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नेपाल के जन विद्रोह के कारण ओली सरकार गिरी,वहां की जनता बन गयी सिरफिरी

सोशल मीडिया प्रतिबंध से भड़की आग बनी जनविद्रोह

नेपाल की सड़कों से उठी आग युवाओं का ग़ुस्सा, सत्ता का डर और भारत की चिंता

नेताओं की रईसी और जनता की भूख यही है नेपाल के ताजा जनाक्रोश की जड़

काठमांडू जल रहा है युवाओं का गुस्सा, सत्ता के गलियारों में धमाका

20 से अधिक नौजवान मरे, सैकड़ों घायल सरकार की गोलीबारी ने आग में घी डाला

राष्ट्रपति आवास पर हमला, प्रचंड-ओली समेत बड़े नेताओं के घर फूंक डाले गए

राष्ट्रपति पौडेल और प्रधानमंत्री ओली दोनों ने त्यागा पद

जनविद्रोह के बीच काठमांडू के मेयर बालेन शाह बने युवाओं की उम्मीद

लोकतंत्र की बजाय भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई ने जनता को दिया धोखा

सोशल मीडिया प्रतिबंध केवल बहाना, असली विस्फोट भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ

नेपाल में लोकतंत्र की तस्वीर खून और आग की लपटों में जल रही है। सोमवार को सोशल मीडिया प्रतिबंध ने जिस गुस्से को जगाया, वह केवल बहाना था—असल में यह गुस्सा वर्षों से सड़ रही भ्रष्ट व्यवस्था, बेरोज़गारी और महंगाई के खिलाफ था। परिणाम यह हुआ कि काठमांडू से लेकर पूरे देश में विद्रोह फट पड़ा। पुलिस-सेना की गोलियों से 20 से अधिक नौजवान मारे गए, राष्ट्रपति का घर फूंक डाला गया, प्रधानमंत्री ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा और यहां तक कि राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को भी पद छोड़ना पड़ा। सवाल यह है कि नेपाल का लोकतंत्र कहां जा रहा है, क्या जनता फिर से राजशाही की तलाश में है या फिर सड़कों पर उबालती पीढ़ी नया भविष्य लिखेगी!

नेपाल की सड़कों पर आग और खून

नेपाल की राजधानी काठमांडू, जो सामान्य दिनों में पर्यटकों और संस्कृति की पहचान से भरी रहती है, आज धुएं और चीखों से गूंज रही है। विगत दिनों शुरू हुए विरोध-प्रदर्शन ने कुछ ही घंटों में हिंसक रूप ले लिया। सोशल मीडिया पर सरकार के प्रतिबंध ने आग लगाने का काम किया। युवाओं के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया केवल मनोरंजन नहीं बल्कि रोजगार, संवाद और अभिव्यक्ति का साधन है। इस पर ताला लगने का मतलब था उनकी आजादी का गला घोंटना। यही कारण है कि हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। पुलिस ने लाठीचार्ज किया और गोलियां चलाई, जिससे हालात और बिगड़ गए। 20 से अधिक नौजवान मारे गए, सैकड़ों घायल हैं। राजधानी काठमांडू समेत पोखरा, विराटनगर, जनकपुर और ललितपुर में आगजनी और तोड़फोड़ हुई।

सत्ता के प्रतीकों पर हमला

प्रदर्शनकारी महज नारेबाजी तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सत्ता के प्रतीकों पर हमला बोला। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल का निजी आवास प्रदर्शनकारियों ने घेर लिया, तोड़फोड़ की और आग के हवाले कर दिया। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के करीबी सहयोगी और नेता रघुवीर महासेठ का घर भी भीड़ ने तहस-नहस कर दिया। पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड, जो माओवादी आंदोलन के समय विद्रोह के प्रतीक थे, उनके घर पर भी हमला हुआ। जनता का गुस्सा इस कदर फूटा कि नेताओं के घर सुरक्षित नहीं रहे। इससे यह साफ संदेश गया कि आम लोग अब नेताओं को जनता का सेवक नहीं बल्कि भ्रष्ट सत्ता के ठेकेदार मानते हैं।

