स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की योगी को घेरने की रणनीति हुई फेल,महाराज ने स्वामी का निकाल दिया तेल
अविमुक्तेश्वरानंद की सभा में खाली कुर्सियां, योगी को घेरने की कोशिश फ्लॉप

- हिंदुत्व की राजनीति में खुद घिर गए शंकराचार्य
- योगी सरकार को घेरने के लिए आयोजित कार्यक्रम में उम्मीद से बेहद कम भीड़
- सपा-कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी के बावजूद खाली रहीं कुर्सियां
- गो रक्षा के मुद्दे पर योगी को घेरने की कोशिश, लेकिन सवालों में घिरे शंकराचार्य
- केरल, मिजोरम और पश्चिम बंगाल में गौ हत्या पर खामोशी क्यों?
- उत्तर प्रदेश में 2020 से गौ हत्या को जघन्य अपराध घोषित कर चुकी है सरकार
- माघ मेले में धरने के दौरान भी नहीं जुटा जनसमर्थन
- सनातन के नाम पर राजनीति के आरोपों में उलझे अविमुक्तेश्वरानंद
- हिंदुत्व की राजनीति में योगी आदित्यनाथ की चुनौती बरकरार

लखनऊ। काशीराम उपवन में आयोजित एक बहुप्रचारित धार्मिक-राजनीतिक कार्यक्रम ने अनजाने में ही उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक बड़ा सच उजागर कर दिया। सनातन, गाय और हिंदुत्व के नाम पर आयोजित इस सभा का उद्देश्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को घेरना था, लेकिन मंच पर मौजूद नेताओं और धर्मगुरुओं के भाषणों से ज्यादा चर्चा उस दृश्य की हुई, जिसमें सामने लगी सैकड़ों कुर्सियां खाली दिखाई दे रही थीं। कार्यक्रम का आयोजन देश के चार प्रमुख शंकराचार्यों में गिने जाने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा किया गया था, जिन्होंने लंबे समय से योगी सरकार पर यह आरोप लगाया है कि वह गौ रक्षा और सनातन के मुद्दों पर वास्तविक काम नहीं कर रही है। कार्यक्रम से पहले इसके बड़े पैमाने पर सफल होने का दावा किया गया था। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि यह सभा योगी सरकार के खिलाफ एक बड़ा धार्मिक-राजनीतिक संदेश देने वाली है। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के कई नेताओं ने इस कार्यक्रम को समर्थन देने की घोषणा भी की थी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक रविदास मेहरोत्रा सहित कई नेता कार्यक्रम में मौजूद भी रहे। लेकिन इन सबके बावजूद जनसमर्थन का जो दृश्य सामने आया, उसने आयोजकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
सभा में अपेक्षित भीड़ न जुट पाने से यह सवाल भी उठने लगे कि क्या वास्तव में जनता इस तरह की राजनीतिक धार्मिक मुहिम को लेकर उत्साहित है। खास तौर पर तब, जब उत्तर प्रदेश में पहले से ही गौ हत्या के खिलाफ कड़े कानून लागू हैं। वर्ष 2020 में राज्य सरकार ने कानून में संशोधन कर गौ हत्या को जघन्य अपराध की श्रेणी में रखा है। ऐसे में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि देश के कुछ राज्यों में खुले तौर पर गौ हत्या की अनुमति है तो वहां आंदोलन क्यों नहीं किया जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कार्यक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिंदुत्व के मुद्दे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पकड़ बेहद मजबूत है। पिछले कुछ वर्षों में कानून-व्यवस्था, माफिया के खिलाफ कार्रवाई और धार्मिक आयोजनों के बड़े स्तर पर आयोजन जैसे कदमों ने उन्हें हिंदुत्व की राजनीति का प्रमुख चेहरा बना दिया है। यही कारण है कि जब भी इस मुद्दे पर उन्हें चुनौती देने की कोशिश होती है तो वह अपेक्षित जनसमर्थन हासिल नहीं कर पाती। दरअसल यह पहला मौका नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के किसी आंदोलन को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। माघ मेले के दौरान बसंत पंचमी के अवसर पर भी उन्होंने धरना और अनशन किया था, लेकिन लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ के बावजूद उनका आंदोलन व्यापक जनसमर्थन हासिल नहीं कर सका। कई दिनों तक चले उस आंदोलन के बाद अंततः उन्हें खुद ही धरना समाप्त करना पड़ा था।
लखनऊ में आयोजित यह सभा भी कुछ ऐसी ही स्थिति का शिकार होती दिखाई दी। मंच पर कई राजनीतिक दलों के नेता मौजूद थे, लेकिन आम लोगों की भागीदारी बेहद सीमित रही। इससे यह धारणा भी मजबूत हुई कि जब धार्मिक मंच पर राजनीतिक दलों की सक्रियता ज्यादा दिखाई देती है तो आम लोगों का उत्साह कम हो जाता है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 23 जुलाई से 81 दिन के एक नए अभियान की घोषणा की है, जो गोरखपुर से शुरू होकर वहीं समाप्त होगा। इसके अलावा 24 जुलाई को लखनऊ में फिर से सभा करने की बात भी कही गई है। लेकिन लखनऊ की हालिया सभा के अनुभव ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या इस तरह के अभियानों को वास्तव में जनसमर्थन मिल पाएगा या नहीं।

