स्वरुप रानी अस्पताल का यमराज सरीखा किरदार,बृजेश पाठक का दामन दागदार
इलाज से पहले फोन जरूरी यूपी में डॉक्टर नहीं, मंत्री तय करेंगे कौन जिएगा

अस्पताल जाने से पहले बीपी नहीं, मंत्री जी का नंबर चेक करें
बिना सिफारिश इलाज जोखिम भरा, जानलेवा भी हो सकता
ऑपरेशन सफल, लेकिन फोन फेल नतीजा मौत
ओ पॉजिटिव या एबी पॉजिटिव नहीं, वीआईपी पॉजिटिव सबसे सुरक्षित
गलती अस्पताल की नहीं, मरीज की क्यों पैदा हुए आम आदमी?
कोर्ट बोले जीवन मौलिक अधिकार, सिस्टम बोला पहले फोन कराओ
मेडिकल कॉलेज नहीं, राजनीतिक कॉल सेंटर बनते अस्पताल
शानदार स्वास्थ्य व्यवस्था बस मंत्री जी तक पहुंच होनी चाहिए

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य तंत्र अब किसी साधारण चिकित्सा व्यवस्था का नाम नहीं रहा, बल्कि यह एक उन्नत, आधुनिक और पूरी तरह से फोन-आधारित प्रणाली में तब्दील हो चुका है। मार्च 2022 के बाद से सरकार लगातार दावा करती रही है कि प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं पहले से कहीं बेहतर, संवेदनशील और जवाबदेह हो चुकी हैं। और सच भी है आज इलाज पहले से कहीं ज्यादा तेज है, बशर्ते आपके पास डॉक्टर की पर्ची के साथ किसी मंत्री, विधायक या उनके निजी सचिव का मोबाइल नंबर मौजूद हो। बिना फोन, बिना सिफारिश और बिना पहचान के इलाज अब एक खतरनाक प्रयोग बन चुका है। अब अस्पतालों में मरीज की हालत नहीं पूछी जाती, पहले यह पूछा जाता है किसके रेफरेंस से आए हैं? अगर जवाब में कोई नाम है, तो स्ट्रेचर दौड़ने लगता है, डॉक्टर मुस्कुराने लगते हैं और बेड अपने आप खाली हो जाता है। लेकिन अगर जवाब है कोई नहीं, तो समझ लीजिए कि मरीज नहीं, बल्कि उसकी किस्मत आईसीयू में भर्ती हो गई है। प्रयागराज के स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल की वह हकीकत है, जिसने सरकार के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी। 55 वर्षीय उर्मिला सिंह की कहानी कोई अपवाद नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जहां इलाज का आधार मेडिकल साइंस नहीं, बल्कि राजनीतिक पहुंच बन चुकी है। उर्मिला सिंह का कसूर बस इतना था कि वह एक आम नागरिक थीं और उनके बेटे सौरभ सोमवंशी ने यह मान लिया था कि डॉक्टर अपना काम करेंगे और अस्पताल मरीज की जान बचाने के लिए होता है। यही भरोसा उनकी सबसे बड़ी भूल बन गया। 3 दिसंबर 2024 को जब सौरभ अपनी मां को सिर में चोट लगने के बाद स्वरूप रानी अस्पताल लेकर पहुंचे, तो उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि वे इलाज के लिए नहीं, बल्कि एक सिस्टम-प्रयोग का हिस्सा बनने जा रहे हैं। जांच हुई, डॉक्टरों ने न्यूरोलॉजी की समस्या बताई और ऑपरेशन की सलाह दी। 4 दिसंबर को ऑपरेशन हुआ और वह सफल भी रहा। परिवार को लगा कि सरकार के दावे सही हैं, स्वास्थ्य व्यवस्था वाकई सुधर गई है। लेकिन उन्हें क्या पता था कि असली परीक्षा ऑपरेशन के बाद शुरू होगी। शाम ढलते ही अस्पताल के ब्लड बैंक से खून आया और चढ़ा दिया गया। पर यह खून इलाज के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था की बेरुखी का प्रमाण बन गया। ओ पॉजिटिव की जगह एबी पॉजिटिव खून चढ़ा दिया गया। यह एक ऐसी गलती थी, जो मेडिकल कॉलेज के इतिहास में नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही के इतिहास में दर्ज होनी चाहिए। इसके बाद किडनी, लीवर, हार्ट सहित शरीर के अंग एक-एक कर जवाब देने लगे। एंटीबायोटिक दवाएं भी बेअसर हो गईं। यहां से कहानी एक मरीज की नहीं रहती, बल्कि पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था का पोस्टमार्टम बन जाती है। एक न्यूरोलॉजी मरीज को नेफ्रोलॉजी में शिफ्ट किया जाता है, डायलिसिस शुरू होती है और परिवार इलाज से ज्यादा सिस्टम से लड़ने में थक जाता है। अंततः वही होता है, जो अक्सर बिना सिफारिश वाले मरीजों के साथ होता है मौत। