परिवहन आयुक्त बीएन सिंह का फिर संदिग्ध हुआ किरदार, फर्जी पंजीयन करने एमपी सिंह को अभी तक बचा रहा मक्कार ?
30 स्लीपर बसों के कागजों में गोलमाल, परिवहन विभाग में महोबा से बरेली तक भ्रष्टाचार की बेशर्मी

30 फर्जी बस पंजीयन की पटकथा, स्लीपर सीटों में हेराफेरी
आईडी प्रूफ का आपराधिक दुरुपयोग, पीड़ित के नाम पर बसें पंजीकृत
बिना सहमति पते का इस्तेमाल, चालानों से बेइज्जती की साजिश
बांदा से बरेली जांच भेजकर लीपापोती का खेल
न्यायालय का स्पष्ट आदेश एफआईआर हो, मगर थाने का बहाना
बृजेश नारायण सिंह की भूमिका संदिग्ध, हर आरोप पर प्रशासन मौन
महोबा से लखनऊ तक रजिस्टर्ड डाकों की झड़ी, मगर सरकार खामोश
अगर बस में आग लगेगी तब ही जागेंगे क्या जिम्मेदार

महोबा। जब एक आम नागरिक का नाम, पता और पहचान फर्जी बसों के पंजीकरण में इस्तेमाल हो, और वह वर्षों तक विभागों में चिट्ठी-पत्री, गुहार, रजिस्ट्री और न्यायालय की चौखटें नापता रहे, लेकिन न तो एफआईआर हो और न ही कोई कार्रवाई तो समझ लीजिए कि सरकारें सुशासन के कितने झूठे दावे करती हैं। यह कोई कहानी नहीं, महोबा के इंद्रानगर निवासी सत्येंद्र कुमार की सच्चाई है, जो सिस्टम से लड़ते हुए थक चुका है। और इस लड़ाई में उसके सामने खड़ा है एक संगठित ‘रजिस्ट्रेशन सिंडिकेट’। जिसका सिरा बरेली से टेढ़ी कोठी(नारायणी कोठा) तक जाता है।
महोबा में तत्कालीन एआरटीओ प्रशासन महेंद्र प्रताप सिंह ने जुलाई 2015 से दिसंबर 2019 के कार्यकाल में 30 स्लीपर बसों का फर्जी पंजीकरण कराया।
जिन बसों को 30 स्लीपर सीटों के रूप में पंजीकृत होना था, वे 56 स्लीपर सीटों के फर्जी विन्यास के साथ रजिस्टर की गईं।
इन बसों के रजिस्ट्रेशन में फर्जी आईडी-प्रूफ लगाए गए
सत्येंद्र के नाम से यूपी-95 टी 7777, यूपी-95 टी 41 व यूपी-95 टी 4877 तो वैध रूप से पंजीकृत थे, लेकिन कई अन्य फर्जी पंजीयन में उन्हीं आईडी का दुरुपयोग हुआ
चालान, जुर्माना और पुलिसिया अपमान का शिकार बना सत्येंद्र, असली दोषी विभागीय अधिकारी
20 फरवरी 2020, 2 मार्च 2020 और 26 अप्रैल 2022 को रजिस्टर्ड डाक से आरटीओ बांदा, लखनऊ, महोबा, जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री को सूचित किया गया, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
मामले की जांच पहले बांदा भेजी गई, लेकिन दबाव में आकर बरेली स्थानांतरित कर दी गई।
बरेली स्थित ‘टेढ़ी कोठी’ (नारायणी कोठा) में जमे परिवहन आयुक्त बृजेश नारायण सिंह पर आरोप है कि उन्होंने पैसे लेकर जांच दबाई।
मास्टर माइंड बृजेश सिंह जिन पर ट्रांसफर-पोस्टिंग घोटाले में वसूली का गंभीर आरोप लगे हैं
लखनऊ के मोहनलालगंज में स्लीपर बस में आग लगने की घटना के बावजूद, इसी विभाग में सुधार की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई।
सत्येंद्र कुमार द्वारा एआरटीओ महोबा के विरुद्ध बीएनएस की धारा 173 (4) के तहत आपराधिक रिपोर्ट दर्ज कराई गई।
