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डॉक्टर सन्दीप चौधरी का काम बेहद घिनौना,ब्रजेश पाठक के दिशा निर्देश को समझ रखा है खिलौना

वाराणसी के सीएमओ की पड़ताल

  • तड़पते मरीज, सीएमओ के पास गाड़ियों का काफिला स्वास्थ्य विभाग बना वसूली का अड्डा
  • एंबुलेंस के अभाव में मरीज दम तोड़ते, सीएमओ के पास महंगी गाड़ियों का अंबार
  • सीएमओ डॉ. संदीप चौधरी की वेतन कटौती पर विभाग में ‘गुप्त कोड’ कोई नहीं जानता सच्चाई
  • डॉ.पीयूष राय और स्टेनो संजय साहू पर वसूली के आरोप, रकम पहुंचती ‘ऊपर’ तक
  • एनएचएम चिकित्सकों की पोस्टिंग में नियम ताक पर, सुविधा शुल्क पर होता ट्रांसफर
  • बिना पैसा दिए अधिकारियों-कर्मचारियों का तबादला, पदावनति या मानसिक उत्पीड़न
  • निजी अस्पतालों को मोटी रकम लेकर मिलती मनमानी की छूट
  • हर गली-मोहल्ले में ‘पैसे वाला’ अस्पताल, बिना मानक और बिना जांच खुल रहे सेंटर
  • कुकुरमुत्ते की तरह खुले पैथोलॉजी सेंटर जांच के नाम पर लूट का खेल

वाराणसी। पीएम के संसदीय क्षेत्र में स्वास्थ्य महकमे की तस्वीर ऐसी है, जहां मरीज की जान और मौत के बीच का फासला तय करता है पैसा चाहे वह इलाज का हो या अस्पताल खोलने की ‘अनुमति’ का। एंबुलेंस के लिए घंटों इंतजार करते मरीज सड़क पर दम तोड़ देते हैं, लेकिन सीएमओ डॉ. संदीप चौधरी के पास गाड़ियों का ऐसा काफिला है कि पार्किंग की जगह कम पड़ जाए। यह विरोधाभास सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की बीमार सोच का प्रतीक है।

एंबुलेंस के बिना मरते मरीज, सीएमओ का ‘फ्लीट शो’

बीते महीने शहर के लहरतारा निवासी 26 वर्षीय मुकेश यादव की सड़क दुर्घटना में हालत गंभीर हो गई। परिजन ने 108 नंबर पर कॉल किया, लेकिन आधे घंटे तक एंबुलेंस नहीं पहुंची। मजबूरी में उन्होंने निजी टैक्सी बुलाई, लेकिन रास्ते में ही मुकेश ने दम तोड़ दिया। इसी दौरान सीएमओ के दफ्तर व आवास पर सरकारी गाड़ियों का काफिला सजा रहा। सायरन वो नीली बत्ती लगी सरकारी कारें खड़ी रहीं। स्वास्थ्य विभाग के संसाधन आम मरीज के लिए नहीं, बल्कि अफसरों की ‘सुविधा’ के लिए है।

वेतन कटौती की ‘गुप्त किताब’

सीएमओ के वेतन से कितनी कटौती होती है और किस मद में इस पर न कोई आधिकारिक जवाब मिलता है, न कोई लिखित रिकॉर्ड। विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि यह मामला ‘संवेदनशील’ है और इस पर बोलने का मतलब खुद को मुश्किल में डालना।
पारदर्शिता का यह अभाव महकमे में शंका को जन्म देता है।

वसूली के खेल के सरगना डॉ.पीयूष राय व स्टेनो संजय साहू

सूत्रों की मानें तो जिले के निजी अस्पताल, पैथोलॉजी सेंटर और डॉक्टरों से हर महीने तय रकम वसूली जाती है। इस काम में सीएमओ के साथ उनके भरोसेमंद सहयोगी डॉ.पीयूष राय और स्टेनो संजय साहू की संलिप्तता है। सूत्रों ने बताया कि पहले दर तय होती है, फिर वसूली के लिए ‘संदेशवाहक’ भेजा जाता है। वसूली की रकम पहले स्टेनो संजय साहू के पास जाती है, फिर ‘ऊपर’ तक पहुंचाई जाती है। कई अस्पताल संचालकों का दावा है कि यह ‘मासिक टैक्स’ न देने पर अस्पताल पर छापेमारी, लाइसेंस रद्द और जांच रिपोर्ट में खामियां गिनाने का खेल शुरू हो जाता है।

एनएचएम चिकित्सकों की पोस्टिंग का बाजार

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत जिले में दर्जनों डॉक्टर कार्यरत हैं। इनकी तैनाती का खेल भी पूरी तरह ‘सुविधा शुल्क’ पर आधारित बताया जाता है। जो पैसा देते हैं उन्हें शहर या संसाधनयुक्त स्वास्थ्य केंद्र। जो नहीं देते हैं उन्हें दूर-दराज बिना सुविधाओं वाले केंद्रों पर भेजा जाता है। ऐसे मामलों में मरीजों की सेवा से ज्यादा प्राथमिकता ‘रेवेन्यू कलेक्शन’ को दी जाती है।

