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मोदी या भागवत किसका होगा वनवास, संघ प्रमुख की बातें साबित होंगी बकवास

● अब प्रतीक्षा किसकी मोदी या भागवत के रिटायरमेंट की

● संघ प्रमुख मोहन भागवत को 75 वर्ष के बाद रुक जाना चाहिए वाले बयान से सियासी गलियारों में हलचल

● प्रधानमंत्री मोदी भी 17 सितंबर को पूरे करेंगे 75 वर्ष, लेकिन पद छोड़ने का कोई संकेत नहीं

● धनखड़ प्रकरण ने दिखाया कि भाजपा में नेतृत्व विकल्प शून्य का आईना

● संघ के भीतर और बाहर उठ रहे हैं मोदी बनाम भागवत के वैचारिक मतभेद के सवाल

● राम माधव का डैमेज कंट्रोल लेख भागवत का इशारा किसी व्यक्ति विशेष की ओर नहीं

● 21 जुलाई की घटनाओं के बाद आरएसएस के ‘नरम तेवर’ क्या संकेत दे रहे हैं

● भाजपा के भविष्य और संघ की भूमिका पर छिड़ी है बहस

● अब प्रतीक्षा किसके रिटायरमेंट की हो मोदी या भागवत!

 

(श्रवण गर्ग)

दो तारीखें, दो व्यक्तित्व, एक बड़ा सवाल

भारतीय राजनीति इन दिनों दो तारीखों के इर्द-गिर्द घूम रही है। 11 सितंबर और 17 सितंबर। पहली तारीख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के जन्मदिन की है, और दूसरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन की। दोनों इस साल 75 वर्ष के हो जाएंगे। यानि संघ और सरकार दोनों के शीर्ष नेतृत्व के लिए वह उम्र जिसे स्वयं मोदी ने कभी ‘सेवानिवृत्त होने की गरिमा’ से जोड़ा था। इस पृष्ठभूमि में जब मोहन भागवत ने 9 जुलाई को नागपुर में संघ विचारक मोरोपंत पिंगले की पुस्तक विमोचन के अवसर पर यह कह दिया कि पचहत्तर के बाद रुक जाना चाहिए, तो राजनीतिक भूचाल आना तय था। और हुआ भी यही।

भागवत का संकेत सीधा या घुमावदार

भागवत ने भले ही मोदी का नाम न लिया हो, लेकिन संदर्भ और समय का चयन इतना सटीक था कि उनके इशारे को समझने में देरी नहीं लगी। यह उस वक्त कहा गया जब 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, और गठबंधन सरकार बनी थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या भागवत बीजेपी नेतृत्व को यह याद दिला रहे हैं कि अब रुकने का समय आ गया है। बयान के बाद 10 दिन तक पूरे देश में चर्चा का विषय रहा कि क्या संघ प्रमुख खुद पद छोड़ने जा रहे हैं या उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को यह सलाह दी है।

राम माधव का हस्तक्षेप भागवत के बचाव में उतरे संघ के रणनीतिकार

संघ के प्रमुख विचारक और पूर्व महासचिव राम माधव 19 जुलाई को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित अपने लेख में भागवत के बयान को स्पष्ट करने निकले। उन्होंने लिखा कि भागवत का इशारा किसी व्यक्ति विशेष की ओर नहीं था, बल्कि वे ‘नेतृत्व में युवाओं को स्थान देने’ की सामान्य बात कर रहे थे। यह लेख संघ की रणनीतिक प्रतिक्रिया था। भागवत के बयान से उपजे सियासी ‘अनर्थ’ को रोकने का प्रयास। लेकिन इस लेख की टाइमिंग और उसके दो दिन बाद घटित धनखड़ प्रकरण ने एक नया आयाम खोल दिया।

धनखड़ प्रकरण मोदी के वर्चस्व की पुनः स्थापना या विकल्पहीनता का संदेश!

