सौ साल से जारी है संघ का भारत मे नफरत फैलाने का एजेंडा,मुँह राम दिमाग में नाथूराम दिल इनके बसता है दंगा

संघ चलाती है नफरत की फैक्ट्री और हिंदू राष्ट्र का एजेंडा
नफरत की भाषा: सद्भाव के मुखौटे तले जहर
अखंड भारत का नारा या अल्पसंख्यकों के खिलाफ चेतावनी
जनसंख्या का डर और ‘तीन बच्चे’ का फार्मूला
घुसपैठ का शोर बंगाल और पूर्वोत्तर की राजनीति
साझा संस्कृति का भ्रम बनाम विविधता की सच्चाई
औपनिवेशिक व्याख्या से फासीवादी एजेंडे तक
स्वतंत्रता संग्राम से दूरी और झूठी दावेदारी
हिंदू राष्ट्र की जिद और लोकतंत्र पर खतरा
सौ साल से संघ परिवार ने भारतीय समाज की नसों में एक धीमा जहर घोला है। सद्भाव और परोपकार की बात करते हुए उसके नेता हर बार विभाजन की खुराक पिलाते हैं। मोहन भागवत के हालिया भाषण से यह साफ है कि आरएसएस अब भी वहीं खड़ा है। जहां नफरत, संकीर्णता और हिंदू राष्ट्र की हठ है। अखंड भारत की आड़ में मुसलमानों और ईसाइयों को ‘पराये’ ठहराना, जनसंख्या के नाम पर डर फैलाना और घुसपैठियों का भूत खड़ा करना संघ की रणनीति वही है, बस पैकिंग नई है। असल सवाल यही है कि लोकतंत्र की 100 साल की यात्रा में संघ ने भारत को दिया क्या। जवाब वही है सांप्रदायिक विभाजन और सत्ता का लालच।
* आरएसएस ने 100 वर्षों में नफरत और विभाजन की राजनीति को ही मजबूत किया।
* भाषणों में सद्भाव और अखंड भारत के नारों के पीछे छिपा है अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर।
* जनसंख्या और घुसपैठ का मुद्दा डर फैलाने का साधन है।
* विविधता को नकारकर एक संस्कृति, एक नस्ल, एक धर्म का एजेंडा लोकतंत्र के लिए खतरा है।
* स्वतंत्रता संग्राम से दूरी और औपनिवेशिक व्याख्या पर टिके रहना संघ की असल पहचान है।
* संघ का मूल लक्ष्य भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना अब भी जस का तस है।
सद्भाव के मुखौटे तले जहर
आरएसएस का सबसे बड़ा हुनर है नफरत को परोपकार की भाषा में पेश करना। मोहन भागवत कहते हैं, सर्वे भवंतु सुखिनः, पर उसी सांस में मुसलमानों और ईसाइयों को भय त्यागने की सलाह देते हैं। यह सलाह दरअसल एक धमकी है। संदेश साफ है हिंदुओं की एकता तुम्हारे लिए खतरा बन सकती है, इसलिए डरो मत, समर्पण कर दो। संघ ने अपनी एक अलग भाषा विकसित कर ली है। यह भाषा सुनने में आध्यात्मिक लगती है, पर असल में हर वाक्य के भीतर अल्पसंख्यकों के लिए संदेह, नफरत और हाशिये की चेतावनी भरी होती है। यही कारण है कि परोपकार के नाम पर हर पहल दरअसल विभाजन की जड़ मजबूत करती है।
अखंड भारत अल्पसंख्यकों के खिलाफ चेतावनी
संघ प्रमुख का दावा है कि अखंड भारत केवल राजनीति नहीं, बल्कि जनचेतना की एकता है। परन्तु यह एकता की आड़ में एकरूपता थोपने का खेल है। अगर भारत पहले से एकजुट है तो हिंदुओं को जागृत होने का नारा क्यों और मुसलमानों से भय त्यागने की सलाह क्यों। यह सीधा-सीधा संदेश है कि हिंदू संगठित होंगे, बाकी धर्मावलंबी दबकर रहें। अखंड भारत का विचार भारत की बहु-सांस्कृतिक परंपरा को नकारता है। यह उस विविधता को मिटाने की साज़िश है, जिसने भारत को हजारों वर्षों तक जीवंत रखा।
जनसंख्या का डर और ‘तीन बच्चे’ का फार्मूला
आरएसएस वर्षों से यह प्रचार करता आया है कि मुसलमान हिंदुओं से ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं और एक दिन उनकी आबादी हिंदुओं से आगे निकल जाएगी।
तथ्य क्या कहते हैं कि यह सिर्फ एक मिथक है। मुसलमानों की जन्मदर में भी लगातार गिरावट हो रही है और कभी ऐसा नहीं होगा कि वे हिंदुओं से अधिक संख्या में हो जाएं। फिर भी मोहन भागवत का बयान आया परिवार की संस्था को बचाने के लिए कम से कम तीन बच्चे पैदा करें। यह बयान दरअसल राजनीतिक हथियार है, जिससे बहुसंख्यकों में भय पैदा कर उन्हें संख्या के आधार पर लामबंद किया जा सके।
बंगाल और पूर्वोत्तर की राजनीति
