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अडानी–मोदी गठजोड़ ने शेख हसीना को कही का नही छोड़ा, जनता ने पूर्व पीएम को बांग्लादेश से खदेड़ा

 अडानी–मोदी गठजोड़ ने शेख हसीना को कही का नही छोड़ा, जनता ने पूर्व पीएम को बांग्लादेश से खदेड़ा

 जब सत्ता, कारपोरेट और भ्रष्टाचार ने मिलकर एक राष्ट्र की कमर तोड़ दी

शेख हसीना को फांसी, लेकिन असली खेल तो 2015 में मोदी अडानी के साथ शुरू हुआ

बांग्लादेश को महंगी बिजली बेचकर अरबों का मुनाफा, नुकसान जनता का फायदा अडानी का

मोदी की ढाका यात्रा के बाद अडानी को बिना अनुभव के 25 साल का खुर्शीदार अनुबंध

ग्रामीण विद्युतीकरण निगम का पैसा… लेकिन बिजली निर्यात के लिए! कानून, नैतिकता, सब ताक पर

झारखंड में कोयला था, फिर भी ऑस्ट्रेलिया से आयात!क्योंकि बिल बढ़ाना था

सेज का दर्जा देकर अडानी को करोड़ों की छूट चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार की कृपा

 

यह कहानी सिर्फ शेख हसीना की नहीं है। यह कहानी है दक्षिण एशिया में फैले उस ‘कारपोरेट राजनीति गठजोड़’ की, जिसने बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश की अर्थव्यवस्था को चूस लिया, और भारत की सत्ता ने इसे अपने संरक्षण में फलने फूलने दिया। यह सिर्फ बिजली का सौदा नहीं था यह था दो नेताओं की सांठगांठ से एक पूरे राष्ट्र को गुलाम बनाने का सबसे बेशर्म प्रयास और इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी था अडानी।

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को इंटरनेशनल क्राइम्स ट्राइब्यूनल ने भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में फांसी की सजा सुना दी। लेकिन इस फैसले से कहीं बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह भ्रष्टाचार कैसे और किसके संरक्षण में इतना विशाल आकार ले सका?

उस काले अध्याय का एक सबसे बड़ा स्तम्भ है। भारत और विशेष रूप से अडानी समूह के साथ उनका विवादास्पद बिजली समझौता। यह सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्ट नहीं था यह था क्रोनी कैपिटलिज़्म का दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा मॉडल, जिसके पीछे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत दिलचस्पी, बांग्लादेश के संसाधनों पर अडानी का कब्जा, और दोनों देशों के बीच गुप्त आर्थिक राजनीतिक सौदे शामिल थे।

मोदी–अडानी–हसीना तीन कोनों का वह त्रिकोण जिसने एक राष्ट्र को लहूलुहान किया

बांग्लादेश को भारत वर्षों से बिजली निर्यात करता रहा है। लेकिन 2014 के बाद इस निर्यात में एक दिलचस्प बदलाव आने लगा। पहले बिजली सरकारी कंपनियों के जरिए जाती थी अब अडानी के जरिए। 2015 में मोदी ढाका गए और उन्होंने शेख हसीना से कहा कि भारत की नई निजी ऊर्जा कम्पनियों को भी अवसर दिया जाए। नई ऊर्जा कंपनियों में सबसे आगे अडानी थे अडानी और फिर सिर्फ दो महीने बाद, 11 अगस्त 2015 को, अडानी और बांग्लादेश के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर हो गए।

अफसर नहीं आए… एमओयू साइन हो गया

बांग्लादेशी समाचार पत्र द डेली सन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कार्यक्रम में उनके पावर डिविजन के ज्यादा अधिकारी मौजूद ही नहीं थे। मतलब ऊपर से दबाव था, नीचे से अनमना सहयोग। लेकिन सौदा तो हो चुका था। अब अडानी को चाहिए था पावर प्लांट, सरकारी सुविधाएं, भारी-भरकम लोन, निर्यात का अधिकार और यह चारों चीजें भारत सरकार ने उनके प्लेट में परोस दीं।

झारखंड के गोड्डा में 1600 मेगावाट का प्लांट, बिजली भारत को नहीं, बांग्लादेश को!

रोचक बात यह है कि अडानी के पास शुरू में कोई पावर प्लांट था ही नहीं। फिर भी बांग्लादेश ने उससे बिजली खरीदने का 25 साल का समझौता कर लिया। लेकिन असली खेल ग्रामीण विद्युतीकरण निगम से 700 मिलियन डॉलर का लोन बिजली निर्यात के लिए! आरईसी का काम है भारत के गांवों में बिजली पहुंचाना। लेकिन मोदी सरकार ने इस सरकारी कंपनी से अडानी को 700 मिलियन डॉलर का ऋण दिलवा दिया।

ऐसे प्लांट के लिए…जिसकी 100 फीसदी बिजली भारत के गांवों को नहीं, बांग्लादेश को भेजनी थी। यह किस नीति में लिखा है, कौन सा कानून इसे अनुमति देता है, कौन अधिकारी सवाल पूछे सब चुप, क्योंकि आदेश ऊपर से था।

25 साल के कॉन्ट्रैक्ट में ‘क्षमता शुल्क’ बांग्लादेश चाहे बिजली ले या न ले, अडानी को हर साल अरबों!

