वाराणसी के CMO का हाल: डॉक्टर संदीप चौधरी का झोलाछाप डॉक्टरों से प्यार, ब्रजेश पाठक बने धृतराष्ट्र, इन्हें क्यों न माना जाये जिम्मेदार ?
अचूक संघर्ष डेस्क

~ काशी में झोलाछापों की सल्तनत, स्वास्थ्य मंत्री मौन, अधिकारी बने संरक्षक!
~ प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में गली-गली मौत बांट रहे झोलाछाप, सिस्टम खामोश
~ सीएमओ- डिप्टी सीएमओ की शह पर बिना डिग्री चल रहे नर्सिंग होम और पैथोलॉजी सेंटर
~ स्वास्थ्य मंत्री से लेकर शासन-प्रशासन तक सबको है खबर, फिर भी नहीं हो रही कार्रवाई
~ सालों से जमे सीएमओ व डिप्टी सीएमओ की नहीं है जनस्वास्थ्य की प्राथमिकता
~ डॉक्टरों की जगह कम्पाउडर, लैब में टेक्नीशियन की जगह अनपढ़ कर रहे जांच
~ कागजों में कार्रवाई, स्वास्थ्य विभाग का तथाकथित झोलाछापों चिकित्सकों को मिला वरदहस्त
~ काशी की गलियों में इलाज के नाम पर खेला जा रहा मौत का खेल
~ झोलाछापों की कमाई में हिस्सेदार बना पूरा सिस्टम न जांच, न कार्रवाई
वाराणसी। काशी वह नगरी जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘जीवित सभ्यता की राजधानी’ बताया। जहां हर गली में मंदिर है, पर आज उन्हीं गलियों में इलाज के नाम पर मौत परोसी जा रही है। यह बनारस अब सिर्फ आध्यात्म का केंद्र नहीं, बल्कि झोलाछाप डॉक्टरों की लूट की मंडी बन चुका है। जबकि यह प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है, फिर भी यहां का स्वास्थ्य विभाग कुप्रशासन का जीवंत नमूना बन गया है। सीएमओ से लेकर डिप्टी सीएमओ तक की नजरों के सामने खेला जा रहा यह ‘स्वास्थ्य महाघोटाला’, किसी शासन या लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक संगठित मिलीभगत की कहानी है और जनता इसकी कीमत अपनी जान देकर चुका रही है।
- हर गली मोहल्लों में चल रहा झोलाछापों का साम्राज्य
- पैथोलॉजी सेंटरों में डॉक्टर नहीं, अनट्रेंड स्टाफ करता है जांच
- नर्सिंग होम का बिना एनओसी, बिना लाइसेंस चल रहा धंधा नियमों की खुली उड़ रही धज्जियां
- डिप्टी सीएमओ डॉ.पीयूष राय वर्षों से एक ही कुर्सी पर क्यों हैं तैनात
- सीएमओ डॉ. संदीप चौधरी पदोन्नत होकर भी जमीनी कार्रवाई से कोसों दूर
- शिकायतों की बाढ़ लेकिन जांचें ठप, सिर्फ खानापूर्ति
- मीडिया रिपोर्टों व जनप्रतिनिधियों के सवाल के बाद भी सरकार खामोश
- कितनी मौतें, कितनी ज़िंदगियां दांव पर प्रशासनिक आंकड़ों का फर्जीवाड़ा
- झोलाछापों से महीने का वसूली सिस्टम हर स्तर पर बंट रहा ‘हिस्सा’
- स्वास्थ्य मंत्री तक पहुंची कई शिकायतें, लेकिन कार्रवाई सिर्फ फाइलों तक
- पीएमओ तक जाने वाली शिकायतें भी निष्क्रिय
- मंदिर की धरती पर स्वास्थ्य विभाग की कारस्तानी से मिल रही मौत
झोलाछापों का बनारसी नेटवर्क मौत का इलाज गली-गली
काशी की पहचान सदियों से जीवन और मोक्ष के संगम की रही है। पर आज वही नगरी, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘गर्व से भरा हुआ अध्यात्मिक केंद्र’ बताया था, वहां की गलियों में झोलाछाप डॉक्टरों का जाल इस कदर फैल चुका है कि हर कोना अब ‘अस्पताल नहीं, हादसे’ का इलाका बन चुका है। लक्सा, भेलूपुर, सिगरा, चेतगंज, मंडुआडीह, सुंदरपुर, नारिया, लंका, सामनेघाट, रथयात्रा, चौकाघाट, पांडेयपुर, नदेसर कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा जहां झोलाछाप डॉक्टरों की दुकानें न लगी हों।
