
● डकैती डाल रहे प्राइवेट स्कूल पर चलेगा डंडा,
● स्कूलों की अधिक फीस वसूली पर सरकार कर देगी ठंडा
● स्कूल बने दुकानें, सरकार देगी हिसाब!
● फीस की लूट पर अब ‘फीस नियंत्रण’ का चाबुक
● मनमानी फीस वसूलने पर जाएगी मान्यता तो शिक्षा का व्यापार भी हिलेगा!
● फीस नहीं फंदा बने निजी स्कूल अब सरकार के शिकंजे में आएंगे शिक्षा व्यापारी!
● ट्यूशन, बिल्डिंग, एक्टिविटी चार्ज का खेल खत्म — हर पैसा देना होगा हिसाब!
● फीस बढ़ाने से पहले सरकार की मंजूरी अनिवार्य वरना बढ़ी रकम लौटानी होगी
● शिकायत पर खत्म होगी मान्यता लूट करने वाले स्कूलों की अब खैर नहीं
● अभिभावक को मिला शिक्षा न्याय का अधिकार ऑनलाइन शिकायत पर तीन महीने में फैसला
● पारदर्शिता का नया दौर हर स्कूल को वेबसाइट पर देना होगा पूरा शुल्क विवरण
● शिक्षा नहीं अब सेवा कानून कहता है ‘लाभ नहीं, जवाबदेही’ ही असली मकसद
● क्या सरकार वाकई तोड़ पाएगी प्राइवेट स्कूलों की साठगांठ और संरक्षण तंत्र?
◆ तुषार मौर्य
वाराणसी। शिक्षा के नाम पर लूट की दुकानदारी करने वाले निजी स्कूलों के सुनहरे दिन अब खत्म होने वाले हैं। वर्षों से ट्यूशन, बिल्डिंग, मेंटेनेंस, एक्टिविटी, यूनिफॉर्म और ट्रांसपोर्ट के नाम पर अभिभावकों की जेब काटने वाले प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर अब सरकार ने शिकंजा कस दिया है। सरकार ने दिल्ली स्कूल शिक्षा बिल 2025 को लागू कर दिया है, जो कहता है कि अब कोई भी स्कूल बिना सरकारी स्वीकृति के एक रुपया भी अतिरिक्त नहीं वसूल सकेगा। यदि किसी स्कूल की शिकायत मिलेगी तो मान्यता जाएगी, और भारी जुर्माना भी लगेगा। प्रश्न उठता है कि क्या सरकारें वाकई अभिभावकों की पीड़ा समझ रही हैं, या यह कदम सिर्फ चुनावी घोषणा के समान एक और दिखावा साबित होगा।
स्कूल नहीं कमाई केंद्र बन चुके थे शिक्षण संस्थान
बच्चे किताबों से कम और फीस स्लिप से ज्यादा डरने लगे थे। हर सत्र की शुरुआत में फीस लिस्ट देखकर अभिभावक का चेहरा उतर जाता था। ट्यूशन फीस के साथ बिल्डिंग डेवलपमेंट, स्मार्ट क्लास, एक्टिविटी और एनुअल फंड जैसे चार्ज जोड़कर हज़ारों रुपए की वसूली सामान्य हो गई थी। कोई स्कूल पहले से फीस बढ़ा देता था, कोई वार्षिक रखरखाव के नाम पर नोट छापता था।
किसी समिति से अनुमति नहीं, किसी विभाग से सलाह नहीं बस प्रबंधन का फरमान और अभिभावक मजबूर!
अब सरकार ने तय किया है कि स्कूल की मनमानी नहीं चलेगी, फीस बढ़ाने से पहले सरकारी स्वीकृति अनिवार्य होगी।
बिना मंजूरी नहीं बढ़ेगी फीस
नए कानून के तहत स्कूलों को फीस बढ़ोतरी का प्रस्ताव छह महीने पहले फीस नियामक समिति के पास भेजना होगा। समिति तीन महीने में फैसला करेगी। मंजूरी मिली तो बढ़ोतरी संभव, वरना पुरानी फीस ही लागू रहेगी।
यदि कोई स्कूल बिना अनुमति फीस बढ़ाता है, तो बढ़ी हुई राशि लौटानी होगी, साथ ही 10 लाख रुपए तक जुर्माना लगेगा। कानून यह भी कहता है कि हर स्कूल को फीस संरचना अपनी वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक करनी होगी। यानी अब फीस का हिसाब भी उतना ही पारदर्शी होना चाहिए जितना अकादमिक रिजल्ट!
