वाराणसी

छितौना कांड: राजभर बनाम ठाकर समाज का खूनी संग्राम, मंत्री अनिल राजभर की एकतरफा पैरवी से हुआ बवाल, इनकी भूमिका पर क्यो न उठे सवाल ?

  • बांस की कोठी से सियासत की खूंटी तक, छितौना में जातीय टकराव ने पकड़ी आग
  • छितौना के झगड़े में अब सिर्फ लाठी नहीं, जातीय वोट बैंक की गूंज
  • मंत्री अनिल राजभर के ‘एकतरफा हस्तक्षेप’ से भड़की आग, करणी सेना का प्रदर्शन
  • भाजपा के बूथ अध्यक्ष संजय सिंह के बेटे जेल भेजे गए, एफआईआर में दोहरा मापदंड
  • सपा-राजभर-सुभासपा की एंट्री से पूर्वांचल की जातीय सियासत गरमाई
  • गांव में बैनर लगाकर ग्रामीणों ने नेताओं को दिखाया आइना राजनीति नहीं, समाधान चाहिए
  • पुलिस थाने की भूमिका संदिग्ध, थानाध्यक्ष लाइन हाजिर, एसआईटी को सौंपी जांच
  • बांस और पशु के बहाने सियासी दलों ने शुरू की जाति की सियासत
  • राजभर-ठाकुर आमने-सामने, पंचायत से लेकर लखनऊ तक मंथन
  • पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र में जातीय तनाव, प्रशासन मौन तमाशबीन
  • काशी की धरती पर सामाजिक समरसता को तोड़ती सियासी चालें
  • स्थानीय विवाद बना राजनीतिक ध्रुवीकरण का ट्रिगर पॉइंट
  • जातीय संगठन पहुंचे गांव, बयानबाजी से उबलने लगी जमीन
  • काशी की गरिमा पर जातीय ध्रुवीकरण का दाग, प्रशासनिक चुप्पी शर्मनाक

 

अंशिका मौर्या

 

वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र, जिसे काशी की सांस्कृतिक और सामाजिक समरसता का प्रतीक माना जाता है। वह इन दिनों जातीय टकराव की आग में सुलग रहा है। छितौना गांव में बांस की कोठी और एक छूट्टा पशु को लेकर शुरू हुआ मामूली विवाद अब पूर्वांचल की राजनीति को जातीय मोड़ देने वाला बिंदु बन चुका है। दो परिवारों के बीच की मारपीट ने अब ठाकुर बनाम राजभर के सामाजिक समीकरण को उबाल पर ला दिया है। सवाल ये नहीं कि लाठी किसने चलाई, सवाल अब ये है कि इस आग में सियासी ईंधन कौन डाल रहा है।

छितौना एक मामूली झगड़े की शुरुआत

वाराणसी जिले के चौबेपुर ब्लॉक अंतर्गत छितौना गांव में दो परिवारों के बीच एक विवाद हुआ। बांस की कोठी और गांव के रास्ते में घूम रहे एक छूट्टा पशु को लेकर शुरू हुआ यह झगड़ा पहले गाली-गलौज तक सीमित था, लेकिन कुछ ही देर में लाठी-डंडे चलने लगे। दोनों पक्षों में चोटें आईं, महिलाएं भी घायल हुईं।

 

पुलिस आई, लेकिन समाधान नहीं

घटना की सूचना पर चौबेपुर थाना पुलिस मौके पर पहुंची। कुछ को थाने ले जाया गया, बयान दर्ज हुए, लेकिन पुलिस की कार्यशैली पर पहले ही सवाल उठने लगे। आरोप है कि पुलिस ने एक पक्षीय कार्रवाई की, जिससे दूसरा पक्ष भड़क गया।

 

जातीय संगठनों की एंट्री ने आग में घी का काम किया

घटना के अगले ही दिन दोनों पक्षों के जातीय संगठनों राजभर समाज सेवा समिति और क्षत्रिय महासभा ने गांव का दौरा किया। बयानबाजी शुरू हुई, फेसबुक-यूट्यूब पर वीडियो तैरने लगे। जातीय गौरव और अन्याय के नाम पर गांव की फिजा में जहर घुलने लगा।

 

नेताओं की एंट्री सियासी जमीन की तलाश

राजभर समाज से जुड़े मंत्री ने गांव पहुंचकर पीड़ित पक्ष से मुलाकात की। उन्होंने सीधे तौर पर प्रशासन पर ठाकुरों के पक्ष में कार्रवाई करने का आरोप लगाया। जवाब में क्षेत्र के एक प्रभावशाली ठाकुर नेता ने आरोपों को सिरे से खारिज किया और इसे राजभर समाज की सुनियोजित उकसावे की साजिश बताया।

 