* एंबुलेंस किल्लत बनाम सीएमओ का गाड़ियों का शौक
* जिला अस्पताल और ग्रामीण क्षेत्रों में मरीज एंबुलेंस के अभाव में तड़पते हैं
* प्रसूता, एक्सीडेंट पीड़ित और गंभीर बीमार मरीजों को बाइक, रिक्शा या निजी वाहन से लाना पड़ता है
* सीएमओ डॉ. संदीप चौधरी के पास निजी और सरकारी गाड़ियों का अंबार
* सीएमओ के वेतन से कटौती की ‘गुप्त कहानी’
* विभागीय वेतन कटौती की प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं।
* कितनी कटौती और क्यों इसका पता किसी को नहीं
* पारदर्शिता के अभाव में भ्रष्टाचार को बढ़ावा
* वसूली सिंडिकेट डॉ. पीयूष राय और स्टेनो संजय साहू की भूमिका
* निजी अस्पतालों, पैथोलॉजी और डॉक्टरों से तय रकम की वसूली
* वसूली का पैसा स्टेनो संजय साहू के पास होता है जमा
* डॉ.पीयूष राय तय करते है वसूली की रकम बाकायदा ‘रेट लिस्ट’ का मौखिक सिस्टम
* एनएचएम चिकित्सकों की पोस्टिंग में मनमानी
* नियमों को ताक पर रखकर मनपसंद पोस्टिंग
* पैसा देने वालों को शहर या बेहतर लोकेशन, न देने वालों को दूरस्थ व संसाधनहीन जगह

‘ना’ कहने वालों की बर्बादी

जो अधिकारी या कर्मचारी वसूली सिस्टम में हिस्सा नहीं लेते, उनकी विभाग में दुर्गति तय है।
अचानक ट्रांसफर, छुट्टी मंजूर न करना, कार्यभार बढ़ाकर मानसिक उत्पीड़न किया जाता है। एक नर्स ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हमने पैसा पैसा नहीं दिया, तो अगले ही हफ्ते हमारा ट्रांसफर जिले के सबसे अंदरूनी और खतरनाक क्षेत्र में कर दिया गया।

निजी अस्पतालों को मनमानी की खुली छूट

जिले में ऐसे कई निजी अस्पताल हैं जिनके पास न तो योग्य डॉक्टर हैं और न ही न्यूनतम इंफ्रास्ट्रक्चर, फिर भी वे मरीज भर्ती कर ऑपरेशन कर रहे हैं। इसका कारण कमीशन के बदले अनदेखी। स्वास्थ्य मानकों की जांच का काम सिर्फ कागजों पर होता है। जो रकम चुका देते हैं, उनके अस्पताल पर विभागीय कार्रवाई का खतरा शून्य हो जाता है।

गली-मोहल्लों में अस्पताल खोलने का ‘लाइसेंस’

नियम यह है कि अस्पताल खोलने से पहले स्वास्थ्य विभाग निरीक्षण करेगा और मानकों की पुष्टि के बाद लाइसेंस देगा। हकीकत यह है कि पैसे देकर कोई भी अस्पताल खोल सकता है। चाहे वह संकरी गली में हो, भीड़भाड़ वाले बाजार में या आवासीय कॉलोनी में हो।

पैथोलॉजी सेंटर का लूट बाजार

पैथोलॉजी सेंटर का हाल ऐसा है जैसे बारिश में कुकुरमुत्ते उगते हैं। कई सेंटर बिना पंजीकरण और बिना योग्य तकनीशियन के चलते हैं। जांच के नाम पर मोटी रकम ली जाती है, रिपोर्ट की गुणवत्ता संदिग्ध रहती है। सरकारी जांच टीम का नाम लेकर सेंटर मालिक डराते हैं कि ‘ऊपर’ से सब सेट है, कोई कुछ नहीं करेगा। स्वास्थ्य विभाग इस समय एक ‘वसूली मशीन’ बन चुका है, जहां मरीज की जिंदगी और मौत से ज्यादा अहमियत ‘कलेक्शन’ को दी जाती है। नियमों की जगह सुविधा शुल्क का राज और अस्पताल की जगह लूट बाजार यही जिले के स्वास्थ्य तंत्र की सच्ची तस्वीर है।

* सुविधा शुल्क न देने वालों की ‘दुर्गति’
* ट्रांसफर, पदावनति, छुट्टी न मंजूर करना, काम का अनावश्यक दबाव
* कुछ मामलों में प्रताड़ना इतनी बढ़ी कि कर्मचारी ने विभाग छोड़ दिया
* निजी अस्पतालों को मनमानी की खुली छूट
* बगैर मानक, बगैर नियम पालन के संचालन की अनुमति।
* कई अस्पतालों में योग्य डॉक्टर तक नहीं, फिर भी मरीज भर्ती
* बिना जांच अस्पताल खोलने का लाइसेंस
* पैसा देकर किसी भी गली-मोहल्ले में अस्पताल खोलने की अनुमति
* पैथोलॉजी सेंटर का लूट बाजार, कुकुरमुत्ते की तरह खुले
* जांच के नाम पर मोटी रकम, रिपोर्ट की गुणवत्ता संदिग्ध।
* सरकारी जांच टीम का नाम लेकर भय पैदा कर पैसा वसूलना

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