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अखलाक के हत्यारों को योगी का अभयदान, मुख्यमंत्री माबलिंचिंग को बढ़ावा दे रहे श्रीमान

भीड़-हत्या के डेढ़ दर्जन आरोपी बेकसूर निकले?

● अखलाक के हत्यारों को योगी का अभयदान, मुख्यमंत्री माबलिंचिंग को बढ़ावा दे रहे श्रीमान

● भीड़-हत्या के डेढ़ दर्जन आरोपी बेकसूर निकले?

● गाय बची, इंसान गया, और अब न्याय भी मालगाड़ी में चढ़कर रवाना!

● गाय की राजनीति ने इंसान को निगला अब न्याय को निगलने की बारी

● भीड़-हिंसा में मरने वाले का नाम अखलाक, बचने वाले का नाम ‘सरकारी संरक्षण’

● लिंचिंग नहीं, मानो कोई धार्मिक त्योहार हो

● न्यायपालिका जागे या न जागे, ‘गौरक्षा’ गैंग बेखौफ जाग चुका

● बिल्किस के बलात्कारी लौटे थे हीरो बनकर, अब अखलाक के हत्यारे आयेंगे ‘समाजसेवी’ बनकर?

● संविधान कहता कुछ, शासन करता कुछ और भीड़ का मन कहता मारो हम तो बच ही जायेंगे

● अखलाक की कब्र को 10 साल हुए पर नफरत की प्रयोगशाला हुई ताजा

● यूपी में कानून नहीं, ‘लाउडस्पीकर’ चलता है और वही हत्या का आदेशपत्र भी

 

सुनील कुमार

 

भारत की लोकतांत्रिक यात्रा अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां न्याय की परिभाषा बदल गई है, अपराध का स्वरूप बदल गया है और सरकार का चरित्र खुला पड़ गया है। अब यह देश वह नहीं रहा जहां अपराधी अदालत में अपराध सिद्ध होने से डरते थे। अब वे इस बात से निश्चिंत रहते हैं कि अगर भीड़ उनके साथ है, तो सरकार भी उनके साथ खड़ी मिल जाएगी। आज भारत में गाय का शक इंसान की जान से बड़ा सबूत है।

आपने हत्या की चलता है। आपने घर से निकालकर किसी को पीट-पीटकर मार दिया। भूल चूक लेनी देनी माफ। आपने लाउडस्पीकर पर हत्या के लिए भीड़ जुटाई धर्म और सरकार की सेवा की। वह आपकी पीठ थपथपा कर कहती है कि डरो मत बेटा, हम केस ही वापस करा देंगे। यह देश बदला है और बदला भी किस रूप में जहां हत्यारे की जाति, धर्म, राजनीति और निष्ठा तय करती है कि वह अपराधी है या ‘समाजसेवी’।

जहां लिंचिंग अब अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का नया संस्करण है और अपराधी अब ‘गौ प्रेमी’ कहलाते हैं। आप हत्या करो, वीडियो बनाओ, नारे लगाओ, और फिर पार्टी कार्यालय में जाकर पकोड़े खाओ…सरकार आपके लिए कानून का रास्ता साफ कर देगी। पूरा तंत्र तैयार है डीएम से लेकर राज्यपाल तक, हर दस्तखत आपके सम्मान में। अखलाक की हत्या शायद भारत का पहला ऐसा मामला था जिसे मॉबलिंचिंग नाम दिया गया। लेकिन 10 साल बाद देश वहां पहुंच चुका है जहां मॉबलिंचिंग अब ‘घटना’ नहीं, शासन का हिस्सा बन चुकी है। आज अखलाक की हत्या के आरोपी अदालत से बरी होने की दलील नहीं दे रहे हैं। सरकार खुद अदालत से कह रही है कि महोदय, इन सबको छोड़ दीजिए ये हत्यारे नहीं हैं समाज का अभिमान हैं। यही भारत का सबसे भयावह सच है। क्योंकि इससे बड़ा व्यंग्य किसी लोकतंत्र में क्या हो सकता है कि एक सरकार अपने नागरिक को बचाने में नहीं, उसकी हत्या के आरोपी को बचाने में लिप्त हो। लोग कहते हैं कि भीड़ कैसे इतनी निर्भय हो गई, जवाब बिल्कुल साफ है कि भीड़ को ‘राजकीय संरक्षण’ मिला हुआ है। भीड़ जानती है कि कानून उससे नहीं पूछेगा, कानून उसकी झोली में गिरा दिया जाएगा और बाकी काम लाउडस्पीकर कर देगा। किस लोकतंत्र में ऐसा होता है कि हत्या के केस में अभियुक्तों की बैरक से ज्यादा सरकारी दफ्तरों में उनके ‘क्लीन चिट’ की फाइलों का वजन बढ़ता है और यही कारण है कि अखलाक का बेटा जो खुद मरा हुआ नहीं था लेकिन जिसे मरने के लिए पीटा गया, आज न्याय की उम्मीद से ज्यादा अपनी बदकिस्मती पर हंसने लगा होगा। क्योंकि यह देश अब न्याय नहीं देता, बल्कि न्याय की मार्केटिंग करता है, जहां ग्राहक वही है जो सत्ता के संरक्षण में आता है। अब असली सवाल यह रह गया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट उस गहरी नींद से उठेगा, जिसमें सरकारें उसे सुलाए रखना चाहती हैं? सुप्रीम कोर्ट वही करेगा जो उसने बिल्किस बानो के मामले में किया था या फिर वह अखलाक की कब्र की रेत की तरह चुपचाप सब कुछ ढककर रख देगा? यह देश अब एक ऐसे बम पर खड़ा है। जहां गाय की अफवाह पर हत्या हो जाती है और न्याय की अफवाह पर केस वापस हो जाते हैं।