इस्तीफों की बाढ़ और सत्ता का शून्य

इस आंदोलन ने नेपाल की राजनीति की चूलें हिला दीं। गृहमंत्री रमेश लेखक, कृषि मंत्री रामनाथ अधिकारी, स्वास्थ्य मंत्री समेत पांच मंत्री पहले ही इस्तीफा दे चुके थे। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने प्रधानमंत्री ओली को सलाह दी कि वे सत्ता छोड़ दें ताकि हालात और न बिगड़ें। मंगलवार 9 सितंबर 2025 तक दोपहर ओली ने इस्तीफा दे दिया। इसके कुछ ही घंटे बाद राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भी अपना पद छोड़ने की घोषणा कर दी। अब नेपाल में सत्ता का शून्य खड़ा है। न प्रधानमंत्री, न राष्ट्रपति देश अनिश्चितता की खाई में धकेल दिया गया है।

युवाओं का नया चेहरा बालेन शाह

काठमांडू के मेयर बालेन शाह अचानक सुर्खियों में हैं। सोशल मीडिया पर युवाओं ने उन्हें सत्ता संभालने की अपील की है। बालेन शाह की लोकप्रियता युवाओं के बीच बहुत है, वे भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर रहते हैं और खुद भी युवा हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे नेपाल जैसे जटिल, गरीबी और भ्रष्टाचार से त्रस्त देश को चला पाएंगे। राजनीतिक अनुभव की कमी और सत्ता की चालाकियों से दूर होना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। फिर भी, युवाओं के बीच उनका नाम उम्मीद की तरह लिया जा रहा है।

लोकतंत्र का भ्रम और जनता की ठगी

2008 में नेपाल ने राजशाही का अंत किया और लोकतांत्रिक गणराज्य का सपना देखा। लेकिन पिछले 17 सालों में जनता ने देखा कि लोकतंत्र केवल कुर्सी की राजनीति बनकर रह गया। सरकारें बनतीं-बिगड़ती रहीं, नेताओं ने सत्ता का मज़ा लिया, लेकिन जनता को महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से राहत नहीं मिली। आज की पीढ़ी, जिसे जेन-जी कहा जाता है, ने राजशाही का अंधकार तो नहीं देखा, लेकिन लोकतंत्र के नाम पर जो भ्रष्टाचार और बदहाली देखी, उससे उनका भरोसा टूट गया। यही कारण है कि सोशल मीडिया प्रतिबंध ने असली गुस्से को बाहर निकाल दिया।

पड़ोसी देशों की याद दिलाता विद्रोह

नेपाल का यह आंदोलन अकेला नहीं है। कुछ महीने पहले बांग्लादेश और श्रीलंका में भी जनता सड़कों पर उतरी थी। श्रीलंका में राष्ट्रपति का घर घेरकर प्रदर्शनकारियों ने तैराकी तक की थी। बांग्लादेश में राष्ट्रपति आवास पर हमला हुआ। अब नेपाल में वही दृश्य दोहराए जा रहे हैं। इससे साफ है कि दक्षिण एशिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रहीं। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार हर जगह जनता को सड़कों पर ला रहा है।

नेपाल की अर्थव्यवस्था और जनता की पीड़ा

नेपाल की अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर है। पर्यटन, जो उसका मुख्य सहारा था, कोरोना काल के बाद अब तक पटरी पर नहीं लौटा। रोजगार के अवसर सीमित हैं, लाखों युवा खाड़ी देशों या भारत में काम करने को मजबूर हैं। देश के अंदर महंगाई बढ़ रही है, भ्रष्टाचार चरम पर है। जब जनता को रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलती, तो गुस्सा सड़कों पर ही फूटता है। यही आज नेपाल में हो रहा है।

लोकतंत्र का भविष्य या अराजकता

आज नेपाल चौराहे पर खड़ा है। लोकतंत्र का सपना टूटा-फूटा है, राजशाही लौटने की चर्चा चल रही है, और युवाओं में अराजक गुस्सा है। सवाल यह है कि क्या नेपाल अपनी राजनीतिक अस्थिरता से निकल पाएगा।यदि राजनीतिक दल ईमानदार सुधार नहीं करेंगे, तो जनता का गुस्सा अराजकता में बदल सकता है। नेपाल को मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं, ईमानदार नेतृत्व और पारदर्शिता चाहिए। वरना वह बार-बार अशांति और विद्रोह की आग में झुलसता रहेगा।

