
हर दिन शराब की गाड़ियां निकलती हैं, लेकिन पुलिस का रुख नजर अंदाज करने वाला होता है। ग्रामीणों का कहना है कि जब भी किसी संदिग्ध गतिविधि की सूचना दी जाती है, पुलिस को पहले से जानकारी मिल जाती है और तस्कर रास्ता बदल लेते हैं, पुलिस वही पुरानी जगह जाकर तलाशी दिखाती है। लोगों का कहना है कि अब यह रोजमर्रा की घटना बन चुकी है, जिससे जनता में भारी आक्रोश है।

सुरक्षा की तीन परतें, फिर भी सिस्टम फेल

बॉर्डर की निगरानी के लिए यूपी पुलिस की दो शिफ्टों में 12-12 घंटे की ड्यूटी है। बिहार की ओर सीआरपीएफ और बिहार पुलिस लगातार कैंप किए हुए हैं। इसके बावजूद तस्करी का सिलसिला जारी है। यह स्थिति प्रशासन की संवेदनहीनता और सिस्टम की सड़ांध को उजागर करती है। अगर इतने सख्त पहरे में भी शराब की खेप निकल रही हैं, तो यह केवल खुफिया लीक या मिलीभगत का मामला ही हो सकता है। स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था पर अब जनता का भरोसा डगमगाने लगा है।

एडिशनल एसपी की बयानबाजी के बाद भी नहीं रुक रही तस्करी

मीडिया ने सवाल उठाया, तो एडिशनल एसपी दिगम्बर कुशवाहा ने कहा कि बॉर्डर पर कड़ी निगरानी है, पुलिस लगातार गश्त कर रही है, संदिग्ध वाहनों पर कार्रवाई की जा रही है। लेकिन सवाल ये है कि अगर गश्त इतनी सख्त है, तो तस्करी क्यों जारी है। पुलिस के बयान अब जनता के भरोसे को नहीं, बल्कि तस्करों के आत्मविश्वास को मजबूत कर रहे हैं। स्थानीय लोग इसे कागजी सख्ती और जमीनी ढील का मामला बता रहे हैं।

खुफिया तंत्र की नाकामी कार्रवाई नहीं

इलिया बॉर्डर पर शराब का यह नेटवर्क इतना संगठित है कि पुलिस के हर मूवमेंट की खबर तस्करों तक पहले पहुंच जाती है। सूत्रों का दावा है कि सूचना लीक का खेल अंदर से हो रहा है। कुछ स्थानीय पुलिसकर्मी और ठेकेदारों के बीच गुप्त सौदेबाजी की बात भी सामने आ रही है। जिस खुफिया तंत्र को अपराध रोकना था, वही अब माफियाओं के लिए ढाल बन गया है। यही कारण है कि तमाम चौकसी और ड्यूटी के बावजूद तस्करी का सिलसिला थम नहीं रहा।

कब रुकेगा यह नशे का कारवां?

इलिया बॉर्डर पर शराब तस्करी अब एक खुला सच बन गई है। यह सिर्फ प्रशासनिक नाकामी नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था पर कलंक है। स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि इस पूरे नेटवर्क की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
उनका कहना है कि जब तक प्रशासनिक मिलीभगत और राजनीतिक संरक्षण का खुलासा नहीं होगा, तब तक यह तस्करी शासन की साख और जनता के विश्वास दोनों को खोखला करती रहेगी। इलिया बॉर्डर आज कानून के शासन पर एक गहरा धब्बा बन चुका है। जहां चौकसी की बात होती है, वहां माफिया अपनी राह बनाते हैं। जहां पुलिस तैनात है, वहां तस्कर पार कर जाते हैं। यह स्थिति बताती है कि सख्ती सिर्फ प्रेस रिलीज में है, जमीन पर नहीं। जब तक सिस्टम की जड़ में बैठे भ्रष्टाचार पर वार नहीं होगा, इलिया बॉर्डर पर नशे की यह धारा प्रशासन के चरित्र को बहाकर ले जाएगी।

* इलिया बॉर्डर पर तस्करी का खुला खेल सुरक्षा एजेंसियों की नाक के नीचे जारी कारोबार
* देशी शराब ठेकों से संचालित हो रहा सिंडिकेट रोजाना हजारों लीटर की सप्लाई बिहार तक
* राजनीतिक संरक्षण के आरोप चुनावी मौसम में तस्करी चरम पर
* पुलिस की मौजूदगी सिर्फ दिखावे की, कार्रवाई नाममात्र की
* सुरक्षा तंत्र पर गहरा सवाल खुफिया लीक या मिलीभगत?
* दोनों राज्यों के पुलिस की तैनाती के बावजूद सिस्टम फेल
* एडिशनल एसपी का दावा गश्त जारी, लेकिन नतीजे शून्य
* उच्चस्तरीय जांच और माफिया नेटवर्क पर शिकंजा कसने की मांग

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