कोर्ट ने माना कि यह प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध धारा 134 बीएनएस के तहत एफआईआर होनी चाहिए थी।
सीओ स्तर के अधिकारी ने एफआईआर दर्ज न करते हुए जांच रिपोर्ट सौंप दी
महोबा से बरेली तक सड़ांध, और न्याय की प्रतीक्षा करता एक आम नागरिक
इंद्रानगर, महोबा निवासी सत्येंद्र कुमार अग्निहोत्री का अपराध क्या था? यह कि उन्होंने अपनी गाड़ी का पंजीकरण आरटीओ कार्यालय से कराया? या फिर यह कि उन्होंने अपने वैध दस्तावेज ईमानदारी से विभाग में जमा किए? शायद दोनों। क्योंकि यही वैध दस्तावेज, बिना उनकी जानकारी के, 30 फर्जी बसों के पंजीयन में इस्तेमाल किए गए। अब जब चालान उनके पते पर पहुंचते हैं, तब उन्हें समाज के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ती है, जबकि महोबा से बरेली और लखनऊ तक बैठा परिवहन महकमा अपने भ्रष्टाचार के दलदल में डूबा मुस्कुरा रहा है।
रजिस्ट्रेशन रैकेट का महोबा मॉड्यूल
तारीखें: जुलाई 2015 से दिसंबर 2019
स्थान: महोबा आरटीओ कार्यालय
नायक: तत्कालीन एआरटीओ प्रशासन महेंद्र प्रताप सिंह
इस कालखंड में महेंद्र प्रताप सिंह के कार्यकाल में 30 बसों का फर्जी पंजीकरण किया गया। ये बसें कागजों में 30 स्लीपर सीट की दिखायी गईं, जबकि असल में उनमें 56 स्लीपर सीटें मौजूद थीं। यह सिर्फ तकनीकी अनियमितता नहीं, बल्कि यात्री सुरक्षा से खुला खिलवाड़ था।
आरटीओ कार्यालय में फर्जी एड्रेस प्रूफ, हलफनामे और आधार कार्ड की फोटोकॉपी लगाकर इन बसों को अवैध तरीके से पंजीकृत किया गया। चौंकाने वाली बात यह रही कि इन फर्जी कागजातों में सत्येंद्र कुमार का नाम-पता दर्ज था बिना उनकी सहमति व बिना जानकारी के।
जब आपकी पहचान हथियार बन जाए
सत्येंद्र ने अपनी मोटर साइकिल, डम्पर और कार के रजिस्ट्रेशन के लिए अपने वैध दस्तावेज आरटीओ कार्यालय में जमा किए थे। पर यहीं से एक संगठित ठगी की शुरुआत होती है। उन्हीं दस्तावेजों की फोटोकॉपी कर अन्य बस मालिकों के फर्जी पंजीयन सत्येंद्र के नाम-पते पर कर दिए गए। जिसका परिणाम हुआ-
* फर्जी चालान सत्येंद्र के घर पहुंचते हैं
* स्थानीय पुलिस उन्हें पूछताछ के लिए बुलाती है
* सत्येंद्र की सामाजिक प्रतिष्ठा पर लगता दाग, प्रशासन आंख मूंदे बैठा है
फर्जी मामले की जांच महिबा से बरेली क्यों गई
जब मामला गंभीर हुआ तो वर्ष 2019 में उक्त पत्रावलियां एआरटीओ महोबा से आरटीओ बांदा को जांच हेतु भेजी गईं। लेकिन यहीं से लीपापोती का सिलसिला शुरू हो गया। बांदा में जांच आगे बढ़ती, इससे पहले पत्रावली को रहस्यमयी तरीके से बरेली स्थानांतरित कर दिया गया। क्योंकि वहां बैठे हैं परिवहन आयुक्त बृजेश नारायण सिंह, जिन पर पहले से ट्रांसफर-पोस्टिंग में घूसखोरी के आरोप हैं। नारायणी कोठा के नाम से प्रसिद्ध कोठी को जानने वाले उसे टेढ़ी कोठी कहते हैं। जो भ्रष्ट तंत्र का प्रतीक बनी है।
अदालत ने कहा एफआईआर करो, पुलिस बोली नहीं करेंगे!