कानून के दांत और नाखून
यह कानून केवल सलाह नहीं, बल्कि कड़ा आदेश है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी उल्लंघन पर 1 से 10 लाख रुपए तक का जुर्माना लगेगा। बार-बार उल्लंघन करने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है। शिक्षा निदेशक को न्यायिक अधिकार दिए गए हैं यानी वे सीधे दंडात्मक कार्रवाई कर सकते हैं। जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में समितियां बनाई जाएंगी जो हर स्कूल की फीस नीति की निगरानी करेंगी।
हर शुल्क का होगा खुला ब्यौरा
अब स्कूल ट्यूशन फीस, बिल्डिंग चार्ज, यूनिफॉर्म, एक्टिविटी चार्ज, ट्रांसपोर्ट फीस हर एक मद का खुला ब्यौरा देने के लिए बाध्य होंगे। यह विवरण स्कूल की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाएगा ताकि कोई छिपी हुई फीस न ली जा सके। अभिभावक आसानी से जांच सकें कि उनसे वसूले जा रहे पैसे वाजिब हैं या नहीं। अगर कोई स्कूल इस नियम की अनदेखी करता है, तो उसकी मान्यता खतरे में पड़ जाएगी।
शिकायत का अधिकार और त्वरित न्याय
पहली बार अभिभावकों को पूरी तरह शिकायत का अधिकार दिया गया है। अब कोई भी अभिभावक ऑनलाइन या ऑफलाइन माध्यम से फीस वृद्धि या गलत वसूली के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकेगा।
तीन महीने में निपटारा होगा, और दोषी पाए जाने पर स्कूल को दंड भुगतना पड़ेगा। यानी अब अभिभावक के पास भी शिक्षा न्यायालय की शक्ति होगी। दिल्ली में 1,700 निजी स्कूल इस कानून के दायरे में आ चुके हैं।
छत्तीसगढ़ में राज्य और जिला स्तर पर निगरानी समितियां बनी हैं, वहीं मध्य प्रदेश में छोटे स्कूलों को आंशिक राहत दी गई है। अब केंद्र सरकार इसे राष्ट्रीय ढांचे में ढालकर पूरे देश में लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यह कदम शिक्षा में राष्ट्रीय पारदर्शिता नीति की ओर संकेत करता है।
अभिभावकों को मिला पारदर्शिता का अधिकार
अब कोई स्कूल गुपचुप फीस नहीं बढ़ा सकेगा। हर नई फीस संरचना लिखित रूप में अभिभावकों को दी जाएगी। यदि किसी स्कूल ने नियमों का उल्लंघन किया, तो न केवल जुर्माना बल्कि मान्यता निलंबन भी तय है।
इससे शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही, पारदर्शिता और भरोसे का नया अध्याय शुरू हो सकता है।
शिक्षा सेवा बने, व्यवसाय नहीं
यह कानून सिर्फ फीस रोकने का नहीं, सोच बदलने का भी प्रयास है। सरकार चाहती है कि शिक्षा को कमाई का माध्यम नहीं बल्कि सेवा का साधन माना जाए। स्कूलों की जवाबदेही तय होगी, और शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन लौटेगा। अभिभावक अब खुद को असहाय नहीं, सशक्त महसूस करेंगे। लेकिन प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं…क्या वाकई सरकार इस कानून को सख्ती से लागू कर पाएगी। क्योंकि सच्चाई यह है कि ज्यादातर निजी स्कूल राजनीतिक या नौकरशाही संरक्षण में चलते हैं। फीस नियामक समितियां भी अक्सर उन्हीं अफसरों के इशारों पर काम करती हैं जिनके बच्चे इन्हीं स्कूलों में पढ़ते हैं। क्या सरकार सरकारी स्कूलों को इतना मजबूत बनाएगी कि अभिभावक को प्राइवेट स्कूल की मजबूरी ही न रहे। यदि नहीं तो यह कानून भी कागजों पर रह जाएगा, और शिक्षा का कारोबार जारी रहेगा। शिक्षा जब दुकान बन जाती है, तो नैतिकता काउंटर के नीचे रखी जाती है। सरकार चाहे कितने भी कानून बना ले, जब तक शिक्षा को समाज का उत्तरदायित्व नहीं माना जाएगा, तब तक बच्चे ग्राहक और शिक्षक सेल्समैन बने रहेंगे। फीस नियंत्रण कानून स्वागत योग्य कदम है, पर इसे लागू करने के लिए सरकार को इच्छाशक्ति और निष्पक्षता दोनों की जरूरत होगी। वरना, जैसा हर बार होता आया है फीस कम नहीं होगी, बस नियमों का बोर्ड बढ़ जाएगा!
* सरकार ने फीस नियंत्रण कानून को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की प्रक्रिया शुरू की।
* फीस बढ़ाने से पहले समिति की मंजूरी अनिवार्य बिना अनुमति बढ़ाई फीस वापस करनी होगी।
* शिकायत मिलने पर स्कूल की मान्यता होगी रद्द, 1 से 10 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान।
* शुल्क का खुला ब्यौरा देना अनिवार्य, वेबसाइट पर सार्वजनिक करना होगा।
* अभिभावक अब ऑनलाइन या ऑफलाइन शिकायत दर्ज कर सकेंगे तीन महीने में होगा निपटारा।
* दिल्ली, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में पहले से लागू, अब पूरे देश में लागू करने की तैयारी।
* पारदर्शिता, जवाबदेही और शिक्षा में सेवा भावना को बढ़ाने की कोशिश।



