
~ इंस्पेक्टर विक्रम सिंह ने खोले राज, बृजेश-धनंजय का नाम लिया तो हुआ ट्रांसफर
~ रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के परिवार से कथित संबंधों ने बनाया आरोपियों को ‘अछूत’
~ गिरधारी की गिरफ्तारी और फिर पुलिस एनकाउंटर बना बड़ा सवाल
~ बजरंगी मर्डर के बाद बढ़ी रसूख की खींचतान, नितेश बना बलि का बकरा
~ सीबीसीआईडी जांच भी बनी लचर, हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद मिली नयी दिशा
~ पूर्व सांसद और विधायक जांच के घेरे में, लेकिन पुलिस कार्रवाई से दूर
~ नितेश सिंह का इतिहास शुमार अतीत व ठेकेदारी का जटिल नेटवर्क
देवनाथ मौर्य….
वाराणसी। ‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं’ रामचरितमानस की ये पंक्ति पूर्वांचल के माफिया-राजनीति गठजोड़ को बखूबी चरितार्थ करती है। सदर तहसील परिसर में 30 सितंबर 2019 को दिनदहाड़े ठेकेदार नितेश सिंह उर्फ बबलू की हत्या ने उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा किया था। लेकिन पांच वर्षों बाद भी इस बहुचर्चित हत्याकांड में प्रमुख आरोपियों पर कानून की नजर नहीं पड़ी। पूर्वांचल के दो सबसे चर्चित नाम पूर्व सांसद धनंजय सिंह और माफिया से माननीय बने बृजेश सिंह इस हत्या की पटकथा में बार-बार उभरते रहे, लेकिन दोनों आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। क्योंकि मामला जुड़ा है सत्तारूढ़ दल के केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह के परिवार के कथित व्यापारिक रिश्तों से।
- नितेश सिंह की हत्या 30 सितंबर 2019 को सदर तहसील परिसर में की गई
- लाइसेंसी हथियार रखने वाला नितेश गोली चलाने से पहले ही ढेर हो गया
- गिरधारी विश्वकर्मा उर्फ डॉक्टर की भूमिका का हुआ खुलासा
- गिरधारी की गिरफ्तारी के बाद 2021 में हुआ संदिग्ध एनकाउंटर
- मुन्ना बजरंगी की जेल में हत्या के बाद बढ़ी रसूख की लड़ाई
- पूर्व सांसद को नागवार गुजरी नितेश की बदलती वफादारी
- विक्रम सिंह ने खोली साजिश की परतें, हुआ तबादला
- हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई
- चंदौली विधायक और जौनपुर के पूर्व सांसद पर आरोप
- सीबीसीआईडी जांच पर उठे सवाल, अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं
- रसूखदारों की ‘संगत’ में रहने वाला नितेश आखिरकार बना शिकार

कब, कहां और कैसे हुआ कत्ल
30 सितंबर 2019 की दोपहर वाराणसी की सदर तहसील परिसर की हलचल अचानक गोलियों की गूंज से थम गई। ठेकेदारी, प्रॉपर्टी और बस संचालन जैसे कई धंधों में पैर जमाए नितेश सिंह उर्फ बबलू अपनी बुलेटप्रूफ गाड़ी की ओर बढ़ ही रहे थे कि तभी एक के बाद एक कई गोलियां चलीं। हमलावर थे गिरधारी लोहार और उसके साथी, जिनकी योजना सटीक और क्रूर थी। अंधाधुंध फायरिंग से नितेश वहीं ढेर हो गए। गोलीबारी इतनी तीव्र थी कि नितेश अपनी लाइसेंसी पिस्टल भी नहीं निकाल सके।प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हमलावर बेहद पेशेवर थे। गाड़ियों की आवाजाही और तहसील परिसर की सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद उन्होंने पूरी वारदात महज़ कुछ सेकंड में अंजाम दी और फरार हो गए। पुलिस की शुरुआती भूमिका इस जघन्य हत्याकांड में संदेहास्पद रही। न सिर्फ मौके से साक्ष्य संग्रहण में ढिलाई बरती गई, बल्कि शुरुआती जांच में शूटरों के नाम तक छुपाए गए। ये पर्देदारी बाद में कई परतों में खुलने वाली साजिश की ओर इशारा कर रही थी।
विक्रम सिंह की विवेचना और इनामस्वरूप ‘तबादला’
