विचार/मुद्दा

नेता हो अधिकारी कहलाते है, जनता के नौकर, आम जन को मारते रहते है, लातों से ठोकर

 

● लोक सेवक या लोक लुटेरे? जब अफसरशाही का अहंकार संविधान से बड़ा हो जाए

● सेवा नहीं, सत्ता की सनक बन चुकी है अफसरशाही

● प्रशासनिक गलियारों में सवाल पूछना गुनाह और विरोध करना अराजकता

● फाइलों में दबा न्याय, नोटिंग शीट पर बिकता जनहित

● विभागीय जांचें सच का नहीं, सफाई का खेल

● भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम अब फाइलों की लाश

● लोकायुक्त और आयोग अब सत्ता के सेवानिवृत्त विश्रामालय

● जब अधिकारी ही अपराधी बन जाएं, तो जनता कहां जाए

● जनता ही असली मालिक है, अफसर केवल नियुक्त नौकर

 

अफसर जनता के सेवक हैं ऐसा संविधान कहता है। मगर उनकी कुर्सियों पर बैठी सत्ता अब सेवा नहीं, शासन करती है। आजादी के 75 साल बाद भी जब कोई प्रशासनिक अधिकारी अपनी वाणी को आदेश और अपनी मनमानी को नीति समझने लगे, तो लोकतंत्र केवल किताबों में रह जाता है। भारतीय न्याय संहिता 2023 ने भले ही लोक सेवक की नई परिभाषा दी हो, लेकिन जमीन पर यह परिभाषा अब ‘लोक के ऊपर सेवक’ बन चुकी है।

लोक सेवक की परिभाषा और व्यवस्था की विडंबना

बीएनएस 2023 की धारा 2(28) कहती है कि लोक सेवक का वही अर्थ है जो भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 21 में था। यानि जो व्यक्ति सरकारी, अर्ध-सरकारी या सार्वजनिक पद पर कार्य करता है और जनहित में अधिकार निभाता है, वह लोक सेवक है। पर सवाल है क्या आज का लोक सेवक सच में जनहित में कार्य करता है, या पद के हित में? एक अधिकारी जब जनता की याचिका सुनने से पहले व्यक्ति की जाति, प्रभाव या पहचान तौलता है, जब शासनादेश का मतलब ‘मेरे आदेश’ समझ लिया जाता है, और नियमों की किताबें सुविधा अनुसार खोली जाती हैं, ।। तब यह परिभाषा ‘लोक सेवक’ से ‘लोक शासक’ में बदल जाती है।

अफसरशाही की मनमानी जनता का मौन दमन

किसी जिले में आम नागरिक थाने या तहसील जाता है तो उम्मीद करता है न्याय की। मगर स्वागत होता है। उपेक्षा से, अपमान से, और कभी-कभी धमकी से भी।
प्रशासनिक अधिकारी के आदेश का विरोध करना अब अवज्ञा कहलाता है। जनता सवाल पूछे तो अराजक तत्व घोषित हो जाती है। लोकतंत्र के मंदिर में अफसरशाही की यह दीवार इतनी ऊंची हो गई है कि कानून की रोशनी भी उस तक नहीं पहुंचती। कानून कहता है लोक सेवक जनता के लिए जवाबदेह है, मगर जमीनी हकीकत है जनता ही हर अत्याचार के लिए जवाब देती है। अफसरशाही के इस दर्प के सामने संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) दम तोड़ देते हैं।

जब लोक सेवक बन जाए विधि-विरुद्ध कार्य का अपराधी

कानूनी तौर पर अगर कोई लोक सेवक विधि-विरुद्ध कार्य करता है, तो उस पर कई धाराएँ लागू होती हैं —
BNS 2023 की धाराएँ 198 से 205 तक, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13,
और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन पर संवैधानिक उपाय। लेकिन व्यवहार में शिकायत लिखी जाती है, जांच बैठती है, और जांच प्राथमिक रिपोर्ट के अभाव में निरस्त हो जाती है। अधिकारियों के बीच एक मौन गठबंधन बन चुका है आज तेरे खिलाफ नहीं बोलेंगे, कल तू हमारे खिलाफ नहीं बोलेगा। यही मिलीभगत जनता के भरोसे को रोज-रोज तोड़ रही है।

सेवा नहीं सत्ता की मानसिकता

लोक सेवक शब्द कभी गांधी और नेहरू के दौर में त्याग, सेवा और विनम्रता का प्रतीक था। आज यह शब्द नोटिंग शीट और फाइल मूवमेंट की सत्ता भाषा में कैद है। एक समय था जब अधिकारी जनता के घर जाकर समस्याएं सुनते थे, अब अधिकारी जनता को ईमेल भेजो या जनसुनवाई ऐप डाउनलोड करो कहकर टरका देते हैं। यह डिजिटल बहाना असल में जवाबदेही से बचने की नई तकनीक बन चुका है। सरकार के पोर्टल और नागरिक ऐप अब पारदर्शिता के नहीं, ‘टालमटोल के औजार’ बन गए हैं।

लोक सेवक की मनमानी और जनता की बेबसी

किसी अफसर का फोन न उठाना अब सामान्य बात है,
जनता की अर्जी महीनों तक फाइलों में धूल फांकती है।
अगर कोई नागरिक सोशल मीडिया पर अफसर की कार्यशैली पर सवाल उठाए, तो उसी पर मानहानि या धमकी का केस कर दिया जाता है। लोक सेवक के पास शक्ति है, जनता के पास केवल आवेदन और इस असमानता ने न्याय के अर्थ को विकृत कर दिया है।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम कानून की किताब में कैद एक सपना