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन का रवैया इस कहानी को व्यंग्य से त्रासदी में बदल देता है। गलती मानने के बजाय, दोष मरीज पर मढ़ दिया जाता है। कहा जाता है कि अगर वह बीमार होकर अस्पताल आई ही नहीं होती, तो यह सब न होता। यानी अब बीमारी भी मरीज की गलती है और मौत उसकी जिम्मेदारी। मामला जब इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने इसे सिर्फ एक मेडिकल लापरवाही नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के रूप में देखा। अदालत ने साफ कहा कि जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है, लेकिन उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य तंत्र इस अधिकार की रक्षा करने में असफल रहा है। तभी तो अदालत ने इस अस्पताल को मौत का घर कहा। यह किसी एक अस्पताल या एक डॉक्टर की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है, जहां इलाज से पहले फोन जरूरी है। जहां आम आदमी की जान की कीमत एक मिस्ड कॉल से भी कम है। और जहां सरकार के शानदार स्वास्थ्य दावों की असली सच्चाई अस्पताल के वार्डों में दम तोड़ती नजर आती है।

अस्पताल नहीं, सिफारिश केंद्र
प्रयागराज का स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल अब एक चिकित्सा संस्थान से अधिक सिफारिश-आधारित सेवा केंद्र बन चुका है। यहां इलाज की शुरुआत मरीज की बीमारी से नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक और सामाजिक हैसियत से होती है। कौन मरीज किसके माध्यम से आया है यही तय करता है कि उसे बेड मिलेगा या बेंच, डॉक्टर देखेंगे या फाइल देखी जाएगी। मेडिकल कॉलेज का दर्जा अब डिग्री बांटने तक सीमित रह गया है, इलाज का असली संचालन सत्ता की परछाईं में होता है। यह स्थिति कोई अचानक पैदा नहीं हुई। वर्षों से स्वास्थ्य सेवाओं में पनप रही जवाबदेहीहीनता, राजनीतिक हस्तक्षेप और अफसरशाही की लापरवाही ने मिलकर अस्पतालों को ऐसा बना दिया है, जहां आम आदमी मरीज नहीं, बल्कि बोझ समझा जाता है। स्वरूप रानी अस्पताल इसका सबसे भयावह उदाहरण बनकर सामने आया है।
एक मौत, जो सवाल बन गई
उर्मिला सिंह की मौत केवल एक मरीज की मृत्यु नहीं थी, बल्कि यह उस पूरे तंत्र की विफलता का प्रमाण थी, जो खुद को मार्च 2022 के बाद बदला हुआ बताने का दावा करता है। एक सामान्य न्यूरोलॉजी केस, जिसमें सफल ऑपरेशन के बाद मरीज को घर लौट जाना चाहिए था, वह सिस्टम की लापरवाही और संवेदनहीनता की भेंट चढ़ गया। गलत ब्लड ट्रांसफ्यूजन कोई छोटी चूक नहीं, बल्कि यह मेडिकल अपराध की श्रेणी में आता है। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने इसे स्वीकार करने के बजाय नकारने, छिपाने और घुमाने की पूरी कोशिश की। यही वह बिंदु है, जहां मामला सिर्फ स्वास्थ्य विभाग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शासन और प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े करता है।
ब्लड बैंक लापरवाही का अड्डा
किसी भी अस्पताल का ब्लड बैंक उसकी रीढ़ होता है। लेकिन स्वरूप रानी अस्पताल का ब्लड बैंक इस घटना में लापरवाही का केंद्र बनकर सामने आया। ओ-पॉजिटिव की जगह एबी पॉजिटिव खून चढ़ा दिया जाना यह बताने के लिए काफी है कि यहां मानक प्रक्रियाओं का कितना पालन होता है। सवाल यह भी है कि रिटायरमेंट के बाद भी जिम्मेदारी संभाल रही डॉक्टर वत्सला मिश्रा की निगरानी में यह गलती कैसे हुई और इसके बाद भी उन्हें पद पर बनाए रखने का आधार क्या है? यह केवल एक व्यक्ति की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सामूहिक विफलता है। जांच, सत्यापन और क्रॉस-चेक जैसी बुनियादी प्रक्रियाएं अगर सही से लागू होतीं, तो यह हादसा टल सकता था।