इन ‘डॉक्टरों’ के पास न तो एमबीबीएस की डिग्री है, न ही कोई नर्सिंग डिप्लोमा। इनकी विशेषज्ञता बस मरीज की मजबूरी और पैसे की लूट तक सीमित है।
नकली इलाज, असली मौत
झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा बिना परीक्षण के पेनकिलर, स्टेरॉइड और एंटीबायोटिक की खुराकें आम हैं। कई मामलों में गलत दवा से मरीजों की मौतें भी हुई हैं, लेकिन उन मौतों का न कोई पोस्टमॉर्टम होता है, न कोई एफआईआर। शिवपुर निवासी रामविलास यादव की 9 साल की बेटी रेखा को सिर्फ बुखार था। पड़ोस के झोलाछाप ने उसे इंजेक्शन व दवा दी। अगले दिन उसकी तबीयत बिगड़ी और वह दम तोड़ बैठी। अस्पताल में बताया गया ओवरडोज से ऑर्गन फेलियर के कारण मौत हुई है।
सीएमओ-डिप्टी सीएमओ की छत्रछाया संरक्षण के बदले संग्रहण
पूरे नेटवर्क का सबसे खतरनाक पहलू है स्वास्थ्य विभाग की मौन स्वीकृति है। सीएमओ डॉ. संदीप चौधरी और डिप्टी सीएमओ डॉ. पीयूष राय इन दोनों का नाम हर स्वास्थ्य कर्मचारी, झोलाछाप और अस्पताल संचालक की ज़ुबान पर है। क्योंकि इन्हीं की शह पर चल रहा है ये ‘मौत का कारोबार’। डॉ.पीयूष राय पिछले छह वर्षों से डिप्टी सीएमओ पद पर एक ही जगह जमे हुए हैं। जबकि नियमानुसार दो साल से अधिक एक ही पद पर तैनाती ‘गैरवाजिब’ मानी जाती है। सीएमओ डॉ.चौधरी का हाल भी अलग नहीं। हाल ही में उन्हें प्रमोशन मिला, लेकिन उनका अभी तक स्थानांतरण न होना शासन की कार्यशैली पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
खुली मिलीभगत की बानगी
जिन नर्सिंग होम पर कार्रवाई होनी चाहिए, उन्हें चेतावनी तक नहीं दी जाती। फर्जी पैथोलॉजी सेंटरों के बाहर बोर्ड लगे हैं ‘डॉ. कुमार’, ‘डॉ. मिश्रा’ जबकि अंदर बैठा व्यक्ति इंटर पास कम्पाउडर होता है। हर झोलाछाप से महीने का ‘कलेक्शन’ तय है कहा जाता है ‘अपना-अपना खाता है, ऊपर तक जाता है’।
नर्सिंग होम से लेकर लैब तक नियमों की उड़ रही धज्जियां
काशी में एक ओर जहां बड़े-बड़े अस्पताल ब्रांडिंग में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर गली-कूचों में अवैध नर्सिंग होम चल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर
बिना रजिस्ट्रेशन, बिना प्रशिक्षित स्टाफ, बिना इमरजेंसी व्यवस्था। इनमें से अधिकांश का संचालन या तो झोलाछाप करते हैं या फिर सेवानिवृत्त फार्मासिस्ट और कंपाउंडर। कोई नियम, कोई मान्यता, कोई लाइसेंस नहीं।
लैब टेस्टिंग सेंटरों की स्थिति और भी भयावह है।
नियम वो तो बस नाम के लिए हैं…
अधिकांश लैब सिर्फ इसलिए चल रही हैं क्योंकि हर महीने उनका ‘कट’ ऊपर तक पहुंचता है। सीएमओ ऑफिस में शिकायत लेकर पहुंचे एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि
> डॉ. पीयूष राय ने कहा नाम बताइए, हम कार्रवाई करेंगे। मैंने दस नाम दिए। दो हफ्ते बाद देखा उन्हीं में से तीन ने नया बोर्ड लगवा लिया।
