उत्तर प्रदेश

परिवहन आयुक्त की कारगुजारियां

बीएन सिंह अवैध वसूली के गब्बर,लक्ष्मी प्राप्ति के लिए चलाते रहते है उल्टा सीधा चक्कर

फर्जी पंजीकरण की फैक्ट्री बना महोबा परिवहन कार्यालय,नारायणी कोठा का सरदार बीएन सिंह की कृपा, कागजों में गोलमाल का खेल

आईडी प्रूफ का अपराधीकरण निर्दोष नागरिकों के नाम पर बसें पंजीकृत, पते से की धोखाधड़ी

चालानों से बेइज्जती पता दुरुपयोग कर सामाजिक अपमान की रची साजिश

बांदा से बरेली जांच ट्रांसफर हकीकत दबाने की लीपापोती, अदालत के आदेश की अनदेखी

बीएन सिंह का रेट कार्ड : दो लाख में सिपाही, दस लाख में पीटीओ पोस्टिंग बनी नीलामी

50 प्रतिशत कमीशन का सीधा खेल ‘सिस्टम’ के नाम पर रिश्वत की आधी कमाई आयुक्त की जेब में।

‘मौसम-ए-वसूली’ फाइल आगे बढ़ाने के लिए अनिवार्य ‘चढ़ावा’, ईमानदारी का घोंटा गला

योगी के ‘भ्रष्टाचार मुक्त शासन’ की खुली पोल सिद्धांतों की बलि, नियत का जनाजा, प्रशासन मौन

〈विशेष संवाददाता〉

लखनऊ/महोबा उत्तर प्रदेश का परिवहन विभाग अब महज़ एक सरकारी संस्था नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की ‘चलती फिरती फैक्ट्री’ बन चुका है। महोबा से बरेली तक फैला यह खेल न केवल प्रशासन की ईमानदारी को निगल रहा है बल्कि आम नागरिकों की पहचान, उनकी प्रतिष्ठा और उनका सामाजिक जीवन भी दांव पर लगा रहा है। नारायणी कोठा की कृपा से महोबा परिवहन कार्यालय तो मानो फर्जी पंजीकरण का अड्डा बना दिया गया है। यहां 30 से अधिक स्लीपर बसों के कागजों में ऐसा गोलमाल रचा गया कि असल मालिकों को अपने नाम से पंजीकृत वाहनों की खबर तक नहीं। उनकी आईडी प्रूफ का अपराधों में इस्तेमाल हुआ, पते का दुरुपयोग कर उन्हें चालानों के जरिए बेइज्जत किया गया। अदालत ने साफ़ आदेश दिया कि एफआईआर दर्ज कर जांच की जाए, मगर सरकार और पुलिस ने फाइलों को महज एक थाने से दूसरे थाने तक घुमा कर लीपापोती का खेल खेला। भ्रष्टाचार का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। परिवहन आयुक्त कार्यालय, जिसे अब लोग व्यंग्य में ‘नारायणी कोठा’ कहने लगे हैं, ट्रांसफर-पोस्टिंग का खुला बाजार बन चुका है। सिपाही से लेकर पीटीओ तक हर पद की तय रेट-लिस्ट है, दो लाख से लेकर दस लाख तक। आधी रकम सीधे बीएन सिंह की जेब में जाती है और बाक़ी ‘सिस्टम’ के नाम पर बंट जाती है। यहां फाइल आगे बढ़ाने का मतलब ही है ‘चढ़ावा’ देना। यह वही प्रदेश है जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा करते हैं, मगर हकीकत यह है कि उनके ही अफसरशाह सिद्धांतों की बलि देकर अपनी जेबें भर रहे हैं।