सत्येंद्र कुमार ने थक-हारकर न्यायालय की शरण ली। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया कि यह प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध है, और बीएनएस की धारा 134 के तहत प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए। लेकिन 6 अगस्त 2024 को क्षेत्राधिकारी ने अदालत के आदेश के बावजूद एफआईआर नहीं दर्ज की। सिर्फ एक ‘निष्कर्ष रिपोर्ट’ बनाकर मामला रफा-दफा कर दिया गया। यह न सिर्फ न्यायालय की अवमानना है, बल्कि लोकतंत्र के बुनियादी मूल्य कानून के राज की हत्या है।
न्याय के नाम पर चिट्ठी दर चिट्ठी, लेकिन सरकार खामोश
सत्येंद्र ने हार नहीं मानी 20 फरवरी 2020, 2 मार्च 2020, 26 अप्रैल 2022 को उन्होंने रजिस्टर्ड डाक से शिकायतें भेजीं एआरटीओ महोबा, आरटीओ बांदा, आरटीओ कानपुर, आरटीओ लखनऊ, जिलाधिकारी महोबा, एसपी महोबा, मुख्यमंत्री और आईजीआरएस पोर्टल तक। हर पत्र में स्पष्ट विवरण, प्रमाणपत्र, रसीदें, आधार कार्ड की प्रतिलिपि संलग्न थीं। लेकिन आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई।
मोहनलालगंज हादसा और विभाग की निद्रा
कुछ समय पूर्व लखनऊ के मोहनलालगंज में एक स्लीपर बस में भीषण आग लगी, कई लोग झुलसे, कुछ की जान गई। लेकिन उस हादसे के बाद भी परिवहन विभाग नहीं जागा। किसी को मरते देखना जरूरी है ताकि टेढ़ी कोठी के अधिकारी चेतें। फर्जी पंजीयन क्या सिर्फ कागजी अपराध हैं।
बृजेश नारायण सिंह ट्रांसफर-पोस्टिंग का भी बादशाह
बृजेश सिंह का नाम सिर्फ इस मामले में नहीं, बल्कि यूपी के परिवहन महकमे में ‘वसूली नेटवर्क’ के मुख्य सूत्रधार के रूप में पहले से चर्चित है। ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैसों की बोली, पसंदीदा जिलों में एआरटीओ की नियुक्ति, जांच को अपने पक्ष में मोड़ने में माहिर, यह वही बृजेश सिंह हैं, जिनके आगे ‘विशेष वाहन’ रोज लाइन लगाते हैं।
—सत्ता खामोश क्यों
* उत्तर प्रदेश सरकार को इन फर्जी पंजीयन मामलों की जानकारी नहीं
* अदालत के आदेशों की अवहेलना करने वाले पुलिस अफसरों पर कार्यवाही कब
* पीड़ित को न्याय सिर्फ इसलिए नहीं मिलेगा क्योंकि वह कोई मंत्री का रिश्तेदार नहीं है
एक नागरिक की पहचान को जब भ्रष्ट तंत्र हथियार बना ले
यह कोई अकेली घटना नहीं। यह पूरी व्यवस्था की गिरावट की प्रतीक है। जहां विभाग के अधिकारी फर्जीवाड़ा करते हैं, पुलिस एफआईआर नहीं दर्ज करती, न्यायालय के आदेशों की उपेक्षा होती है और सरकार मूकदर्शक बनी रहती है। यह एक दस्तावेज है उस सड़ांध का, जो हमारी सरकार, हमारे सिस्टम और हमारे न्याय की रीढ़ को खोखला कर रही है।
परिवहन आयुक्त एक नम्बर का गुरुघण्टाल, इसको बस चाहिए “माल ही माल”
ट्रांसपोर्ट कमिश्नर बीएन सिंह के विषय मे क्या कहना बस भ्र्ष्टाचार ही इसका गहना ये चंद लाइन इस लम्पट परिवहन आयुक्त पर बिल्कुल फिट बैठती है।अभी हाल में इसने बस के फिटनेस कमी निकाल कर के मामले में आरआई को निलंबित कर दिया। वही दुसरीं ओर 30 स्लीपर बसों के फर्जी पंजीयन का मामला सामने आने पर एमपी सिंह तत्कालीन एआरटीओ महोबा व वर्तमान में एआरटीओ प्रवर्तन सहारनपुर को अभी तक निलम्बित क्यो नही किया गया। इससे तो यह प्रमाणित हो रहा है कि ये कितना बड़ा घूसखोर है।
अब जब मामला सामने आ गया तो बीएन सिंह द्वारा क्यो एमपी सिंह पर कार्यवाही नही की जा रहीं है वो कहावत है न बाप बड़ा न भइया सबसे बड़ा रूपइया ऐसे अधिकारी जिनका वेतन से पेट नही भरता अर्थात इन्हें हराम की कमाई खाने की आदत हो गयी हो ऐसे सूकर टाइप के अफसरों को हरा आम खोर कहना गलत नही होगा।
पैसे के लिये अपना सबकुछ नीचे का खोल कर रखते है कहने का मतलब दरवाजा आप लोग गलत न समझे कि कोई अधिकारी दरवाजे से प्रवेश कर इनकी इच्छाओं को पूरा कर “लक्ष्मी” को को इनके तिजोरी तक पहुँचा सके।
-अचूक संघर्ष




