देश-विदेश

दिल्ली धमाके पर सियासी घमासान, हर धमाके पर आरोपी बनते मुसलमान ?

आतंकवाद से ज्यादा बयानबाजी ने देश को बांटना शुरू किया

● दिल्ली धमाके पर सियासी घमासान, हर धमाके पर आरोपी बनते मुसलमान ?

● आतंकवाद से ज्यादा बयानबाजी ने देश को बांटना शुरू किया

● धमाका हुआ तो जांच से पहले मजहब पूछ लिया मोहम्मद नाम सुनते ही नैरेटिव तैयार

● टोपी, दाढ़ी, बुर्का पहचान नहीं, शक का प्रतीक बनी, मीडिया और सत्ता ने ‘संदेह का माहौल’ बनाया!

● गिरिराज का पुराना राग-हर बार वही बयान, वही ज़हर हर आतंकी मुसलमान क्यों

● हेमंत विस्वा का बयान कि पढ़े-लिखे लोग ज़्यादा खतरनाक, लोकतंत्र के गाल पर तमाचा

● एनआईए की रिपोर्ट आने से पहले ही ‘गद्दारों की पहचान’ का ऐलान

● दो लोगों की गलती से पूरा विश्वविद्यालय कठघरे में,
मीडिया ट्रायल ने सैकड़ों छात्रों का भविष्य संदेह में

● पहलगाम से दिल्ली तक एक ही पैटर्न धर्म पूछो, मारो, और फिर बहस छेड़ दो

● विभाजन की साजिश अब बंदूक से नहीं, भाषणों से चल रही

● ‘वंदे मातरम्’ न गाने वाला गद्दार, आलोचक देशद्रोही यही नया राष्ट्रवाद

◆ अंशिका मौर्या

वाराणसी। 10 नवंबर 2025 को दिल्ली की नॉर्थ एवेन्यू मार्केट में हुए बम धमाके ने देश को एक बार फिर दहशत और शक के अंधेरे में धकेल दिया है। लगभग निर्दोष लोगों की मौत और दर्जनों के घायल होने से पहले ही जो सवाल उठ खड़ा हुआ, वह यह नहीं था कि विस्फोटक कहां से आए या सुरक्षा एजेंसियों की चूक कहां हुई बल्कि यह कि आरोपी कौन-से मजहब का था। यही सवाल सबसे बड़ा सबूत है कि भारत में आतंकवाद का मुकाबला सुरक्षा से नहीं, बल्कि संप्रदाय से किया जा रहा है। यह खेल केवल गोलियों और बमों का नहीं, बल्कि सोच और जहर का है, जो धीरे-धीरे हमारी सामाजिक नसों में उतरता जा रहा है।

आतंक से ज्यादा ‘नाम’ पर हल्ला

दिल्ली धमाके की जांच एनआईए और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही है। प्रारंभिक रिपोर्टों में बताया गया कि धमाके में इस्तेमाल आईईडी उच्च तीव्रता वाला था, जिससे आसपास की कई दुकानों के शटर उड़ गए। लेकिन जैसे ही एक संदिग्ध का नाम डॉ. मोहम्मद उमर सामने आया, पूरा विमर्श सुरक्षा से हटकर धर्म की ओर मुड़ गया। टीवी डिबेट्स में ‘मोहम्मद’ नाम को केंद्र बनाकर सवाल उठे हर आतंकी मुसलमान क्यों। यह वही पुराना नैरेटिव है, जो हर बार किसी विस्फोट या हिंसा के बाद राजनीतिक लाभ के लिए दोहराया जाता है।

डर और संदेह का सुनियोजित माहौल

दिल्ली धमाके के बाद देशभर में जगह-जगह संदेह के घेरे तैयार कर दिए गए हैं। दाढ़ी, टोपी, बुर्का ये अब धार्मिक प्रतीक नहीं, शक के निशान बन चुके हैं। कोरोना काल में एक अंग्रेजी दैनिक ने जब वायरस को जालीदार टोपी और कुर्ते में दिखाया था, तो पूरा दृश्य मानो इस देश की गहराती मानसिक बीमारी का आइना था।
आतंकवाद केवल गोलियों से नहीं, बल्कि अफवाहों और पूर्वाग्रहों से भी फैलता है और यही अब देश में सबसे बड़ा आतंक है।

गिरिराज का पुराना राग आतंक का मजहब तय कर लो!

फरीदाबाद में विस्फोटक बरामदगी के बाद भाजपा सांसद गिरिराज सिंह ने बयान दिया कि जो कहते हैं आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, उनसे पूछता हूं कि जितने आतंकी पकड़े गए, सब मुसलमान क्यों हैं। उनका यह बयान जांच से पहले ही ‘फैसला’ सुना देता है। महबूबा मुफ्ती ने इसका करारा जवाब दिया कि गांधीजी को किसने मारा, इंदिरा जी, राजीव जी को किसने मारा। यह सवाल गिरिराज सिंह की सोच को नंगा कर देता है, क्योंकि हत्यारा मजहब नहीं, विचार होता है और आतंक वही है जो इंसानियत के खिलाफ हो। परंतु सत्ताधारी वर्ग को इन सवालों से मतलब नहीं उन्हें बस एक ऐसा मुद्दा चाहिए जो चुनाव से पहले वोटबैंक में आग लगा सके।