हत्याकांड के बाद जब वाराणसी क्राइम ब्रांच की जांच शुरू हुई तो तत्कालीन प्रभारी अधिकारी विक्रम सिंह ने महज कुछ ही हफ्तों में गिरधारी लोहार को मुख्य आरोपी के रूप में चिह्नित कर लिया। गिरधारी के आपराधिक इतिहास, मोबाइल लोकेशन और फाइनेंशियल ट्रेल से उसकी संलिप्तता पुष्ट हो गई। लेकिन विक्रम यहीं नहीं रुके। गिरधारी की गतिविधियों की कड़ी जब पूर्वांचल के माफिया डॉन बृजेश सिंह और बाहुबली नेता धनंजय सिंह से जुड़ी, तो अचानक जांच की दिशा बदल दी गई। और इसकी पहली झलक तब मिली जब विक्रम सिंह का ट्रांसफर मैनपुरी कर दिया गया वह भी रातोंरात। हालांकि इस तबादले को ‘इनाम’ की तरह देखा गया। एक ईमानदार अधिकारी को केस से हटाकर जांच को पंगु बनाने की कार्रवाई। उनका केस से हटाया जाना न सिर्फ संदिग्ध था बल्कि ये दर्शाता था कि विवेचना की दिशा किसी के इशारे पर तय हो रही थी। जिस तेजी से विक्रम सिंह को साइडलाइन किया गया, उसने साबित कर दिया कि हत्या की गूंज केवल बंदूक की नहीं, सत्ता की गलियों में भी सुनाई दी थी।

गिरधारी की गिरफ्तारी और फिर एनकाउंटर का ‘ड्रामा’
इस हत्याकांड का सबसे चौंकाने वाला मोड़ आया जनवरी 2021 में। 11 जनवरी को गिरधारी को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। उसे कई मामलों में वांछित बताया गया, और नितेश हत्याकांड में भी अहम भूमिका की पुष्टि की गई थी। लेकिन इसके बाद की घटनाएं एक सटीक स्क्रिप्टेड ‘एनकाउंटर ड्रामा’ जैसी लगती हैं। 14 फरवरी 2021 को लखनऊ में गिरधारी का एनकाउंटर कर दिया गया। पुलिस का दावा था कि वह हथियार छीनकर भागने की कोशिश कर रहा था। मगर सवाल उठे कि गिरफ्तारी के इतने कम समय में, बिना किसी खुलासे के, एक मुख्य अभियुक्त को क्यों मारा गया। नितेश के परिजनों और समाज के कई वर्गों ने इस एनकाउंटर को ‘सबूतों को मिटाने की साजिश’ कहा। गिरधारी, जिसने कथित तौर पर बड़े नामों का पर्दाफाश करना था, को बोलने से पहले ही हमेशा के लिए चुप कर दिया गया।
राजनीतिक गठजोड़ जब सत्ता बन जाए अपराध की ढाल
गिरधारी केवल एक मोहरा था, असली शतरंज के खिलाड़ी बृजेश सिंह व धनंजय सिंह। बृजेश सिंह, एक समय का कुख्यात माफिया, बाद में विधान परिषद सदस्य बना। उसके अपराधों का लंबा इतिहास है फिरौती, मर्डर, अपहरण, और सत्ता में पैठ बनाना। धनंजय सिंह पूर्व सांसद, राजनीति और अपराध के समीकरणों के पुरोधा। उसके ऊपर भी कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, पर अदालती फैसलों और सत्ता के गठजोड़ ने उन्हें हमेशा ‘बचाया’। इस गठजोड़ को और मजबूत बनाती है एक और कड़ी केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के परिवार से इन दोनों का व्यापारिक संबंध रहा। राजनीतिक हलकों में ये वर्षों से चर्चा का विषय रहा है कि बृजेश और धनंजय, सिंह परिवार की व्यापारिक संस्थाओं में साझेदार या हितधारक हैं। वादी पक्ष का आरोप है कि इसी संबंध के चलते न पुलिस ने अपनी आंखें खोलीं, न जांच एजेंसियों ने। कानून की आंखों पर सत्ता की पट्टी बांध दी गई।
मुन्ना बजरंगी हत्याकांड और ‘वर्चस्व युद्ध’ की पृष्ठभूमि
9 जुलाई 2018, बागपत जेल में कुख्यात माफिया मुन्ना बजरंगी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस हत्याकांड के बाद पूर्वांचल की अपराध राजनीति में वर्चस्व युद्ध की नई लकीरें खिंच गईं। नितेश, जो पहले बजरंगी खेमे से जुड़ा हुआ माना जाता था, धीरे-धीरे लखनऊ के एक रसूखदार के नजदीक हो गया। यह रसूखदार उत्तर प्रदेश की सत्ता के बेहद करीबी माने जाते हैं। इस बदली वफादारी ने नितेश को पुराने आका बृजेश और धनंजय से दूर कर दिया। नितेश ने वर्चस्व की नई लड़ाई में अपना पक्ष बदला, जो उसकी जान की कीमत बना। सत्ता के समीकरण बिगाड़ने का नतीजा दिनदहाड़े कत्ल और बाद में लीपापोती में निकला।