सोशल मीडिया पर ‘नेपोकिड’ की गूंज ने सत्ता को हिलाया

नेपाल में 8 सितंबर 2025 सोमवार को सोशल मीडिया की गलियों से उठी चिंगारी सड़कों तक पहुंच चुकी है। संसद परिसर तक घुस चुके युवाओं ने नारा लगाया हमारे टैक्स और तुम्हारी रईसी। यह नारा सिर्फ सत्ता को नहीं, पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति को आईना दिखाता है। लक्जरी कारों, ब्रांडेड कपड़ों और विदेशी दौरों में मग्न नेताओं की औलादों के खिलाफ उठी आवाज अब महज इंटरनेट ट्रेंड नहीं रह गई, बल्कि एक राजनीतिक भूचाल में बदल रही है। नेपोकिड हैशटैग ट्रेंड में है। हजारों युवाओं ने नेताओं के बच्चों की तस्वीरें और वीडियो साझा किए कोई महंगी स्पोर्ट्स कार चलाते हुए, कोई दुबई और सिंगापुर में छुट्टियां मनाते हुए, तो कोई लाखों की घड़ियों और कपड़ों का दिखावा करते हुए। इसके बरक्स, वही नौजवान जिनके घरों में रोजी-रोटी जुटाना भी मुश्किल है, गुस्से से सड़क पर उतर आए। यह नारा हमारे टैक्स और तुम्हारी रईसी सिर्फ नाराजगी नहीं, बल्कि एक घोषणा है कि अब चुपचाप सब सहा नहीं जाएगा। नेपाल की युवा आबादी, जिसे सोशल मीडिया ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य दिया है, जान चुकी है कि सत्ता की मनमानी उनके भविष्य को लील रही है।

नेतृत्वविहीन आंदोलन ताकत या कमजोरी

इतिहास बताता है कि ऐसे आंदोलनों में ऊर्जा तो बहुत होती है। लेकिन इसका न कोई स्पष्ट नेतृत्व, न कोई ठोस राजनीतिक विकल्प होता है। यही कारण है कि इनसे अराजकता फैलने का खतरा भी हमेशा बना रहता है।क्या यह आंदोलन सत्ता के खिलाफ स्थायी विकल्प गढ़ पाएगा या फिर श्रीलंका, बांग्लादेश की तरह यह भी अचानक उठेगा और उतनी ही जल्दी थम जाएगा।विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के आंदोलनों को नजर अंदाज करना घातक है। 2011 का ‘अरब स्प्रिंग’ इसका उदाहरण है। जहां सोशल मीडिया से उपजे गुस्से ने कई देशों की सत्ता को ध्वस्त कर दिया, लेकिन स्थायी लोकतंत्र गढ़ने में नाकाम रहा।

नेपाल की राजनीति डांवाडोल भविष्य

नेपाल में लोकतंत्र बहाली को अभी मुश्किल से दो दशक हुए हैं। लेकिन भ्रष्टाचार, दलगत राजनीति और सत्ता संघर्ष ने जनता को निराश कर दिया है। लगातार बदलती सरकारें, अस्थिर गठबंधन और नेताओं की लूट-खसोट ने आम आदमी का भरोसा तोड़ दिया है। इस समय नेपाल का राजनीतिक भविष्य डांवाडोल है। सोशल मीडिया पर पाबंदी ने युवाओं को और भड़का दिया। सरकार ने सोचा था कि आवाज दब जाएगी, लेकिन नतीजा उल्टा हुआ।

क्या वैश्विक ताक़तें भी हैं सक्रिय

नेपाल को लेकर भारत और चीन दोनों ही सतर्क रहते हैं। दिलचस्प यह है कि इसी दौरान चीन और नेपाल का संयुक्त सैन्य अभ्यास तय है। भारत की खुफिया एजेंसियां मानती हैं कि नेपाल की खुली सीमा का इस्तेमाल चीन और पाकिस्तान, दोनों, भारत विरोधी गतिविधियों के लिए करते हैं। यहीं से सवाल उठता है कि नेपाल में अचानक हिंसक आंदोलन क्यों भड़का, क्या यह महज जनता का गुस्सा है या फिर इसकी टाइमिंग के पीछे कोई बड़ी चाल है!