प्रशासन का मौन हालात बिगाड़ता सन्नाटा

इस पूरे मामले में प्रशासन ने चुप्पी साध रखी है। ना तो डीएम ने कोई प्रेस बयान दिया और ना ही कमिश्नरेट पुलिस ने स्थिति स्पष्ट की। गांव में अब भी तनाव की स्थिति बनी हुई है। पुलिस की गश्त जारी है, लेकिन शांति के बजाय आशंका मंडरा रही है।

सोशल मीडिया जातीय जहर का प्लेटफॉर्म

फेसबुक, व्हाट्सएप और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर अब इस विवाद का जातीय वीडियो क्लिप चलाया जा रहा है। हम राजभर हैं, दबेंगे नहीं से लेकर ठाकुर कभी झुकता नहीं जैसे नारे चल रहे हैं। युवाओं में आक्रोश और भ्रम दोनों बढ़ रहे हैं।

काशी की गरिमा पर सवाल

काशी की पहचान समरसता, सह-अस्तित्व और संस्कृति की रही है। लेकिन छितौना की घटना ने इसे धूमिल कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर सबका साथ, सबका विकास की बात करते हैं, लेकिन उनके ही संसदीय क्षेत्र में जातीय ध्रुवीकरण का यह उबाल उनकी विचारधारा को चुनौती देता प्रतीत होता है।

राजनीतिक विश्लेषण जाति की गणित
का केंद्र बनता वाराणसी

सूत्रों की मानें तो 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अभी से सुनाई दे रही है। जातीय ध्रुवीकरण पूर्वांचल की सियासत का पुराना औजार है, और छितौना की घटना इसका ताजा उदाहरण। जहां एक ओर पिछड़ी जातियों को एकजुट करने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी ओर सवर्ण वोटबैंक की गोलबंदी भी तेज हो रही है। छितौना की यह घटना पूर्वांचल की उस विस्फोटक हकीकत को उजागर करती है, जहां मामूली विवाद भी सियासी और जातीय हथियार बन सकता है। जब प्रशासन मौन और सियासत सक्रिय हो जाए, तब सामाजिक एकता केवल किताबों में सजीव रह जाती है। क्या काशी की गरिमा इस ध्रुवीकरण से बच पाएगी? क्या मोदी का संसदीय क्षेत्र अपनी विचारधारा को बचा पाएगा

  • छितौना गांव में बांस और पशु को लेकर शुरू हुआ झगड़ा
  • लाठी-डंडे चले, महिलाएं घायल, पुलिस पहुंची
  • पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई के आरोप
  • राजभर और ठाकुर समाज आमने-सामने
  • राजभर नेता ओपी राजभर ने गांव जाकर प्रशासन को घेरा
  • ठाकुर नेताओं ने इसे उकसावा बताया
  • सोशल मीडिया पर जातीय भावनाएं भड़काई जा रही हैं
  • काशी की सांस्कृतिक समरसता पर संकट
  • आगामी चुनाव की तैयारी में जातीय टकराव का उपयोग

छितौना की चिंगारी से धधक उठी सियासत जाति, सत्ता और अन्याय की त्रासदी

संतों की तपोभूमि, जहां सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता की परंपरा आज भी मिसाल है। उसी काशी के एक छोटे से गांव छितौना में आज जातीय राजनीति का जहर घुल चुका है। आधे बिस्वा ज़मीन और एक छूट्टा पशु को लेकर 5 जुलाई को शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे हिंसा, पक्षपात, और फिर राजनीतिक दखल के रास्ते अब सामाजिक बंटवारे और सत्ता संघर्ष की तरफ बढ़ चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में प्रशासनिक निष्क्रियता और राजनीतिक लाभ की भूख ने इस प्रकरण को केवल गांव की सीमा में नहीं रहने दिया, बल्कि यह पूर्वांचल की राजनीतिक ध्रुवीकरण की सबसे ताजा मिसाल बन चुका है। चौबेपुर ब्लॉक के छितौना गांव में 5 जुलाई को दो परिवारों के बीच उस समय विवाद हुआ, जब एक छूट्टा पशु को लेकर एक पक्ष ने आरोप लगाया कि जानबूझकर उनके खेत में पशु छोड़ दिया गया। गांव में ऐसी घटनाएं सामान्य मानी जाती रही हैं, लेकिन इस बार बात सिर्फ तू-तू, मैं-मैं तक नहीं रुकी। लाठी-डंडे चले, और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। पुलिस शुरुआती कार्रवाई के लिए पहुंची लेकिन गांव वालों के अनुसार थाने स्तर पर सुलझने वाले इस मामले को जानबूझकर तूल दिया गया। जब मंत्री अनिल राजभर अस्पताल में घायलों से मिलने पहुंचे तो उन्होंने सिर्फ अपने समाज के पीड़ितों से मुलाकात की। मंत्री के इस एकतरफा रवैये से ठाकुर समाज आक्रोशित हो गया। खासकर भाजपा के बूथ अध्यक्ष संजय सिंह का परिवार यह मान बैठा कि पार्टी में भी अब जाति के आधार पर भेदभाव हो रहा है। जब एफआईआर सिर्फ एक पक्ष पर दर्ज हुई तो करणी सेना ने चौबेपुर थाने का घेराव कर दिया।प्रशासन दबाव में आया और 24 घंटे बाद दूसरे पक्ष की एफआईआर दर्ज की गई। लेकिन तब तक माहौल जातीय उबाल में तब्दील हो चुका था।