अडानी के साथ हुए कॉन्ट्रैक्ट पर नजर डालिए सालाना क्षमता शुल्क 2.72 रुपये प्रति यूनिट कुल वार्षिक भुगतान 3,657 करोड़ 25 साल में कुल भुगतान 108,360 करोड़ और यह सिर्फ क्षमता शुल्क है। इसमें बिजली की कीमत शामिल नहीं! दूसरे शब्दों में अडानी सोता रहे, प्लांट बंद रहे, फिर भी बांग्लादेश को हर साल हजारों करोड़ रुपये देने होंगे! यह देश की अर्थव्यवस्था को रसातल में ले जाने का खुला लाइसेंस था।

सरकारी कंपनियां 3.42 रुपये यूनिट दे रही थीं, अडानी से महंगी बिजली क्यों?

एनटीपीसी ने 3.42 रुपये यूनिट में बिजली देना स्वीकार किया, भारतीय निजी कंपनियां औसतन 5.82 रुपये यूनिट लेती थीं, लेकिन अडानी की बिजली की लागत बांग्लादेश को पड़ रही थी 10 रुपये से अधिक यानी 12 टका प्रति यूनिट। सरकारी से 63 फीसदी अधिक, निजी से 27 फीसदी अधिक, तब भी बांग्लादेश को अडानी से ही खरीदनी थी। क्यों कि यह व्यापार नहीं यह राजनीतिक कारपोरेट दबाव का सौदा था।

ऑस्ट्रेलिया से कोयला—बिल फुलाने का सबसे बड़ा खेल

झारखंड कोयले का गढ़ है, लेकिन अडानी ने तय किया कि कोयला 8000 किलोमीटर दूर ऑस्ट्रेलिया की कारमाइकल खदान से लाया जाएगा जिसका मालिक वह खुद है। क्योंकि आयात का बिल बढ़ाने से प्लांट की लागत और बिजली की कीमत दोनों बढ़ाई जा सकती थीं। एक बिल में कोयले की कीमत दिखाई गई 400 डॉलर प्रति टन जबकि बांग्लादेशी अधिकारी उसी कोयले के लिए दे रहे थे 245 डॉलर प्रति टन? आखिर अंतर किसकी जेब में गया, जवाब सब जानते हैं, पर बोलने की हिम्मत किसमें है?

सेज का दर्जा स्वतंत्र भारत में एक कारपोरेट के लिए सबसे बड़ा उपहार

2018 के चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार ने गोड्डा प्लांट को सेज घोषित कर दिया। यह भारत में पहला पावर सेज था। आयात शुल्क में छूट, रेल मार्ग शुल्क में छूट, उपकरण शुल्क में छूट, अतिरिक्त करों का हटना यह सब भारत के नागरिकों के लिए नहीं एक निजी कंपनी के लिए जिसकी सारी बिजली भारत को नहीं, बांग्लादेश को जानी थी।

अडानी ने सबसे ज्यादा वसूला 14.02 टका प्रति यूनिट!

वित्तीय वर्ष 2022-23 में अडानी ने भारत से निर्यात की गई बिजली के लिए सबसे अधिक रेट 14.02 टका प्रति यूनिट वसूल किए और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त होती चली गई। बांग्लादेश ने चिट्ठी लिख दी ‘इतनी महंगी बिजली नहीं खरीद सकते’ 2023 में बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड ने अडानी को पत्र लिखा कि कीमत कम करो नहीं तो नुकसान असहनीय है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।।बांग्लादेश आर्थिक संकट में तैरने लगा सरकार पर जनदबाव बढ़ा। इसी कर्ज।भ्रष्टाचार के जाल ने शेख हसीना की सत्ता को भीतर से खोखला कर दिया।

जुलाई 2024 हसीना का भांडा फूटा, और उन्होंने भारत में शरण ली

सत्ता गिरते ही आरोपों की सूची सामने आने लगी सबसे बड़ा आरोप था बांग्लादेश को अडानी के हवाले करने का। अब हसीना की सजा के बाद,।बांग्लादेश में अडानी के साथ किए गए सभी समझौतों की समीक्षा की मांग शुरू हो चुकी है। जांच रिपोर्ट आने ही वाली है। वह रिपोर्ट उजागर करेगी कि कैसे एक क्रोनी कारपोरेट गठजोड़ ने देश को बरबादी की कगार तक पहुंचाया। यह मामला सिर्फ शेख हसीना के भ्रष्टाचार का नहीं है।

यह है सत्ता, पूंजी और व्यक्तिगत संबंधों के घातक गठजोड़ का अंतरराष्ट्रीय प्रमाण। जो मॉडल भारत में चल रहा था।वही मॉडल बांग्लादेश में भी उतार दिया गया।।नतीजा सामने है।एक प्रधानमंत्री जेल में, एक देश कर्ज में, और एक कारपोरेट अरबों के मुनाफे में। यह पूरी कहानी उजागर करती है कि जब सत्ता कारपोरेट के लिए काम करने लगे, तो राष्ट्र की जनता सिर्फ भुगतान करने वाली मशीन बनकर रह जाती है।

* मोदी की 2015 ढाका यात्रा के बाद अडानी को अनुचित फायदा मिला
* 700 मिलियन डॉलर का सरकारी लोन बिजली निर्यात के लिए
* 25 साल का महाघोटाले वाला बिजली समझौता
* क्षमता शुल्क में अरबों रुपये बांग्लादेश का नुकसान
* झारखंड में कोयला छोड़कर ऑस्ट्रेलिया से आयात—बिल फुलाने के लिए
* सेज का दर्जा अडानी को हर कर से छुट
* बांग्लादेश ने चिट्ठी लिखकर कहा.दर कम करो
* सरकार गिरने के बाद समझौते की जांच तय

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