हिमंता का ‘शिक्षित आतंक’ वाला बयान समाज को मध्ययुग में धकेलने की कोशिश

असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने दिल्ली धमाके के बाद कहा कि शिक्षा उन्हें और खतरनाक बना देती है। डॉक्टर बनना उन्हें और भी खतरनाक बनाता है। यह बयान लोकतांत्रिक नहीं, मध्ययुगीन सोच की गवाही है।
अगर शिक्षा खतरनाक बनाती है, तो फिर आरएसएस के डॉक्टरों की फौज मोहन भागवत, प्रवीण तोगड़िया, माया कोडनानी क्या ‘सुरक्षा के प्रतीक’ हैं। हिमंता का तर्क न केवल हास्यास्पद है, बल्कि वह भारत की बौद्धिक परंपरा पर हमला है। किसी धर्म के नाम पर पूरी शिक्षित बिरादरी को ‘संदेह’ के घेरे में रखना लोकतंत्र का अपमान है। दिल्ली धमाके की जांच अभी शुरुआती चरण में है, पर भाजपा नेताओं के बयान पहले से तय कर चुके हैं कि आरोपी कौन है, दोषी कौन है, और मंशा क्या है। हेमंत, गिरिराज व किरण बेदी तक ने जांच से पहले फैसला सुना दिया कि इन गद्दारों की पहचान करनी होगी। कौन गद्दार कैसे तय होगा, क्या शिक्षा, दाढ़ी, या मजहब से किसी की देशभक्ति तय होगी। ऐसी बयानबाजी न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए जहरीली है

विश्वविद्यालय पर संदेह की छाया

हमले के बाद अल-फलाह विश्वविद्यालय का नाम आते ही सारा फोकस शिक्षण संस्थान पर जा टिका। मुख्य आरोपी डॉ.उमर और एक अन्य डॉक्टर का संबंध विश्वविद्यालय से बताया गया। विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ.भूपिंदर कौर आनंद ने कहा कि इन व्यक्तियों का विश्वविद्यालय से केवल व्यावसायिक संबंध था। संस्थान का इनकी निजी गतिविधियों से कोई संबंध नहीं। लेकिन मीडिया ट्रायल ने पहले ही फैसला सुना दिया था। इससे न सिर्फ विश्वविद्यालय की साख को नुकसान हुआ, बल्कि वहाँ पढ़ने वाले हजारों छात्रों पर भी ‘संदेह की परछाईं’ डाल दी गई।

आतंकवाद का असली चेहरा जब धर्म पूछकर मारा जाता

पहलगाम हमले में आतंकियों ने लोगों से धर्म पूछकर मारा था। यह बताता है कि आतंकवाद का लक्ष्य केवल हत्या नहीं, फूट डालना है। आज वही काम बयानवीर नेता कर रहे हैं। वे हर घटना को इस तरह पेश करते हैं कि देश का आम नागरिक सोचने लगे क्या मेरा पड़ोसी दुश्मन है। यह वही मनोवैज्ञानिक युद्ध है, जिसकी सफलता का मतलब है भारत का विभाजन, बिना किसी बम के।

राष्ट्रवाद के नाम पर जहर का व्यापार

आज के ‘राष्ट्रवाद’ का अर्थ देशभक्ति नहीं, दूसरे पर शक बन गया है। जो ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाता, वह गद्दार जो आलोचना करता है, वह देशद्रोही। यह मानसिकता वही है, जो जनता को सोचने से रोकती है। जांच एजेंसियां अब दबाव में हैं उन्हें सिर्फ दोषी नहीं, सुविधाजनक दोषी ढूंढना पड़ता है। मीडिया की भूमिका भी ‘मंच’ से ‘मुकदमे’ तक सीमित हो चुकी है। ऐसे में आतंकवादियों को क्या जरूरत है कि वे नई साजिश रचे जब सियासत खुद उनकी साजिश को जिंदा रखे हुए है।

* दिल्ली धमाके की जांच से पहले ही धार्मिक फैसला सुना दिया गया क्या यही नया न्याय है?
* आतंकवाद को मज़हब से जोड़ना, असली आतंकियों को बचाने की सबसे पुरानी रणनीति है।
* हेमंत बिस्वा सरमा और गिरिराज सिंह जैसे नेता आतंक से नहीं, वोट से लड़ रहे हैं।
* अल-फलाह विश्वविद्यालय को ‘संदेह का केंद्र’ बनाना शिक्षा पर हमला है।
* राजनीति ने सुरक्षा से बड़ा मुद्दा ‘शक’ बना दिया है यह लोकतंत्र का सबसे खतरनाक मोड़ है।
* आतंकवाद का कोई धर्म नहीं, लेकिन राजनीति ने उसे धर्म की कवच दे दी है।
* अगर हर घटना के बाद हम ‘कौन था’ पूछेंगे, ‘क्यों हुआ’ नहीं, तो अगला धमाका केवल समय की बात है।
* देश को आतंक से नहीं, ‘बयानबाज़ी के आतंक’ से बचाने की ज़रूरत है।

दिल्ली धमाका केवल एक घटना नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता का आइना है जहां बम से ज्यादा जहरीला है हमारे नेताओं का बयान। जब हर हादसे के बाद सबसे पहले धर्म पूछा जाने लगे, तब समझ लीजिए कि आतंकवाद ने अपने मकसद में कामयाबी पा ली है।
अब जरूरत इस बात की है कि देश ‘धर्म पूछने’ से पहले ‘सिस्टम से जवाब’ मांगे। क्योंकि अगर हर बार डर और शक की दीवार खड़ी की जाती रही, तो एक दिन यह दीवार देश को ही निगल जाएगी।

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