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बिहार चुनाव: मोदी व नीतीश की चली आंधी, हवा में उड़ गए तेजस्वी व राहुल गाँधी

बैलट नहीं, ‘जादू-टोटका’ जीता बिहार चुनाव में तंत्र-मंत्र का कमाल

●  बिहार चुनाव: मोदी व नीतीश की चली आंधी, हवा में उड़ गए तेजस्वी व राहुल गाँधी

●  बैलट नहीं, ‘जादू-टोटका’ जीता बिहार चुनाव में तंत्र-मंत्र का कमाल

●  जनता ने कहा हम जागरूक नहीं, सिर्फ चकित हैं, जागने की मोहलत बाद में

●  नीतीश बाबू की कुर्सी अब भाजपा के किराए पर मेंटेनेंस चार्ज बाद में मिलेगा।

●  तेजस्वी यादव का सूरज उगा ही था कि परिणाम आयोग ने स्विच ऑफ कर दिया

●  राहुल की सभाएं भीड़ से भरीं, ईवीएम बोली माफ करना, मैं पहले से बुक हूं

●  भाजपा ने वोट चुराया नहीं, बस उठा लिया जमीन पर ही था पड़ा

●  जनादेश बेचने वाली नई पीढ़ी अब ‘थोक में लोकतंत्र’ खरीदा जाता

●  भारत का लोकतंत्र आईसीयू में पर मशीनें भाजपा की नर्स आयोग

पँचशील अमित मौर्य

 

वाराणसी/लखनऊ बिहार में जो हुआ, वह अप्रत्याशित नहीं बल्कि अत्यंत व्यवस्थित चमत्कार था। किसी भी लोकतंत्र में जब जनता, सरकार और विपक्ष तीनों एक साथ भ्रमित हों, तो समझ लीजिए कि खेल नहीं, खेला हुआ है और यह खेला इतना महीन था कि विपक्ष को पसीना आया, जनता को बुखार चढ़ा और लोकतंत्र को आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। नतीजे आए तो बिहार ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यहां चुनाव परिणाम जनता नहीं, तकनीक, तंत्र और तांत्रिक प्रबंधन तय करते हैं। तेजस्वी यादव का उगता सूरज परिणाम आते-आते ऐसा डूबा कि लोग सोचने लगे कि कहीं आयोग ने सांझ का टाइम एक घंटे पहले तो नहीं कर दिया। राहुल गांधी की सभाओं में उमड़ी भीड़ देखकर हर राजनीतिक विश्लेषक चकित था और भाजपा चकित नहीं संतुष्ट थी। क्योंकि भीड़ चाहे राहुल की रैली में जाए, वोट तो वहीं जाएगा जहां पहले से आरक्षण है। देश के लोग कहते हैं लोकतंत्र खतरे में है। बिहार के नतीजे बताते हैं नहीं साहब, लोकतंत्र खतरे में नहीं, किडनैप हो चुका है। और अपराधी ने फिरौती भी नहीं मांगी। बस कहा कि जनादेश हमारी कस्टडी में रहेगा, आप अपने काम से काम रखें। कभी कहा जाता था कि भारतीय मतदाता बहुत बुद्धिमान होता है, अब कहा जा रहा है बहुत उदार है। जो चाहे उसे वोट दे देता है, चाहे परिणाम पलट कर किसी और की जेब में चला जाए। भारतीय लोकतंत्र का यह नया अपग्रेडेड संस्करण है जिसमें जनता मतदान करती है, लेकिन नतीजे प्रबंधन तय करता है। बिहार ने यह भी बता दिया कि राजनीति अब ‘नीति-धर्म’ की चीज नहीं, टपोरी काल में प्रवेश कर चुकी है। यहां जीतने के लिए न विचार चाहिए, न विरासत, बस थोड़ा जुगाड़, थोड़ा प्रबंधन, और थोड़ी सी अलौकिक कला यही सफलता का नया मंत्र है। अब सवाल यह नहीं कि बिहार में कौन जीता। सवाल यह है कि देश ने क्या खोया। जनादेश जनता का था, पर डिलीवरी एड्रेस किसी और का।