राज्यसभा के उपसभापति जगदीप धनखड़ के साथ जो हुआ, वह अप्रत्याशित और क्रूर था। मोदी सरकार ने उनकी भूमिका को नजरअंदाज कर सीधे केंद्रीय नेतृत्व से फैसला लिया। यह घटना दिल्ली की सत्ता के गलियारों से लेकर नागपुर तक स्पष्ट संदेश लेकर पहुंची प्रधानमंत्री मोदी के पास विकल्प नहीं है और उन्होंने किसी को विकल्प बनने ही नहीं दिया है। संघ सहित पार्टी में यह विचार प्रबल हो रहा था कि मोदी का विकल्प तैयार करना जरूरी है। लेकिन धनखड़ प्रकरण ने इस धारणा को झटका दिया।

मोदी बनाम भागवत वैचारिक टकराव का आरंभिक स्वरूप

वर्ष 2014 और 2019 में मोदी की अपार सफलता के बाद से ही आरएसएस के भीतर एक गहरी चिंता पल रही थी कि कहीं सरकार और पार्टी का संचालन एक व्यक्ति की छवि तक सीमित न हो जाए। मोदी का ‘सेवानिवृत्ति सिद्धांत’ और ’75 वर्ष की उम्र सीमा’ तब तक नैतिक मूल्यों का प्रतीक था। लेकिन अब वही मूल्य उनके लिए ही अप्रासंगिक हो गए हैं।भागवत के बयान को कुछ जानकार इसलिए भी गंभीर मानते हैं कि यह नागपुर से दिल्ली के लिए एक संदेश था। नेतृत्व परिवर्तन या कम-से-कम पुनर्विचार पर क्या यह व्यावहारिक होगा।

संघ की बेचैनी नेतृत्व पर नियंत्रण की कोशिश या अंतमर्थन

संघ सदैव यह दावा करता रहा है कि वह सत्ता की राजनीति से अलग है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम और उसके बाद बनी गठबंधन सरकार ने संघ की इस स्थिति को कमजोर किया है। अब न सिर्फ बीजेपी का नेतृत्व बल्कि सरकार भी पूर्ण रूप से मोदी के इर्द-गिर्द केंद्रित है। संघ यह भी महसूस कर रहा है कि अगर 2029 तक भी यही स्थिति बनी रही तो पार्टी का वैचारिक ढांचा और संगठनात्मक अनुशासन समाप्त हो सकता है। ऐसे में भागवत के बयान को कुछ हद तक नरमी से दी गई चेतावनी माना गया।

क्या विकल्प शून्यता की रणनीति है मोदी की सबसे बड़ी ताकत

धनखड़ एपिसोड और जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी को लेकर अनिर्णय की स्थिति यह बताती है कि मोदी ने न केवल अपने विकल्पों को रोका है, बल्कि पार्टी के भीतर नए नेतृत्व के अंकुर भी सूख चुके हैं। मोदी की शक्ति इस रणनीति में भी है कि उन्होंने किसी को इतना बड़ा नहीं बनने दिया कि उनके बाद की पंक्ति में खड़ा हो सके। यह ‘कांग्रेस मॉडल’ जैसा ही है जिसमें नेहरू से लेकर इंदिरा और फिर सोनिया तक, उत्तराधिकार तय तो होता था पर चुनौती देने वाला कोई नहीं होता था। सवाल यह है कि क्या मोदी भी वही रास्ता अख्तियार कर चुके हैं।

अंतिम प्रश्न अब किसकी प्रतीक्षा करे देश?

ध्यानस्थ मोदी 17 सितंबर को 75वें पड़ाव पर होंगे, और भागवत 11 सितंबर को। लेकिन न कोई संकेत है कि मोदी रिटायर होंगे और न भागवत को लेकर कोई स्पष्टता है। सवाल उठता है कि क्या अब संघ प्रमुख स्वयं ‘त्याग’ की राह पकड़ेंगे और नागपुर की सत्ता-संरचना बदल जाएगी, या फिर मोदी ‘ईश्वरीय प्रेरणा’ के नाम पर 2029 तक सत्ता में रहेंगे और उसके बाद भी एक ‘मार्गदर्शक मंडल’ की तरह नियंत्रण बनाए रखेंगे। देश आज उस मोड़ पर खड़ा है जहां न विपक्ष सशक्त है और न सत्तारूढ़ दल में लोकतांत्रिक संवाद बचा है। ऐसे में सवाल बेहद सटीक है अब प्रतीक्षा किसकी की जाए। भागवत की चुप्पी की या मोदी के सन्यास यात्रा की?

* भागवत की टिप्पणी ने दिल्ली से नागपुर तक खड़ा किया नया संकट
* 17 और 11 सितंबर की तारीखों पर केंद्रित हो रही है सत्ता की नई गणना
* संघ में उभरा नेतृत्व परिवर्तन का सवाल या केवल दिखावे की बहस?
* क्या मोदी का वर्चस्व आरएसएस के ‘अनुशासित ढांचे’ को दे रहा चुनौती

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