मौत के सौदागरों को बचाने में लगी व्यवस्था जनता बेहाल
शहर में जितनी तेजी से झोलाछाप बढ़े हैं, उतनी तेजी से मरीजों की मौतें और गलत इलाज के मामले भी बढ़े हैं। कोई मुकदमा दर्ज नहीं होता, न कोई एफआईआर। एक मेडिकल अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहा कि –
> ‘सिस्टम ने इन्हें वैध मान लिया है। सरकार की आंखों के सामने चल रहा ये कारोबार, असल में करोड़ों की ब्लैक इंडस्ट्री है।’ पिछले एक साल में ऐसे कई केस सामने आए, जिनमें झोलाछाप इलाज के चलते जानें गईं, पर इनमें से किसी एक पर भी कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। डीएम से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक को बार-बार पत्र भेजे गए, लेकिन हर बार फॉर्मेट में जवाब प्रकरण संज्ञान में है, जांच की जा रही है।
मोदी बनाम व्यवस्था – क्या अब भी बचेगा भरोसा
यह रिपोर्ट सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक प्रतिभा की भी परीक्षा है। काशी को उन्होंने ‘गर्व की नगरी’ बताया, पर आज यहां का स्वास्थ्य विभाग भ्रष्टाचार की सबसे गंदी मिसाल बन चुका है। क्या यही है ‘सबका साथ, सबका विकास’ है, कि गरीब झोलाछाप के इंजेक्शन से मर रहा है। क्या यही ‘न्यू इंडिया’ है जहां झोलाछापों को संरक्षण और शिकायतकर्ता को धमकी मिलती है।
- आखिरकार सीएमओ-डिप्टी सीएमओ को क्यों नहीं हटाया जा रहा
- शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं
- शासन और मंत्रियों की चुप्पी किसकी कीमत पर
- क्या पीएम मोदी को यह रिपोर्ट कभी दिखाई जाएगी
काशी में आज झोलाछाप डॉक्टर नहीं, मौत के सौदागर खुलेआम व्यापार कर रहे हैं और सिस्टम उन्हें मौन समर्थन दे रहा है। सीएमओ और डिप्टी सीएमओ की छत्रछाया में पल रहे इस रैकेट पर कार्रवाई की बजाय चुप्पी साध ली गई है। यह केवल एक विभागीय भ्रष्टाचार नहीं, यह विश्वासघात है उस जनता से, जिसने भरोसे में वोट दिया था, और आज इलाज के नाम पर लुट मची है।
ब्रजेश पाठक की भूमिका पर क्यो न उठे सवाल
सूबे के भाषणवीर उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक जिनके कंधों पर प्रदेश के चिकित्सा विभाग का प्रभार है।आए दिन भ्र्ष्टाचार पर गला फाड़ते रहते है,लेकिन कुछ कर नही पाते है।अपने कुकर्मो से कुख्यात हो चुके वाराणसी के सीएमओ डॉक्टर संदीप चौधरी की इतनी शिकायतों के बाद भी इस सत्र में उसको वाराणसी से न हटाना ये साबित करता है कि पाठक जी को भी लक्ष्मी से काफी प्रेम है।लखनऊ में ये चर्चा आम है कि एक एक सीएमओ के ट्रांसफर में 40 से 50 लाख वसूले गए है। जिसको जिलों में रुकना है उसका संदीप चौधरी टाइप का पैकेट चला है नान डिस्टर्बेंस एलाउंस के नाम से ये पैकेट जाना जाता है। पाठक जी खाली अच्छी बातें करने से काम नही चलेगा जमीन पर भी उतरकर कार्यवाही करना पड़ेगा। पहले भी ब्रजेश पाठक पर ट्रांसफर सत्र में जमकर वसूली के आरोप लगे थे। बाद में योगी जी ने सारे ट्रांसफर रद्द कर दिए थे। तो कोई बड़ी बात नही है कि सन्दीप चौधरी की माया के आगे पाठक जी पुनः नतमस्तक हो गए हो।




