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अग्रिम जमानत कानून का औजार, अमीर खुशहाल गरीब लाचार

फरार आरोपी और अदालत की मेहरबानी न्याय या माखौल, अग्रिम जमानत की जुगलबंदी ने फरारी को बना दिया अधिकार!

● अग्रिम जमानत कानून का औजार, अमीर खुशहाल गरीब लाचार

● फरार आरोपी और अदालत की मेहरबानी न्याय या माखौल

● अग्रिम जमानत की जुगलबंदी ने फरारी को बना दिया अधिकार!

● जज का विवेक या व्यवस्था की विवशता न्याय के तराजू में असमानता का बोझ!

● एक ही अपराध में दो अदालतों के दो अलग फैसले दोनों सही यह कैसा न्यायिक!

● महंगे वकील, ऊंची फीस न्याय की कीमत तय करती जेब की गहराई!

● कानूनी सुरक्षा अब राजनीतिक हथियार अदालतें भी ताकत के साए में!

● फरारी का स्वर्णकाल रायपुर के अरबपति सूदखोरों की कहानी ने खोला सच!

● न्याय अब वर्ग आधारित हो चुका, अदालतें असमानता की प्रतीक बनती जा रही

● न्याय का पलड़ा धन और ताकत से झुकेगा, तो जनता अदालतों में नहीं, सड़कों पर इंसाफ ढूंढेगी

 

सुनील कुमार

 

भारत की अदालतें लोकतंत्र की अंतिम उम्मीद कही जाती हैं। वह चौथा और अंतिम दरवाजा जहां आम नागरिक अपनी आस्था रखता है, जब पुलिस, प्रशासन और राजनीति सब विफल हो जाएं। लेकिन अब वही अदालतें जब फरार अपराधियों को भी ‘अग्रिम जमानत’ का वरदान दे देती हैं, तब न्याय व्यवस्था की जड़ें हिल जाती हैं। यह सवाल केवल कानून का नहीं, लोकतंत्र की आत्मा का है। कानून कहता है सभी नागरिक समान हैं। परन्तु अदालतों की चौखट पर यह समानता सबसे पहले दम तोड़ देती है। कोई गरीब बेगुनाही की भीख मांगता है और जेल की कोठरी में सड़ जाता है, जबकि कोई रसूखदार, महीनों फरारी काटने के बाद अदालत पहुंचकर, अग्रिम जमानत की याचना करता है और न्यायपालिका उसे राहत दे देती है। क्या यही है वह न्याय जो संविधान ने वादा किया था? अब जमानत ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि ‘सुविधा’ बन चुकी है जो केवल उन्हीं को मिलती है जिनके पास महंगे वकील, राजनीतिक रसूख और मीडिया मैनेजमेंट की फौज है। आज अदालतों के विवेकाधिकार और कानून के लचीलेपन ने न्याय को वर्ग आधारित बना दिया है। फरारी अब अपराध नहीं, रणनीति बन चुकी है। अग्रिम जमानत अब मासूम की सुरक्षा नहीं, बल्कि ताकतवर की ढाल बन गई है। अदालतें अपने आदेशों में निष्पक्षता की बात करती हैं, मगर फैसलों की दिशा अक्सर बताती है न्याय का पलड़ा जेब की गहराई से झुकता है। जब पुलिस अपराधी के सिर पर इनाम घोषित करती है और वही अपराधी अदालत में दस्तक देकर जमानत पाता है, तो यह लोकतंत्र की सबसे खतरनाक तस्वीर है। न्याय का यह खेल जनता के भरोसे पर ऐसा प्रहार करता है जिसे केवल कानून से नहीं, साहस से ही ठीक किया जा सकता है।

न्याय फरारी और अग्रिम जमानत की जुगलबंदी

देश के तमाम चर्चित आपराधिक मामलों में देखा गया है कि जब आरोपी ताकतवर, रसूखदार या पैसे वाले होते हैं, तो पुलिस की पकड़ से महीनों फरार रहने के बावजूद वे अदालतों के दरवाजे पर अग्रिम जमानत की दस्तक देते हैं। अदालतें सुनवाई करती हैं, और राहत भी देती हैं। मानो फरारी कोई अपराध नहीं, बल्कि ‘रणनीतिक अधिकार’ हो। यह सिलसिला ऐसा लगता है जैसे गिरफ्तारी से पहले ही ‘सुरक्षा कवच’ खरीद लेने का तरीका बन गया हो।

जज का विवेक या व्यवस्था की विवशता

भारत के कानून में जमानत या अग्रिम जमानत को लेकर अदालतों को व्यापक विवेकाधिकार दिए गए हैं। लेकिन यही विवेकाधिकार आज न्यायिक असमानता का चेहरा बन गया है। एक ही किस्म के मामलों में एक अदालत जमानत दे देती है, दूसरी नहीं। दोनों फैसले कानूनी रूप से सही माने जाते हैं। ऊपरी अदालतें भी प्रायः निचली अदालत के निर्णयों पर टिप्पणी नहीं करतीं। यह लचीलापन, जो कभी लोकतांत्रिक गरिमा का प्रतीक था, अब अमीर के पक्ष में झुकता न्याय बन चुका है।