बिहार चुनाव से जुड़ाव

नेपाल की घटनाओं का असर सीधे-सीधे बिहार तक जाता है। नेपाल की सीमा बिहार से सटी हुई है। ऐसे में यह अस्थिरता सीमावर्ती इलाकों पर असर डालेगी। राजनीतिक हलकों में यह आशंका उठ रही है कि कहीं नेपाल की अस्थिरता का इस्तेमाल बिहार चुनाव को प्रभावित करने के लिए न किया जाए। नेपाल की सड़कें जल रही हैं और पटना के गलियारों में इस आग की आंच महसूस की जा रही है।

भारत का मीडिया और दोगला रवैया

नेपाल में इंटरनेट प्रतिबंध पर भारतीय मीडिया ने जमकर आलोचना की। लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के बड़े-बड़े पाठ पढ़ाए गए। लेकिन यही मीडिया तब खामोश रहा जब मणिपुर, जम्मू-कश्मीर या दिल्ली में किसान आंदोलन के दौरान इंटरनेट बार-बार काटा गया। यह दोहरा रवैया साफ बताता है कि मीडिया लोकतंत्र की पैरवी अपने हिसाब से करता है। पड़ोसी देशों में लोकतंत्र की दुहाई और अपने देश में सरकार की चुप्पी का बचाव।

दक्षिण एशिया का अस्थिर चक्र

श्रीलंका में आर्थिक संकट और राष्ट्रपति की गद्दी हिल गई। पाकिस्तान में सेना हावी है। बांग्लादेश में विपक्ष का दमन हो रहा है। अब नेपाल भी उसी कतार में खड़ा है।भारत को यह देखना होगा कि उसके चारों ओर लोकतंत्र लगातार कमजोर हो रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए अतिरिक्त सतर्कता ज़रूरी है, क्योंकि अस्थिर पड़ोसी, सुरक्षा और कूटनीति दोनों के लिए चुनौती हैं।

युवा पीढ़ी का गुस्सा दबेगा या बदलेगा

नेपाल के नौजवानों का यह गुस्सा क्या सत्ता को सचमुच झुका पाएगा या फिर यह आंदोलन अराजकता में बदलकर युवाओं को ही निराश करेगा। इतिहास बताता है कि जब युवा पीढ़ी की आवाज को दबाने की कोशिश होती है, तो उसके नतीजे लंबे समय तक असर डालते हैं। श्रीलंका का जन आंदोलन इसका ताजा उदाहरण है।
नेपाल का यह आंदोलन सिर्फ पड़ोसी देश का मसला नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति का आईना है। यह बताता है कि आज की युवा पीढ़ी भ्रष्टाचार, असमानता और सत्ता के दमन को अब किस्मत मानकर स्वीकार नहीं करेगी। भारत के लिए यह समय और भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि नेपाल की अस्थिरता की लपटें बिहार से लेकर दिल्ली तक असर डाल सकती हैं।

* नेपाल में सोशल मीडिया प्रतिबंध ने जनता के भीतर दबे गुस्से को जनविद्रोह में बदल दिया
* काठमांडू समेत कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन, 20 से अधिक नौजवान मारे गए, सैकड़ों घायल।
* राष्ट्रपति पौडेल और पीएम ओली के घरों समेत बड़े नेताओं के आवास फूंके गए।
* पांच मंत्रियों का इस्तीफा, सेना प्रमुख की सलाह पर प्रधानमंत्री ओली और राष्ट्रपति पौडेल ने भी पद छोड़ा।
* नेपाल अचानक बिना प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के गहरी अस्थिरता का दौर
* काठमांडू मेयर बालेन शाह युवाओं की उम्मीद बनकर उभरे, लेकिन अनुभवहीनता चुनौती।
* 2008 में राजशाही खत्म होने के बाद भी जनता को मिला भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई।
* सोशल मीडिया पर नेताओं के बच्चों की रईसी के वीडियो वायरल गुस्से की असली चिंगारी।
* नेपाल की अस्थिरता का असर बिहार चुनाव और सीमावर्ती सुरक्षा पर पड़ सकता है।
* चीन-नेपाल संयुक्त सैन्य अभ्यास और सीमा की संवेदनशीलता से भारत की खुफिया एजेंसियां सतर्क।
* नेपाल में इंटरनेट बंद होने पर शोर मचाने वाला भारतीय मीडिया, मणिपुर-कश्मीर पर चुप।

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