हत्यारा आजाद, मृतक अपराधी देश की सबसे बड़ी विडंबना

2015 में अखलाक की हत्या को पूरे देश ने लाइव देखा था। टेलीविजन पर बहसें हुईं, अखबारों ने एडिटोरियल लिखे, नेताओं ने बयान दिए। लेकिन जैसा कि इस देश की परंपरा है हत्यारा आजाद, मृतक अपराधी। गौतम बुद्ध नगर का वह गांव लाउडस्पीकर पर गोमांस का एलान हुआ, उसी लाउडस्पीकर ने आज लोकतंत्र के कान फाड़ दिए हैं। क्योंकि उसी हत्या के मामले में यूपी सरकार अदालत से कह रही है साहब केस वापस ले लीजिए। वही सरकार, जिसने मॉबलिंचिंग नहीं होने देंगे कहकर सत्ता पाई थी। वही सरकार, जिसने भगवा झंडे उठाए गौरक्षकों को समाज का प्रहरी बताकर उनकी पीठ थपथपाई और वही सरकार अब अदालत से फरियाद कर रही है कि जेल में बंद 15 आरोपियों ने कुछ नहीं किया… भीड़ खुद चलकर आई थी। यानी भीड़ ने अपराध किया, और भीड़ ही निर्दोष है। अब जरा सोचिए कि अगर किसी देश में भीड़ का कोई चेहरा नहीं, कोई नाम नहीं और अपराधियों के नामों से सरकार खुद केस हटा दे तो फिर वह देश क्या कहलाता है?

अखलाक के घर में क्या मिला

मांस जिसकी जांच से पहले अखलाक इलाज के लिए तड़पते हुए मर चुका था। पीछे खड़ी भीड़ को कोई अपराधबोध नहीं था क्योंकि यहां अपराध कानून तय नहीं करता, अपराध तय करता है हत्या करने वाले का धर्म और मरने वाले का नाम।

गाय बची, इंसान गया… अब न्याय भी जा रहा

2015 में जब हत्या हुई, तब भाजपा विपक्ष में थी। 2017 में योगी सरकार आई और 2021 में केस की सुनवाई शुरू हुई। 2025 में सरकार खुद कह रही है इन लोगों ने तो कुछ किया ही नहीं। जिस देश में हत्या का वीडियो साक्ष्य नहीं, बल्कि हत्या करने वालों की ‘राजनीतिक निष्ठा’ साक्ष्य बन जाए, वहां न्याय की क्या औकात रह जाती है? अखलाक केस में आरोपी एक स्थानीय भाजपा नेता का बेटा भी था और जनाब, यह तो वह देश है जहां संबंध सबूतों से बड़े होते हैं।

लिंचिंग अब ‘नया संस्कार’ बन गई

अखलाक का मामला अकेला नहीं। राजस्थान, हरियाणा, झारखंड, मध्यप्रदेश सहित नक्शे पर वे राज्य गिनिए, जहां ‘गौरक्षा’ के नाम पर लोगों की हत्या नहीं हुई और हाल ही में छत्तीसगढ़ में तीन मुस्लिम पशु व्यापारियों को 60 किलोमीटर पीछा कर मार दिया गया। कार में गाय नहीं थी भैंस थी। लेकिन हत्या तो हो चुकी थी। पुलिस बोली ये डर गए और पुल से कूद पड़े।