एक सप्ताह की रेकी व हमलावरों की तैयारी
पुलिस जांच से पता चला कि हत्याकांड से पहले गिरधारी की टीम ने पूरे एक सप्ताह वाराणसी में ठहरकर रेकी की। शिवपुर में एक फ्लैट, जो किसी स्थानीय करीबी का था, वहां शूटरों को ठहराया गया। नितेश की दिनचर्या, अदालतों में पेशी, गाड़ियों की आवाजाही और सुरक्षा व्यवस्था। सबकी बारीकी से निगरानी की गई। फिर तय किया गया कि सबसे कमजोर दिन और समय तहसील परिसर की भीड़भाड़ में हमला होगा। यह हमला केवल हत्या नहीं था यह एक सटीक रणनीतिक ‘अभियान’ था। गोलीबारी इतनी तेज और अचूक थी कि नितेश की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई।
शूटर इतने प्रशिक्षित थे कि उन्होंने नितेश को कोई प्रतिक्रिया देने तक का मौका नहीं दिया।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप और सीबीसीआईडी की निष्क्रियता
हत्या के बाद जब जांच भटकने लगी तो हाईकोर्ट ने रिट संख्या 16884/2020 के तहत सीबीसीआईडी को जांच सौंपने का आदेश दिया। आदेश साफ था दो महीने में पूरी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी जाए। लेकिन अब तक, यानी 2025 तक, न रिपोर्ट आई, न किसी बड़ी गिरफ्तारी या निष्कर्ष का संकेत मिला। वादी पक्ष का आरोप है कि सीबीसीआईडी भी सत्ता और रसूख के दबाव में निष्क्रिय रही। ऐसे मामलों में न्यायपालिका ही अंतिम उम्मीद होती है, लेकिन जब जांच एजेंसी ही ढीली हो तो न्याय की उम्मीद दूर होती जाती है। इस बीच नितेश के परिवार ने कई बार राज्य सरकार और केंद्र से सीबीआई जांच की मांग की, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला। लगता है जैसे नितेश का हत्याकांड धीरे-धीरे सरकारी फाइलों में दफन करने की ओर बढ़ रहा है।
नितेश सिंह बबलू की पृष्ठभूमि अपराध, रसूख और अंत
नितेश सिंह मूलतः चंदौली जनपद के धानापुर गांव के रहने वाले थे। उनकी शुरुआत ठेकेदारी और बस संचालन से हुई थी। गाजीपुर से बनारस और फिर मध्यप्रदेश तक बसों का संचालन उनके वर्चस्व का प्रमाण था। धीरे-धीरे प्रॉपर्टी डीलिंग और स्थानीय राजनेताओं के संपर्कों ने उन्हें और ऊंचाई दी। लेकिन यह सफर बेदाग नहीं था। 2010 के डॉ.वी.पी. सिंह हत्याकांड में भी नितेश का नाम सामने आया था, हालांकि मुकदमा साबित नहीं हो सका।
वे रसूखदारों के बीच पले-बढ़े और उसी सत्ता संरचना में एक ‘उपयोगी मोहरा’ बनते गए। उनकी मृत्यु ने कई चेहरों पर पड़े नकाब खींचने का अवसर दिया, लेकिन सत्ता, अपराध और जांच की गहरी मिलीभगत ने आज तक कोई न्याय नहीं होने दिया।
एक हत्या अनेक चेहरों की बेनकाबी की प्रतीक्षा
नितेश सिंह हत्याकांड केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी यह उस अपराध-सत्ता गठजोड़ की कहानी है, जो आज भी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में कानून से ऊपर है। जहां जांच करने वाले ईमानदार अधिकारी को ‘इनाम’ स्वरूप ट्रांसफर मिलता है, मुख्य आरोपी को खुलासा करने से पहले ही एनकाउंटर में मार दिया जाता है, वहां न्याय की उम्मीद अपने आप शर्मसार हो जाती है। राजनीतिक संरक्षण, पुलिसिया चुप्पी, न्यायिक निष्क्रियता और सीबीसीआईडी की निष्क्रियता ये सारे घटक इस मामले को देश के चर्चित माफिया-सत्ता गठजोड़ के मामलों की सूची में शामिल कर देते हैं। नितेश सिंह की हत्या की पटकथा वही है, जिसमें कलम से पहले गोली चलती है और फिर कलम हमेशा मौन रहती है।