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 कहता है कि कोई भी लोक सेवक यदि रिश्वत मांगे, ले या पद का दुरुपयोग करे तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। पर क्या कभी किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को इस अधिनियम में सजा मिली। क्योंकि इन मामलों में सबसे बड़ा हथियार होता है स्वीकृति की शर्त। किसी भी लोक सेवक पर मुकदमा चलाने से पहले सरकार की अनुमति अनिवार्य है। यानी न्याय की चाबी खुद उसी ताले में बंद है, जिसे खोलना है।

विभागीय जांचें न्याय का नाटक

जब कोई अधिकारी नियमों का उल्लंघन करता है, तो विभागीय जांच बैठती है। मगर यह जांचें सच की खोज नहीं, बल्कि सिस्टम को बचाने की औपचारिक रस्में हैं।
जांच रिपोर्ट का मतलब अक्सर होता है साक्ष्य अपर्याप्त हैं या कर्मचारी निर्दोष पाया गया। जनता यह समझ नहीं पाती कि हर फाइल का अंत संतोषजनक शब्द से क्यों होता है, जबकि असंतोष हर नागरिक के चेहरे पर दिखता है।

संविधान बनाम कुर्सी जब सत्ता का घमंड जनता के हक को निगल जाए

संविधान का अनुच्छेद 14 हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21 कहता है कि हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन का अधिकार है। लेकिन प्रशासनिक अधिकारी अपनी कलम से किसी की जिंदगी उलट देता है, उसके एक आदेश में किसी का घर, दुकान या हक छिन जाता है और अपील का रास्ता महीनों की देरी और सालों की फाइलों में दफ्न हो जाता है, तब ये अनुच्छेद सिर्फ किताबों में रह जाते हैं। लोक सेवक तब सेवक नहीं, लोक की नियति तय करने वाला शासक बन जाता है। किसी नागरिक ने प्रशासनिक भ्रष्टाचार या मनमानी के खिलाफ शिकायत की तो उसके पीछे पूरी तंत्र मशीनरी लग जाती है। उसके आवेदन की जांच नहीं, बल्कि उसके जीवन की जांच शुरू हो जाती है। उसकी फाइलें खंगाली जाती हैं, उसके खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं। लोकतंत्र में न्याय पाने का साहस करना अब अपराध बन चुका है। इस स्थिति में नागरिक के पास केवल एक रास्ता बचता है, धारा 156(3) सीआरपीसी अदालत में जाकर न्याय की याचना करना। सवाल यह है कि जब जनता को हर बार न्यायालय की शरण में जाना पड़े, तो फिर प्रशासन का क्या औचित्य रह जाता है।

लोकायुक्त, सतर्कता आयोग या औपचारिक मरहम

लोकायुक्त और सतर्कता आयोग जैसी संस्थाएं जनता के लिए बनी थीं। मगर वे भी धीरे-धीरे औपचारिकता का अड्डा बन गईं। हर शिकायत की फाइल ‘विचाराधीन’ या ‘समीक्षा में’ की मोहर लेकर ठंडी पड़ जाती है। कभी-कभी इन संस्थानों के प्रमुख भी उन्हीं सेवानिवृत्त अधिकारियों में से होते हैं। जिनकी कार्यशैली पर जनता सवाल उठा चुकी होती है। जनता को लगता है कि वह न्याय के दरवाज़े पर है, मगर असल में वह उसी दीवार से टकरा रही होती है, जो सत्ता ने अपने बचाव के लिए बनाई है।

लोक सेवक के खिलाफ एफआईआर जनता के लिए कानूनी मार्गदर्शन

जो नागरिक प्रशासनिक अधिकारी की मनमानी का शिकार हुआ है, वह भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 198 से 205 तक भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 7 और 13 और संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 के उल्लंघन के आधार पर एफआईआर दर्ज कराने का हक रखता है। शिकायत न सुने जाने पर वह सीआरपीसी की धारा 156(3) या 200 के तहत माननीय न्यायालय में आवेदन दे सकता है। साथ ही वह लोकायुक्त, सतर्कता आयोग, और मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज करा सकता है।

जब न्याय का तकाजा जनता के हाथों में हो

आज जरूरत है कि नागरिक ‘सेवक’ और ‘शासक’ में फर्क पहचानें। लोक सेवक की शक्ति जनता के भरोसे से आती है और जनता को ही उस भरोसे की निगरानी करनी होगी। हर जिले, हर तहसील, हर दफ्तर में जहां जनता अपमानित हो रही है, वहीं से लोकतंत्र की नई लड़ाई शुरू करनी होगी। यह लड़ाई किसी एक अधिकारी से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से है जो खुद को कानून से ऊपर समझती है। जब आवेदन में साक्ष्य जोड़कर शिकायत दर्ज होगी और अन्याय की खबर मीडिया और अदालत तक पहुंचेगी, तभी लोक सेवक शब्द का असली अर्थ लौटेगा।

लोक सेवक जनता का प्रतिनिधि, शासक नहीं

जो अफसर अपनी कलम को डराने का औजार बना लेते हैं, वे लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार करते हैं। जब अफसरशाही कानून से ऊपर चले, तो जनता का प्रतिरोध ही असली संविधान बन जाता है। वक्त आ गया है कि हर नागरिक अपने अधिकारों की किताब खोले,
और हर अन्याय के सामने कानून की भाषा में जवाब दे क्योंकि लोक सेवक को याद दिलाना जरूरी है कि जनता ही असली मालिक है।

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