प्रशासनिक बचाव की रणनीति
घटना के बाद अस्पताल और मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने जो रवैया अपनाया, वह किसी भी संवेदनशील संस्था के लिए शर्मनाक कहा जाएगा। पहले गलती से इनकार, फिर मरीज के अस्तित्व पर ही सवाल, और अंत में दस्तावेजों को छिपाने की कोशिश यह सब दर्शाता है कि प्रशासन की प्राथमिकता मरीज नहीं, बल्कि अपनी कुर्सी और छवि बचाना है। 43 पन्नों के जवाब में यह कहना कि उर्मिला सिंह को कोई ब्लड दिया ही नहीं गया, न केवल अदालत को गुमराह करने का प्रयास था, बल्कि मृतक और उसके परिवार के घावों पर नमक छिड़कने जैसा था।
कोर्ट की दखल और सिस्टम की पोल
जब मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, तब जाकर इस पूरे प्रकरण पर परत-दर-परत से पर्दा उठना शुरू हुआ। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह और राणा सिंह द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों ने अस्पताल प्रशासन के झूठ को बेनकाब कर दिया। इसके बाद अदालत को सख्त रुख अपनाना पड़ा। अदालत की यह टिप्पणी कि जीवन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है, और विभाग इसे सुनिश्चित करने में विफल रहा, सीधे-सीधे शासन की कार्यशैली पर तमाचा थी। मौत का घर जैसी टिप्पणी किसी भावनात्मक आवेग में नहीं, बल्कि तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर की गई थी। इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के अपर महाधिवक्ता को भी अंततः यह स्वीकार करना पड़ा कि अस्पताल से गंभीर गलती हुई है। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में बताती है कि मामला कितना मजबूत और लापरवाही कितनी स्पष्ट थी। यह स्वीकारोक्ति केवल एक केस तक सीमित नहीं है। यह उन तमाम मामलों की ओर इशारा करती है, जो कभी सामने नहीं आ पाते, क्योंकि हर पीड़ित के पास अदालत तक जाने की हिम्मत या संसाधन नहीं होते।
बृजेश पाठक का विभाग और जवाबदेही
स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक का विभाग पहले भी सवालों के घेरे में रहा है। कोरोना काल में व्यवस्थाओं को लेकर लिखी गई चिट्ठियां हों या आज अस्पतालों की जमीनी हकीकत दोनों के बीच का अंतर साफ दिखता है। सवाल यह है कि जब इतने गंभीर मामलों में भी जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो सुधार कैसे होगा? इस पूरे प्रकरण से सिस्टम ने आम जनता को एक स्पष्ट संदेश दिया है अगर आप सिफारिश के साथ नहीं आए हैं, तो आपकी जान की कीमत बेहद कम है। सरकारी अस्पतालों में इलाज अब अधिकार नहीं, बल्कि कृपा बन चुका है। जब एक अस्पताल इलाज के बजाय मौत का कारण बनने लगे, जब गलती स्वीकार करने के बजाय छिपाई जाए, और जब पीड़ित को ही दोषी ठहराया जाए, तो ऐसे संस्थान को मौत का घर कहना अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि सटीक वर्णन है। यह रिपोर्ट केवल उर्मिला सिंह की मौत की कहानी नहीं है। यह उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र की आत्मा का एक्स-रे है, जिसमें हड्डियां तो दिख रही हैं, लेकिन संवेदनशीलता और जवाबदेही गायब है।
* यूपी में इलाज से पहले सिफारिश जरूरी।
* गलत खून, सही सिस्टम की पहचान।
* गलती मरीज की, क्योंकि वह आम था।
* अस्पताल प्रशासन जवाबदेही से मुक्त।
* कोर्ट की फटकार, सिस्टम बेपरवाह।
* स्वास्थ्य तंत्र में वीआईपी बनाम आम नागरिक।
* ‘मौत का घर’ कोई अतिशयोक्ति नहीं।
* बिना फोन इलाज जान जोखिम में।




