अंधभक्त बुद्धि वाले गजब के कलाकार,कुतर्को से बहस करते अपरम्पार

डिग्रीधारी अंधभक्त ऊंची दुकान, फीके पकवान
जातिवादी विद्वान रंगीन कांच से भविष्य देखना
धर्माधीश ‘एक ही दांव’ की राजनीति
पूंजीवादी बुद्धिजीवी संकट भी व्यवस्था के भीतर
रिटायर्ड अफसर अनुभव भारी, दिमाग हल्का
महापुरुष डिग्रियों में ऊंचे, सोच में नीचे
नये अंधभक्त लाल सलाम में जातिवाद की मिलावट
सच्चा कम्युनिस्ट दीवारों से परे की उड़ान
सुशीम संघप्रिय
कहते हैं कि इंसान की पहचान उसकी सोच से होती है, मगर अंधभक्तों की पहचान उनकी आंखों पर बंधी पट्टी और गले में लटकते धर्म-जाति के ताबीज से होती है। यह लोग मानते हैं कि डिग्री से दिमाग खुल जाता है, ऊंची जात से बुद्धि गहरी हो जाती है और उम्र बढ़ने से विवेक अपने आप उतर आता है। मगर हकीकत यह है कि इनके पास डिग्रियों का अंबार है, मगर सोच का बक्सा खाली। ऊंची जात है, मगर विचार इतने नीच कि सुनकर बाज भी शर्मा जाए। उम्र ढल गई, मगर समझ बचपन की जिद से आगे नहीं बढ़ी। ये लोग बाज की तरह ऊंची उड़ान भर सकते थे, मगर इन्होंने अपनी उड़ान घर की दीवारों और जाति-धर्म के दरवाजों तक सीमित कर दी। नतीजा यह हुआ कि इनकी सोच वही है जो पुश्तैनी संदूक में बंद है न कोई ताला खुला, न ताला बदला।
डिग्रीधारी अंधभक्त ऊंची दुकान, फीके पकवान
अंधभक्तों को लगता है कि डिग्री जितनी ऊंची, सोच उतनी गहरी। लेकिन यह डिग्रियां उनके लिए वैसी ही हैं जैसे दीवार पर टंगी फोटो देखने में चमकीली, मगर दिमाग में अंधेरा। मठाधीश ग्रंथ याद कर लेते हैं, अनुवाद कर लेते हैं, मगर जब उनसे पूछा जाए कि बेरोजगारी का क्या होगा, तो उत्तर होता है जप करो, तप करो। यानी कुश्ती का एक ही दांव पूजा कर लो, सब ठीक हो जाएगा।
रंगीन कांच से भविष्य देखना
जातिवादी अंधभक्त कितने भी विद्वान हों, समाधान हमेशा जाति के दायरे में ढूंढते हैं। उनकी सोच वैसी है जैसे कोई टॉर्च लेकर समंदर की गहराई नापने निकले। वे जाति उन्मूलन भी जाति के भीतर चाहते हैं। यानी सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
धर्माधीश और ‘एक ही दांव’ की राजनीति
धर्माधीशों की सोच इतनी सीमित कि 100 बीमारियों की दवा एक ही मंत्र जपो, आरती करो, माला फेरो।
महंगाई-माला फेरो, भ्रष्टाचार-आरती गाओ, युद्ध-प्रसाद खाओ। इन्हें लगता है जैसे पूरा समाज एक अखाड़ा है और इनकी कुश्ती में सिर्फ एक ही दांव काम करता है।
पूंजीवादी विद्वान संकट भी व्यवस्था के भीतर
पूंजीवादी विचारक कितने भी चतुर हों, समाधान हमेशा उसी व्यवस्था के भीतर खोजते हैं। ये ऐसे डॉक्टर हैं जो कहते हैं बीमारी तो रहेगी, बस उसका ब्रांड बदल देंगे। पूंजीवाद डूब रहा है, मगर इनके लिए समाधान यही है कि पूंजीवाद को और गाढ़ा करो।
रिटायर्ड अफसरों की छिछली समझ
कई रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस जिनके पास अनुभव का पहाड़ और डिग्रियों का अम्बार है, उनकी समझ उथली। वे जाति-धर्म के चश्मे से आगे देख ही नहीं पाए।उनका चिंतन वैसा है जैसे कोई बाढ़ के समय ‘मट्ठा पीने’ की सलाह दे।
महापुरुष या महा-पुराना
कुछ लोग ऊंचे पदों पर रहे, डिग्रियां हासिल कीं, किताबें लिखीं, भाषण दिए। मगर उनके विचार इतने छिछले कि सुनने वाले सोचें ये ही विद्वान हैं। असल में उनकी जातीय मानसिकता ही उनकी कल्पनाशक्ति की कब्रगाह बन गई।
नये अंधभक्त लाल सलाम में जातिवाद की मिलावट
कुछ नए जमाने के नेता खुद को कम्युनिस्ट कहते हैं, मगर असल में जातिवादी राजनीति कर रहे हैं। ‘जय भीम लाल सलाम’ का नारा देकर वे जातिवाद को मार्क्सवाद के साथ घालमेल कर रहे हैं। ये लोग भी नये तरह के अंधभक्त हैं। रूप बदला, मगर सोच वही पुरानी।
सच्चा कम्युनिस्ट दीवारों से परे की उड़ान
असली कम्युनिस्ट जाति, धर्म, पंथ, भाषा, रंग सबके पार जाकर सोचता है। उसकी कल्पनाशक्ति भविष्य की ओर होती है। उसके लिए कोई दीवार नहीं, कोई सीमा नहीं। । यही वजह है कि बहुत बार कम डिग्री वाले, युवा कार्यकर्ताओं की समझ गहरी और भविष्यदर्शी होती है।
* डिग्री का अंबार, मगर सोच का ‘खाली गुदाम’
* जातिवादी नेता बोतल बदल गई, शराब वही
* धर्माधीशों की कुश्ती हर दांव पूजा-पाठ
* पूंजीपति विद्वान डूबते जहाज को और रंगवा दो
* रिटायर्ड अफसर अनुभव भारी, दिमाग हल्का
* महापुरुष डिग्रियों में ऊंचे, सोच में नीचे
* नए अंधभक्त लाल सलाम में जातिवाद का तड़का।
* सच्चा कम्युनिस्ट दीवारों से परे उड़ने वाला बाज़।