घुसपैठ का मुद्दा भाजपा-आरएसएस की चुनावी राजनीति का प्रिय हथियार है। बंगाल के बांग्लाभाषी मुसलमानों को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताकर बदनाम करना। पूर्वोत्तर के राज्यों में दशकों से अस्थिरता इसी डर पर खड़ी है। गृहमंत्री की जिम्मेदारी है कि सीमा पर निगरानी रखें। पर सवाल यह नहीं उठाया जाता। इसके बजाय विपक्षी दलों और खास समुदायों पर ठीकरा फोड़कर माहौल गरमाया जाता है। अगर बांग्लादेशी सचमुच भारत में आ भी गए हैं तो क्या उन्हें मानवता की कसौटी पर परे धकेल देना ही समाधान है। संघ तो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक सांस्कृतिक इकाई मानता है, फिर अचानक यह पाखंड क्यों।
साझा संस्कृति का भ्रम
भागवत कहते हैं हम ईसाई या इस्लाम धर्म को मान सकते हैं, लेकिन यूरोपीय या अरब नहीं हैं। हम भारतीय हैं। यह कथन सुनने में देशभक्ति लगता है, पर असल में यह धर्म की अस्वीकृति है। भारत का इतिहास बताता है कि यह भूमि सांस्कृतिक संगम है। यूनानी, फारसी, अरब, कुषाण, हूण, शक सभी अपनी परंपराएं लेकर आए और इस मिट्टी को समृद्ध किया। यहां यहूदी, पारसी, ईसाई और इस्लाम ने अपनी जड़ें जमाईं और भारत को बहुरंगी बनाया। संघ का एक संस्कृति, एक वंश का विचार इस समृद्ध विविधता का गला घोंटता है।
संघ आज भी उसी औपनिवेशिक इतिहास पर अटका है, जिसमें मुसलमान आक्रमणकारी बताए जाते हैं और हिंदू पीड़ित। यह सोच भारत की वास्तविकता नहीं बल्कि ब्रिटिश राज की राजनीतिक व्याख्या थी, जिसका मकसद फूट डालो और राज करो था। नाजी जर्मनी की तरह संघ भी अल्पसंख्यकों को बलि का बकरा बनाकर बहुसंख्यकों को संगठित करना चाहता है। यही कारण है कि उसके भाषणों में फासीवादी विचारधारा की झलक साफ दिखाई देती है।
स्वतंत्रता संग्राम से दूरी और झूठी दावेदारी
संघ दावा करता है कि उसने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। गांधीजी की हत्या में संघ की विचारधारा की भूमिका सबके सामने है। भगत सिंह, नेहरू, सुभाष बोस जैसे नेताओं के आंदोलन में संघ कहीं नहीं दिखता।
संघ ने आजादी की लड़ाई में दूरी ही बनाई। उसका मकसद उस समय भी अलग था औपनिवेशिक ताकतों के साथ सह-अस्तित्व और भविष्य के हिंदू राष्ट्र की जमीन तैयार करना।
हिंदू राष्ट्र की जिद लोकतंत्र पर खतरा
आज जब संघ 100 साल पूरे कर रहा है, उसका मूल एजेंडा जस का तस है। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना।
यह एजेंडा भारत के संविधान, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र से सीधा टकराता है। संविधान कहता है कि भारत सभी धर्मों और संस्कृतियों का देश है।संघ कहता है कि भारत सिर्फ हिंदुओं का देश है। यही टकराव आने वाले दशकों में भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए सबसे बड़ा खतरा बनने जा रहा है।
* सौ साल की जहरीली विरासत आरएसएस ने समाज को जो दिया, वह है सांप्रदायिकता, विभाजन और नफरत की जड़ें।
* सद्भाव के नाम पर छल भागवत के भाषणों में दिखता है आध्यात्मिक आवरण, लेकिन हर वाक्य के भीतर अल्पसंख्यकों को डराने की चेतावनी छिपी रहती है।
* अखंड भारत का छलावा एकता की आड़ में थोपना चाहता है एकरूपता, विविधता मिटाकर मुसलमानों-ईसाइयों को ‘पराया’ ठहराने का प्रोजेक्ट।
* जनसंख्या का झूठा खौफ मुसलमानों की बढ़ती आबादी का डर फैलाकर ‘तीन बच्चे’ का फार्मूला पेश करना, बहुसंख्यकों को लामबंद करने का हथियार।
* घुसपैठ का चुनावी भूत बांग्लाभाषी मुसलमानों को बांग्लादेशी बताना और पूर्वोत्तर में डर का माहौल बनाना, असली जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना।
* साझा संस्कृति का गला घोंटना भारत की हजारों साल की बहुरंगी परंपराओं को नकारकर एक नस्ल, एक धर्म, एक संस्कृति का नकली एजेंडा थोपना।
* औपनिवेशिक मानसिकता और फासीवादी असर ब्रिटिश राज की ‘फूट डालो और राज करो’ वाली व्याख्या को ढोना, नाजी जर्मनी जैसी राजनीति का अनुसरण करना।
* स्वतंत्रता संग्राम से भागीदारी का झूठ असलियत यह कि संघ ने आजादी की लड़ाई से दूरी बनाई, गांधी की हत्या में विचारधारा की भूमिका उजागर।
* हिंदू राष्ट्र की हठधर्मिता – संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के खिलाफ खुली बगावत; लोकतंत्र पर सबसे बड़ा खतरा यही एजेंडा।
* लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी अगर यह एजेंडा आगे बढ़ा तो आने वाले दशकों में भारत का लोकतांत्रिक ढांचा ढह सकता है।