फर्जी पंजीकरण का साम्राज्य

उत्तर प्रदेश का परिवहन विभाग अब कानून और व्यवस्था का प्रहरी नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुका है। महोबा से बरेली तक फैला यह साम्राज्य आम नागरिकों की पहचान और सम्मान को पैरों तले रौंद रहा है। टेढ़ी कोठी, जिसे कभी आम जनता एक सरकारी कार्यालय के रूप में देखती थी, अब ‘फर्जी पंजीकरण की फैक्ट्री’ के नाम से कुख्यात हो चुकी है। यहां से निकलने वाले हर दस्तावेज़ पर सवालिया निशान है। 30 से ज़्यादा स्लीपर बसें ऐसी निकलीं जिनके मालिकों को अपने नाम पर पंजीकृत वाहनों की खबर तक नहीं। इन वाहनों का पंजीकरण ऐसे पते और पहचान पत्रों पर हुआ, जिनका असली मालिक निर्दोष नागरिक है। उनके नाम पर कर्ज, चालान और सामाजिक बेइज्जती का बोझ लादा गया। पीड़ितों ने शासन को चिट्ठियां लिखीं, रजिस्टर्ड डाक से भेजी, मगर हर बार एक ही नतीजा कोई कार्यवाही नहीं। यह महज गलती नहीं थी, बल्कि सुनियोजित धोखाधड़ी। एक ऐसी पटकथा, जहां आईडी प्रूफ का आपराधिक इस्तेमाल हुआ और सरकारी अफसरों ने आंखें मूंद लीं।

अदालत बनाम प्रशासन

जब पीड़ितों की पुकार सरकार और प्रशासनिक गलियारों तक नहीं पहुंची, तब उनके पास एक ही रास्ता बचा अदालत की चौखट। न्यायालय के समक्ष मामले की गंभीरता रखी गई और विस्तृत दस्तावेज़ प्रस्तुत हुए। न्यायपालिका ने हालात को गंभीर मानते हुए स्पष्ट आदेश दिया एफआईआर दर्ज कर जांच की जाए। यह आदेश न केवल क़ानूनी औपचारिकता थी बल्कि पीड़ितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा का प्रयास भी था। लेकिन विडंबना देखिए, अदालत का आदेश मिलने के बाद भी प्रशासन ने टालमटोल की रणनीति अपनाई। एफआईआर दर्ज करने की बजाय पुलिस और परिवहन विभाग ने जांच की फ़ाइल को जगह-जगह घूमाना शुरू कर दिया। पहले मामला बांदा स्थानांतरित किया गया, फिर उसे बरेली भेज दिया गया। यह स्थानांतरण किसी निष्पक्ष जांच का हिस्सा नहीं था, बल्कि लीपापोती और जिम्मेदारी से बचने का खेल था। पीड़ितों ने खुद कहा कि यह प्रशासन की मिलीभगत और दोषियों को बचाने की साजिश थी। न्यायालय ने जब ‘स्पष्ट’ कहा था, तब उसमें किसी व्याख्या की गुंजाइश नहीं थी। लेकिन प्रशासनिक मशीनरी ने इस आदेश को ऐसे पेश किया मानो यह महज एक सलाह हो, न कि कानूनी बाध्यता। यह रवैया न केवल न्यायपालिका की अवमानना था बल्कि पीड़ितों के साथ सीधा विश्वासघात भी। जब अदालत की बात को कागजों में धकेल दिया जाए और जमीनी स्तर पर अमल न हो, तो सवाल उठना लाजमी है। यह भी सामने आया कि जिन अधिकारियों पर जांच का जिम्मा था, वे ही शिकायत को दबाने में जुट गए। पुलिस थानों ने एफआईआर दर्ज करने से इंकार कर दिया और बहाने बनाने लगे दलील दी कि ‘प्रकरण हमारे अधिकार क्षेत्र का नहीं है’, ऊपर से आदेश नहीं है, कागजात अधूरे हैं। यह बहानेबाजी प्रशासनिक मशीनरी भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को उजागर करती है। अदालत और प्रशासन के इस टकराव ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। अगर न्यायालय के आदेश को भी ताक पर रखा जा सकता है, तो फिर आम आदमी कहां जाएगा? क्या न्याय सिर्फ़ आदेशों और नोट शीटों तक सिमट कर रह गया है। जनता के बीच यह चर्चा आम हो गई कि अगर अदालत का आदेश भी सिर्फ कागजों में सड़ता रह जाए तो आम इंसान की लड़ाई का क्या अंजाम होगा। क्या हर पीड़ित को न्याय पाने के लिए लगातार अदालतों की सीढ़ियां चढ़नी होंगी, या फिर यह मान लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार और प्रशासनिक उदासीनता के बीच न्याय का गला घोंट दिया गया है। पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि अदालत बनाम प्रशासन की लड़ाई में हार हमेशा जनता की होती है। न्यायपालिका का आदेश एक हथियार है, लेकिन जब उसे लागू करने की जिम्मेदारी उसी प्रशासन के हाथ में हो जो खुद भ्रष्टाचार में डूबा हो, तो वह हथियार भोथरा हो जाता है। पीड़ित की आवाज अदालत तक तो पहुंच गई, मगर जमीनी हकीकत में न्याय अब भी प्रशासनिक ‘लीपापोती’ के दलदल में फंसा हुआ है।