बिहार का अप्रत्याशित नहीं, अच्छी तरह व्यवस्थित चमत्कार

बिहार ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा तमाशा नहीं, सबसे बड़ा मैनेजमेंट प्लान है। यह चुनाव परिणाम देखकर लग रहा था कि जनता ने वोट दिया नहीं, बल्कि वोटिंग का ट्रेलर देखा। असली फिल्म तो कहीं और चल रही थी। जिसमें कलाकार बदलते रहे, निर्देशक वही रहा, और स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी। तेजस्वी यादव की रैलियां देखिए लाखों की भीड़, ढोल-नगाड़े, नारे, उत्साह, उम्मीद… और फिर नतीजे आते ही वही भीड़ घर लौटकर चाय बनाने लगी। तेजस्वी को देखते हुए लग रहा था कि युवाओं की राजनीति का नया पन्ना खुलने वाला है। लेकिन बिहार परिणाम विभाग ने पन्ना खोलने ही नहीं दिया सीधे किताब बदल दी। तेजस्वी का भाग्य सूर्य उगता-उगता डूब गया, जैसे सुबह होते-होते बिजली विभाग ने लाइट काट दी हो। राहुल गांधी की रैलियों की बात करें तो दृश्य अत्यंत मनोरम था। लोग उमड़ रहे थे, नारे लग रहे थे, भीड़ दीवानी थी। लेकिन नतीजे ईवीएम बोली आपकी भीड़ को हमने नोट किया है, लेकिन आपका वोट पहले से प्रोसेस्ड है। राहुल गांधी की मेहनत पर पानी नहीं, पूरा हाइड्रो-पावर प्रोजेक्ट बह गया। भीड़ को देखकर लग रहा था कि हवा बदल रही है, लेकिन नतीजे देखकर पता चला कि हवा तो पहले ही किसी के एयर कंडीशनर में कैद हो चुकी है।

नितीश कुमार का नाम आधार पर दर्ज

नीतीश कुमार की कहानी तो और भी मजेदार है। वे इतने वर्षों से मुख्यमंत्री हैं कि अब बिहार की कुर्सी पर उनका नाम नहीं, उनका आधार नंबर दर्ज हो गया है। भाजपा ने उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनाने में सहयोग दिया या यह कहें कि उन्हें समर्थन की रस्सी से बांधकर सत्ता में बैठाया। इस चुनाव में जदयू को जो मिला, वह नीतीश बाबू का निजी स्कोर था। भाजपा की भूमिका ऐसी थी जैसे शादी में दूल्हा कोई और हो, नाच किसी और का हो, और गाना डीजे किसी तीसरे के मन से बजा दे। भाजपा की जीत का श्रेय किसको दिया जाए जनता को, हवा को नहीं यह श्रेय सिर्फ और सिर्फ चुनावी प्रबंधन मंत्रालय को जाता है। भाजपा ने यह साबित कर दिया कि वोट चुराना कोई अपराध नहीं यह एक दक्षता कौशल है, जैसे टाइपिंग स्पीड या एक्सेल शीट बनाना। बस फर्क इतना है कि यहां गलती की कोई जगह नहीं होती, क्योंकि गलती हुई तो लोकतंत्र जाग सकता है। यह जोखिम भाजपा कभी लेती नहीं। बिहार के मतदाताओं की समझदारी का नया संस्करण जारी हो गया है थोक में बिकने को तत्पर जनता 2.0। अब सिर्फ 500-1000 में काम नहीं चलता, मतदाता भी अपग्रेड हो गया है। महिला वोट के लिए 10,000 का पैकेज उपलब्ध है। चुनावी बाजार में स्वतंत्रता दिवस सेल चल रही है-एक वोट दो, एक भ्रम फ्री पाओ। बिहार के नतीजों ने यह भी सिखाया कि जनादेश जनता का नहीं उसका है जिसने उसे पहले पकड़ लिया। जनता वोट डालकर सोचती रह जाती है कि उसने इतिहास रचा है। प्रबंधन विभाग परिणाम लिखकर कहता है इतिहास नहीं, हिसाब लिख रहे हैं, और यह हिसाब हमेशा वहीं जाता है जहां पहले से लिंक्ड अकाउंट बना होता है।

मोशा की मशीन लोकतंत्र का सॉफ्टवेयर अपडेट कर दिया गया

भारत की राजनीति में अब लहर नहीं चलती लॉन्च होता है नया सॉफ्टवेयर और इसका नाम है मोशा ओएस 3.0 : अब कोई चुनाव अप्रत्याशित नहीं। मोदी + शाह = मोशा। ये दोनों मिलकर भारतीय लोकतंत्र को ऐसा अपडेट देते हैं कि जनता समझ ही नहीं पाती कि चुनाव कब शुरू हुआ, कब खत्म हुआ, और कब परिणाम उसके सिर पर रख दिया गया।