वाह क्या झूठ है, क्या शासन है, क्या शर्म है! 47 मिनट तक एक युवक का परिवार उसकी चीखें सुनता रहा।
और पुलिस कहती है की कूदकर मर गए। यानी अपराधियों का बचना इतना जरूरी है कि हत्या भी खुदकुशी बनानी पड़े। आज यूपी सरकार अखलाक केस वापस लेकर वही संदेश दे रही है कि गाय के नाम पर इंसान मारो, हम तुम्हारे साथ हैं।

सरकार की अर्जी देखकर संविधान भी रो दिया

यूपी सरकार ने केस वापस लेने की अर्जी लगाई,
और उस पर राज्यपाल की सहमति भी लगा दी गई। राज्यपाल यानी संविधान का संरक्षक। लेकिन संविधान किसका, लिंचिंग करने वालों का या मरने वाले के परिवार का? क्या अखलाक के बेटे दानेदार चोटों से बचा। वह युवक क्या अर्जी पढ़कर हंसा होगा या टूट गया होगा? सोचिए, जज क्या सोच रहे होंगे? हम अपराधी ढूंढें, या सरकार अपराधी बचाए? न्यायपालिका तो वैसे भी अब दो ही बातों से जुड़ी है कभी वह ‘जागती’ है, कभी ‘जगा दी जाती’ है। प्रश्न है कि क्या सुप्रीम कोर्ट खुद संज्ञान लेगा, क्या बिल्किस बानो केस जैसी फटकार अब यूपी सरकार को पड़ेगी?

बलात्कारियों को याद हैं बिल्किस बानो?

बिल्किस बानो के बलात्कारियों को याद है कि उन्हें भी सरकार ने ‘अच्छे चाल चलन’ वाला प्रमाणपत्र देकर आजाद किया था। गुलदस्ते, मिठाइयां, मालाएं मानो हत्यारे नहीं, राष्ट्र वीर हों। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो जजों ने कहा कि आपने कानून का कत्ल कर दिया है और सरकार को जमकर फटकार लगाई। न्यायालय ने कहा कि यह रियायती रिहाई नहीं, धोखाधड़ी है। अब वही गलती यूपी सरकार दोहरा रही है। जिस सीधे शब्दों में कहें तो यह गलती नहीं, नीति है। क्योंकि भारत में अब अपराध धर्म देखकर तय होता है। अपराधी कौन, पीड़ित कौन इसे कानून नहीं, राजनीतिज्ञ तय करते हैं।

10 साल बाद भी अखलाक की कब्र पर न्याय का साया नहीं

गादरी गांव में अखलाक की कब्र आज भी गवाही दे रही है कि इस देश में हत्या से ज्यादा बड़ा खतरा है हत्या का ‘राजनीतिक संरक्षण’। अगर आज अखलाक के हत्यारे बरी हो जाते हैं। कल से कौन सी भीड़ निकलेगी, किसका घर सुरक्षित रहेगा, लोग पूछेंगे कि क्या सुप्रीम कोर्ट और कुछ कर सकता है? जवाब होगा वह सरकार को कटघरे में खड़ा कर सकता है। वह कह सकता है कि।अखलाक को एक बार मार दिया गया था।और अब आप उसे दूसरी बार मार रहे हैं।

क्या सुप्रीम कोर्ट जागता है, या…

पूरा देश देख रहा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपनी बिल्किस बानो वाली सख्ती वापस लाएगा या इस देश में भीड़ के नाम पर हत्या करना नया ‘कानूनी अधिकार’ बन जाएगा? क्या अदालत यह कहेगी कि सरकार आपकी यह अर्जी न्यायपालिका की गरिमा पर हमला है, या फिर न्याय धीरे से चुप बैठ जाएगा और भीड़ अपने डंडे से कानून लिखती रहेगी? अगर अखलाक के हत्यारे बच जाते हैं, अगर बिल्किस के बलात्कारी फिर कभी माला पहनते दिख जाएं, अगर छत्तीसगढ़ के हत्यारे फिर सड़क पर नाचते मिलें तो समझिए यह देश भीड़ द्वारा शासित राष्ट्र बन चुका है, जहां संविधान ‘पुस्तकालय में’ रहता है और कानून ‘लाउडस्पीकर’ पर घोषित होता है।

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