सामाजिक अपमान की साजिश

फर्जी पंजीकरण की यह कहानी केवल कानूनी और प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने निर्दोष नागरिकों के सामाजिक जीवन को भी गहरी चोट पहुंचाई। पीड़ितों के पते का दुरुपयोग कर उन पर चालानों की बौछार कर दी गई। यह कोई सामान्य त्रुटि नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित साजिश थी, जिसके पीछे उद्देश्य था, पीड़ितों को बदनाम करना, उन्हें मानसिक दबाव में डालना और भ्रष्टाचार के असली चेहरों को छुपाना। एक आम नागरिक जिसके पास न तो कोई बस है, न वाहन का कोई संबंध, अचानक उसके घर पर दर्जनों चालान आने लगें। डाकिया रोज नए चालान लेकर दरवाजे पर खड़ा हो। परिवार और पड़ोसियों के बीच सवाल उठने लगें ‘इतने चालान क्यों आ रहे हैं आखिर मामला क्या है’ यह स्थिति किसी भी सम्मानित परिवार के लिए असहनीय होगी। ऐसे हालात में पीड़ित न सिर्फ कानूनी लड़ाई लड़ेगा बल्कि सामाजिक अपमान का बोझ भी झेलेगा। जिनके नाम पर वाहन पंजीकृत किए गए, उन्हें न तो कभी इन बसों के बारे में जानकारी थी, न उन्होंने इनकी खरीद-बिक्री में कोई भूमिका निभाई। बावजूद इसके चालानों का सिलसिला उनके दरवाजे तक पहुंचाया गया। यह एक सुनियोजित सोशल ह्यूमेलिएशन कैंपेन जैसा था, जिसका मकसद था निर्दोषों को हताश और निराश करना। चालानों का यह खेल एक और गहरी सच्चाई को उजागर करता है। अगर सिस्टम में थोड़ी भी ईमानदारी होती, तो पते और वाहन मालिक की वास्तविकता को जांचने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बल्कि, पते का दुरुपयोग करके न सिर्फ फर्जी पंजीकरण किया गया, बल्कि उसे आधार बनाकर सामाजिक स्तर पर अपमानित करने की कोशिश की गई। समाज में उनकी छवि धूमिल हुई लोग कहने लगे कि ‘इतने चालान आने का मतलब जरूर कुछ गड़बड़ है’ यह कलंकित करने की रणनीति थी, ताकि असली गुनहगार पर्दे के पीछे सुरक्षित रहें और पीड़ित ही दोषी दिखाई दें। गौर करने वाली बात है कि चालानों की बौछार तब हुई, जब पीड़ितों ने फर्जी पंजीकरण के खिलाफ आवाज उठाई। यानी यह महज संयोग नहीं बल्कि एक बदले की कार्रवाई थी। एक तरह से यह पीड़ितों को चुप कराने और डराने की कोशिश थी। जब आप आवाज उठाएं और उसके बाद आपके खिलाफ अचानक चालानों की बरसात शुरू हो जाए, तो साफ़ समझ आता है कि यह सिस्टमेटिक साजिश है। पूरे प्रकरण ने यह साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार केवल धन की लूट तक सीमित नहीं है। यह लोगों की इज्जत और सामाजिक साख पर हमला करने तक पहुंच चुका है। जब किसी निर्दोष के नाम पर फर्जी वाहन पंजीकृत हों और फिर चालानों के जरिए उसे बदनाम किया जाए, तो यह दोहरी सजा है। एक तरफ कानूनी और आर्थिक बोझ, दूसरी तरफ सामाजिक अपमान।

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