भाजपा अब पार्टी नहीं एक चुनावी मशीन

मोशा की जोड़ी ने राजनीति में यह सिद्ध कर दिया है कि विचारधारा, विजन, जनता-जनार्दन, विकास ये सब केवल विपक्ष के लिये मौजूद शब्द हैं। भाजपा के लिए अब बस एक ही मंत्र है चुनाव जीतना है कैसे भी हो जीतना है। कहा जाता है कि चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव होता है। मोशा का कहना है कि चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव नहीं, हमारा वर्कशॉप डे है।
जहां इवीएम को पॉलिश किया जाता है, बूथ मैनेजमेंट को ऑयलिंग दी जाती है और परिणाम विभाग को एक्सेल शीट के नए फार्मूले सिखाए जाते हैं।

धर्म, राष्ट्रवाद और डर मोशा मशीन की 3 बैटरी

आज भारतीय राजनीति में सबसे स्टेबल सप्लाई अगर कुछ है, तो वह है धर्म + राष्ट्रवाद + डर। इन तीन बैटरियों से भाजपा की पूरी मशीन चलती है। अगर जनता महंगाई पर बोलने लगे, तो बैटरी-1 ऑन
हिंदू खतरे में है। अगर बेरोजगारी पर सवाल उठे, बैटरी-2 ऑन देश खतरे में है। अगर इनसे भी काम न चले, तो बैटरी-3 ऑन विपक्ष पाकिस्तान का एजेंट है।
मजा यह कि जनता इन बैटरियों को रिचार्ज भी खुद करती है।

राजनीति का नया युग टपोरी काल

मोशा की मशीन राजनीति को मर्यादा, नीति, आदर्श, संघर्ष सबसे मुक्त कर चुकी है। भारत की राजनीति अब टपोरी काल में प्रवेश कर चुकी है।
यहां करिश्मा नहीं चलता कैलकुलेशन चलता है। यहां भाषण की नहीं भ्रम की राजनीति चलती है। यहां नेता की लोकप्रियता मायने नहीं रखती। उसके पीछे चलने वाली आईटी सेल की स्पीड मायने रखती है। राहुल गांधी दस रैलियां करें, तेजस्वी पांच लाख की भीड़ जुटा लें और जनता जितनी चाहे उत्तेजना दिखाए आखिर में जीत उन डाटा शीटों की होती है, जो चुनाव की रात चुपचाप भर दी जाती हैं।

मोशा की चुनावी शैली एकदम ‘क्लीनिकल ऑपरेशन’

भाजपा चुनाव लड़ती नहीं ऑपरेशन करती है। विपक्ष जब तक प्रचार करता है, मोदी-शाह उस प्रचार में से 70 फीसदी वोट वैक्यूम क्लीनर की तरह पहले ही खींच लेते हैं। शेष बचे वोटों को ईवीएम-प्रबंधन, बूथ कैप्टन, माइक्रो-मैनेजमेंट और आईटी सेल का डिजिटल झाड़ू संभाल लेता है। विपक्ष सोचता रह जाता है कि जनता उसके साथ है। मोशा कहता है कि रहने दो भाई, जनता तो किसी की नहीं, रिजल्ट हमारा है।

ममता बनर्जी : अगला टारगेट लॉक्ड

बिहार में प्रबंधन का मास्टर क्लास देने के बाद मोशा की जोड़ी अब बंगाल की तरफ मुखातिब है। ममता चाहे कितनी भी कड़ी हों, कितना भी जनाधार हो। मोदी-शाह के लिए यह कोई मुद्दा नहीं, उनका फॉर्मूला है पहले भ्रम फैलाओ, फिर भ्रांतियां बनाओ, अंत में परिणाम संभालो। बंगाल के लिए भाजपा की रणनीति साफ है चाय, जय श्रीराम, और भय यही तीन हथियार हैं। बाकी का काम मैनेजमेंट संभाल लेगा।

मोशा का संदेश लोकतंत्र को

मोशा ने लोकतंत्र को बता दिया है कि तुम संस्था हो, हम उद्योग। तुम नियम हो, हम व्यवस्था। यह व्यवस्था इतनी ताकतवर हो चुकी है कि दस राहुल गांधी भी मिलकर इसका कुछ नहीं कर सकते। मोशा की मशीन लोकतंत्र नहीं चलाती वो लोकतंत्र को चलवाती है, और जब तक यह मशीन सक्रिय है, चुनाव में अप्रत्याशित कुछ नहीं होगा। बस वही होगा जो पहले से तय है, स्क्रिप्टेड है, और एक्सेल शीट में सेव है।

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