लखनऊ में आयोजित सभा और उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि
लखनऊ के काशीराम उपवन में आयोजित यह कार्यक्रम औपचारिक रूप से गो प्रतिष्ठा जन जागरण अभियान का हिस्सा बताया गया था। इसका उद्देश्य गौ माता को राज्य माता घोषित करने की मांग और गौ रक्षा के मुद्दे को लेकर जनजागरण करना बताया गया। लेकिन कार्यक्रम के भाषणों और राजनीतिक उपस्थिति ने इसे एक स्पष्ट राजनीतिक रंग दे दिया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने संबोधन में उत्तर प्रदेश सरकार पर यह आरोप लगाया कि राज्य में गौ रक्षा के नाम पर पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार केवल हिंदुत्व के नाम पर राजनीति कर रही है। हालांकि मंच पर मौजूद कई नेताओं के भाषणों और कार्यक्रम की रूपरेखा से यह साफ झलक रहा था कि यह सभा केवल धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश देने के उद्देश्य से भी आयोजित की गई थी।
सपा और कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी
कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कई नेता मौजूद थे। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय, समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा और कांग्रेस के पूर्व एमएलसी दीपक सिंह सहित कई नेताओं ने मंच साझा किया। इन नेताओं की मौजूदगी ने कार्यक्रम को और अधिक राजनीतिक बना दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब धार्मिक मंच पर विपक्षी दलों की इतनी स्पष्ट मौजूदगी दिखाई देती है तो आम लोगों के मन में कार्यक्रम की मंशा को लेकर सवाल उठने लगते हैं।
खाली कुर्सियों ने खींचा ध्यान
कार्यक्रम का सबसे चर्चित पहलू वह दृश्य रहा जिसमें बड़ी संख्या में कुर्सियां खाली दिखाई दीं। आयोजकों ने बड़ी भीड़ की उम्मीद की थी, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग नजर आई। स्थानीय लोगों के अनुसार कार्यक्रम में लगभग एक हजार से डेढ़ हजार लोगों की उपस्थिति रही, जबकि पुलिस बल की संख्या भी लगभग उतनी ही थी। यह दृश्य सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में तेजी से फैल गया और इसे कार्यक्रम की विफलता के रूप में देखा जाने लगा।
माघ मेले का अनुभव भी रहा निराशाजनक
यह पहला मौका नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के किसी आंदोलन को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। माघ मेले के दौरान बसंत पंचमी के अवसर पर उन्होंने धरना और अनशन शुरू किया था। उस समय लाखों श्रद्धालु संगम में स्नान करने पहुंचे थे, लेकिन उनके आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन नहीं मिल सका। कई दिनों तक अनशन करने के बाद अंततः उन्हें आंदोलन समाप्त करना पड़ा।
गौ हत्या कानून पर उठे सवाल
कार्यक्रम के दौरान यह सवाल भी उठा कि यदि गौ हत्या के खिलाफ आंदोलन करना है तो उन राज्यों में क्यों नहीं किया जाता जहां यह खुले तौर पर कानूनी रूप से अनुमति प्राप्त है। केरल, मिजोरम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में गौ हत्या पर प्रतिबंध नहीं है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में 2020 में कानून में संशोधन कर इसे जघन्य अपराध घोषित किया गया है। ऐसे में आंदोलन का केंद्र उत्तर प्रदेश ही क्यों बनाया जा रहा है।
योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक स्थिति
पिछले कुछ वर्षों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। कानून-व्यवस्था पर सख्ती, माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई और धार्मिक आयोजनों के बड़े पैमाने पर आयोजन जैसे कदमों ने उन्हें एक मजबूत राजनीतिक नेता के रूप में स्थापित किया है। विशेष रूप से हिंदुत्व की राजनीति में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।
धर्म और राजनीति का टकराव
लखनऊ की इस सभा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब धार्मिक मंच पर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ जाती है तो उसका प्रभाव क्या होता है। लोगों का मानना है कि धर्म और राजनीति के इस मिश्रण से धार्मिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि इस कार्यक्रम के बाद भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने अभियान को जारी रखने का फैसला किया है। उन्होंने 23 जुलाई से 81 दिन के अभियान की घोषणा की है। यह अभियान गोरखपुर से शुरू होकर वहीं समाप्त होगा और इसके दौरान कई सभाएं और कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
* लखनऊ के काशीराम उपवन में आयोजित हुआ कार्यक्रम
* स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने योगी सरकार को घेरने की कोशिश की
* सपा और कांग्रेस के कई नेता कार्यक्रम में मौजूद रहे अपेक्षा के विपरीत कार्यक्रम में कम भीड़ जुटी
* उत्तर प्रदेश में 2020 से गौ हत्या जघन्य अपराध घोषित
* माघ मेले में भी आंदोलन को नहीं मिला था व्यापक समर्थन
* धर्म और राजनीति के मिश्रण पर उठे सवाल
* 23 जुलाई से 81 दिन के नए अभियान की घोषणा