न्याय बिकता नहीं तो बिखरता क्यों

हर अदालत का फैसला उस वकील की क्षमता, तैयारी और फीस पर निर्भर करता है जो वहां खड़ा है।
यह कड़वी सच्चाई है कि न्याय की पहुंच सीधे-सीधे मुवक्किल की जेब से तय होती है। गरीब के पास न तो महंगे वकील करने की क्षमता है, न लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की ताकत। जांच एजेंसियों की उदासीनता और राजनीतिक दबाव के बीच, ताकतवर की फाइल आगे बढ़ती हैं और गरीब की सुनवाई टलती जाती है।

जमानत जब कानूनी सुरक्षा से राजनीतिक हथियार बन जाए

कई बार ऐसे आरोपी जो राजनीतिक या आर्थिक ताकत रखते हैं, वे जांच एजेंसियों को खुलेआम चुनौती देते हैं।
पुलिस उनकी गिरफ्तारी पर इनाम घोषित कर देती है, लेकिन अदालतों में उनके वकील अग्रिम जमानत की अर्जियां दायर करते हैं। यह सिलसिला पुलिस को मजाक का पात्र बना देता है। जांच एजेंसी अपराधी को ढूंढती है, अदालत उसे बचाती है। क्या यही न्याय की विडंबना है।

फरारी के बाद भी अदालत का दरवाजा क्यों खुला

अगर कोई व्यक्ति महीनों से फरार है, तो अदालतों को क्या उसका आवेदन सुनना चाहिए। क्या अग्रिम जमानत केवल उस व्यक्ति के लिए है जिसे गिरफ्तारी का डर है, या उसके लिए भी जो खुद को कानून से ऊपर समझता है। जब पुलिस सार्वजनिक रूप से किसी के सिर पर इनाम घोषित कर दे, तब अदालत को यह स्पष्ट रुख लेना चाहिए पहले आत्मसमर्पण करो, फिर जमानत की दलील दो।।लेकिन अक्सर देखा जाता है कि दिव्य शक्ति की तरह वही आरोपी अचानक अदालत में प्रकट होता है, जमानत का कागज़ लहराता है और पुलिस को मुंह चिढ़ाता है।

छत्तीसगढ़ का ताजा उदाहरण फरारी का ‘स्वर्णकाल’

राजधानी रायपुर के दो अरबपति सूदखोर भाई पांच महीने से फरार हैं। सोने से लदे इन मवाली कारोबारियों पर पुलिस ने ईनाम घोषित किया है, लेकिन वे अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। उनके वकील लगातार अग्रिम जमानत की अर्जियां दाखिल कर रहे हैं। प्रश्न यह है कि क्या पांच महीने से फरार व्यक्ति की जमानत याचिका पर अदालत को सुनवाई करनी चाहिए। कानून की इस विडंबना ने आम जनता के विश्वास को बुरी तरह तोड़ा है।

अमीर के लिए कवच, गरीब के लिए हथकड़ी

भारत के लोकतंत्र में आज न्याय की पहुंच में सबसे बड़ा अंतर आर्थिक हैसियत का हथियार है। ताकतवर को अग्रिम जमानत मिल जाती है गरीब को थाने से लेकर जेल तक ठोकरें मिलती हैं। पुलिस की विवेकहीन कार्रवाई, एजेंसियों की ढिलाई और अदालतों की संवेदनहीनता मिलकर न्याय को वर्ग आधारित बना चुकी हैं। यह लकीर अब इतनी गहरी हो चुकी है कि कटघरे में अमीर कुर्सी पर बैठता है, गरीब घुटनों पर।

अदालतों को आत्ममंथन की जरूरत, लोकतंत्र को चाहिए साहस

अगर भारत को वास्तव में लोकतांत्रिक देश बने रहना है, तो उसे न्याय की समान पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। अदालतों को अपने विवेक का इस्तेमाल कमजोर की रक्षा में करना चाहिए, न कि ताकतवर की सुविधा में।
कानून का लचीलापन केवल उन लोगों के लिए नहीं होना चाहिए जिनके पास महंगे वकील और मीडिया मैनेजमेंट की फौज हो। लोकतंत्र अदालत से बड़ा है उसे ऐसे रास्ते निकालने होंगे जिनसे अदालतों में न्याय की संभावना बढ़े, न कि न्याय की नीलामी। अग्रिम जमानत का उद्देश्य कभी निर्दोष को सुरक्षा देना था, पर अब यह अपराधियों का कवच बन गया है। जो लोग फरार हैं, जो महीनों से कानून की आंखों में धूल झोंक रहे हैं, उन्हें अदालत की दया क्यों मिले। अगर यही व्यवस्था चलती रही, तो जनता अदालत में नहीं, ‘अदालत के बाहर’ इंसाफ ढूंढेगी और यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा।

* अग्रिम जमानत का दुरुपयोग अब ताकतवरों का हथियार बन चुका है।
* पुलिस के ईनाम को धता बताते हुए फरार आरोपी अदालतों से अग्रिम जमानत पा जाते हैं।
* कानून का विवेकाधिकार असमानता को जन्म दे रहा है अमीर को राहत, गरीब को गिरफ्तारी।
* महंगे वकीलों की फौज न्याय की दिशा तय कर रही है, न्याय का नहीं।
* अदालतें चाहें तो फरार अभियुक्तों की सुनवाई से पहले आत्मसमर्पण को अनिवार्य कर सकती है।
* न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव और वर्ग आधारित व्यवहार साफ झलकता है।
* आम जनता का भरोसा तभी बचेगा जब अदालतें गरीब और ताकतवर के बीच की दीवार ढहाएंगी।
* न्याय का पलड़ा लोकतंत्र से नहीं, धन और ताकत से झुकता है।

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