 

भाजपा की आंतरिक फूट उजागर

मामले ने भाजपा की आंतरिक स्थिति को भी उघाड़ कर रख दिया। मंत्री अनिल राजभर जहां अपने समाज के समर्थन में खड़े दिखे, वहीं संजय सिंह और उनके समर्थक पार्टी में अपनी उपेक्षा और अन्याय को लेकर क्षुब्ध हो गए। एक ओर सरकार का मंत्री था, दूसरी ओर जमीनी कार्यकर्ता और दोनों के बीच पार्टी नेतृत्व मौन!

 

सपा और सुभासपा ने भरी हुंकार

समाजवादी पार्टी इस मौके को चूकने वाली नहीं थी। राम अचल राजभर की अगुवाई में सपा प्रतिनिधिमंडल ने गांव का दौरा किया और राजभर समाज के साथ संवाद किया। बयान दिए गए कि अनिल राजभर, राजभर समाज के नहीं, भाजपा के गुलाम बन चुके हैं। उधर सुभासपा नेता अरविंद राजभर ने सीधे डीजीपी से मुलाकात की और निष्पक्ष जांच की मांग रखी।

 

एसआईटी का गठन व प्रशासनिक कार्रवाई

विवाद गहराया तो पुलिस कमिश्नर ने छितौना कांड की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया, जिसकी निगरानी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कर रहे हैं। चौबेपुर थानाध्यक्ष को मामले में लापरवाही के आरोप में लाइन हाजिर कर दिया गया।

 

बैनर से उभरी गांव की आवाज

इस राजनीतिक तमाशे से थक चुके गांव के ग्रामीणों ने अब खुद मोर्चा संभाल लिया है। गांव के बाहर एक बैनर टांगा गया है जिसमें लिखा है बाहरी लोगों का प्रवेश निषेध, यह गांव राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं है। गांव के वरिष्ठ लोगों ने मीडिया से कहा कि हम इस विवाद को आपस में सुलझा सकते थे, लेकिन नेताओं ने आग में घी डाला।

 

ठाकुर पक्ष की पीड़ा और प्रशासनिक दबाव

ठाकुर समाज के संजय सिंह के दो बेटों को जेल भेजा गया। स्वयं संजय सिंह पं.दीनदयाल उपाध्याय राजकीय अस्पताल के सर्जिकल वार्ड में भर्ती थे। लेकिन 13 जुलाई को अचानक उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया। अस्पताल सूत्रों का कहना है कि यह ‘ऊपरी दबाव’ का परिणाम था। जब उन्हें इस बारे में जानकारी हुई तो उन्होंने अस्पताल से निकलने से इनकार कर दिया और नाराजगी जाहिर की।

 

पूर्वांचल की सियासत में नया मोड़

इस पूरे विवाद ने पूर्वांचल की राजनीति में नया रंग घोल दिया है। जातियों के वोटबैंक की गोलबंदी तेज हो चुकी है। भाजपा को अब अपने ही कार्यकर्ताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं विपक्षी दल इस स्थिति को पूरी ताकत से भुना रहे हैं।

  • 5 जुलाई को जमीन और छूट्टा पशु को लेकर विवाद शुरू
  • मंत्री अनिल राजभर का अस्पताल में एकतरफा पक्षपातपूर्ण व्यवहार
  • संजय सिंह भाजपा बूथ अध्यक्ष, लेकिन एफआईआर में उपेक्षित
  • करणी सेना का थाने पर प्रदर्शन, दबाव में दूसरी एफआईआर दर्ज
  • भाजपा में मंत्री और कार्यकर्ता आमने-सामने
  • सपा और सुभासपा की सक्रिय एंट्री, अनिल राजभर पर तीखे हमले
  • गांव में राजनीतिक हस्तक्षेप निषेध का बैनर, ग्रामीणों की नाराजगी चरम पर
  • ठाकुर समाज के दो नाबालिग युवक जेल में, संजय सिंह को में अस्पताल में इलाज जारी
  • काशी की सामाजिक एकता पर सवाल, जाति-सत्ता-प्रशासन की तिकड़ी से टूटा भरोसा

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