
● देवेंद्र आहूजा सीरप सिंडिकेट का सरगना अभी तक पुलिस की पहुँच से अभी तक बाहर
● देवेंद्र आहूजा रोहनियां में पकड़े गए सिरप का सरगना, देर सबेर ये भी पहुँचेगा पुलिस के अंगना
● प्रशांत उपाध्याय उर्फ लड्डू, नीलेश गुप्ता, सौरभ त्यागी (सहारनपुर व गाजियाबाद ) विशाल राणा, विभोर राणा भी है इसी सिंडिकेट का हिस्सा
● रोहनिया में कफ सिरप का काला साम्राज्य जिम के तहखाने में 2 करोड़ नशे की मिली खेप
● जिम के तहखाने में छिपी नशे की बोरियां, पुलिस पहुंची तो खुला रैकेट का काला पेट
● प्रधानपति की करतूत जनता के वोट पर बैठे परिवार की जेलयोग्य ‘जिम राजनीति’
● 150 पेटी एस्कफ वाराणसी से माल्दा तक बिछा नशे का हाईवे
● सप्तसागर दवा मंडी का गैंग करोड़ों का धंधा, भ्रष्ट अफसरों की मौन साझेदारी
● ड्रग विभाग का ‘देवदूत’ या ‘दलाल’? डीएलएसए के संरक्षण से फल-फूल रहा माफिया
● गोदाम मालिक की कहानी मुझे नहीं पता था
● अगरा, पटना, सहारनपुर कनेक्शन देशभर में फैला कफ सिरप का अंडरग्राउंड नेटवर्क
● कानून-व्यवस्था की लाचारी या मिलीभगत? रोहनिया की धरती पर प्रशासनिक नैतिकता की लाश
◆ एडवोकेट मायारानी अग्रहरि
वाराणसी। रोहनिया के भदवर में पुलिस ने जिम के अंडरग्राउंड गोदाम से 2 करोड़ की कफ सिरप बरामद की, उससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रशासन की नाक के नीचे नशे की एक पूरी फैक्ट्री चल रही थी। यह कोई सामान्य मामला नहीं यह प्रधानपति, दवा माफिया, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क, सहारनपुर–आगरा–पटना कनेक्शन और ड्रग विभाग के भ्रष्ट अफसरों का संगठित गैंग है, जो यूपी–बिहार–बंगाल के बीच करोड़ों का नशे का व्यापार चला रहा था। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि सिरप कहां मिला… बड़ा सवाल यह है कि यह इतनी मात्रा में आया कैसे, उतरा कैसे, छिपा कैसे, और सप्लाई के लिए तैयार कैसे हुआ और इसका जवाब एक शब्द में छिपा है सिस्टम की मिलीभगत।
जिम के नीचे छिपा 2 करोड़ का नशे का पहाड़, नेता माफिया गठजोड़ उजागर
रोहनिया थानाक्षेत्र के हाईवे इन होटल के पास चल रहे टाइटन फिटनेस जिम को देखकर कोई नहीं समझ सकता था कि यह सिर्फ कसरत की जगह नहीं, बल्कि कफ सिरप की अवैध सप्लाई का गुप्त गोदाम भी है।
पुलिस को सूचना मिली कि जिम के अंडरग्राउंड में बड़े पैमाने पर असामान्य पैकेट रखे गए हैं। एसीपी रोहनिया संजीव शर्मा और थाना प्रभारी राजू सिंह की टीम जब जिम में घुसी, तो सामने 150 पेटी एस्कफ सिरप रखी मिली। इसकी बाजार में कीमत लगभग 2 करोड़ रुपये आंकी गई। पहले तो मामला सिर्फ पुलिस का लगा, लेकिन जैसे ही पता चला कि सिरप की सप्लाई बंगाल के माल्दा टाउन तक जानी थी, तुरंत ड्रग विभाग और एंटी नारकोटिक्स फोर्स को बुलाया गया। यहीं से कहानी ने दूसरा मोड़ लिया। क्योंकि सिरप कोई साधारण नहीं था यह हिमाचल प्रदेश से लाया गया, एबोट और लेबोरेट जैसी कंपनियों का एस्कफ सिरप है, जिसका इस्तेमाल नशे के लिए बड़े पैमाने पर होता है।
प्रधानपति की संलिप्तता कानून बनाने वालों के घर से कानून तोड़ने का सामान
पुलिस ने मौके से महिला प्रधान के पति को हिरासत में लिया। यानी निर्वाचन में जनता की सेवा का वादा करने वाला परिवार, छिपकर युवाओं को नशे की लत में धकेलने का धंधा कर रहा था। जिम भले ही किराए पर लिया गया हो, लेकिन प्रधानपति को 150 पेटी कफ सिरप किसने दिया, कौन है उसका सप्लायर, किस भरोसे पर उन्होंने इतना बड़ा माल अपने गोदाम में रखा।
इसमें आम आदमी नहीं, बड़े सप्लायर और सिस्टम से जुड़े लोग ही शामिल हो सकते हैं।
वाराणसी से माल्दा तक नशे का हाईवे कौन चला रहा
150 पेटी सिरप हिमाचल से चली, वाराणसी पहुंची, जिम के तहखाने में उतारी गई, लेकिन सप्लाई रुकी हुई थी। क्या वाराणसी ट्रांजिट प्वाइंट बन चुका है, क्योंकि माल्दा टाउन पूर्वी भारत में ड्रग्स और नकली दवाओं का केंद्र माना जाता है। कफ सिरप की बोतलें वहां सोने की तरह बिकती हैं। यानी वाराणसी इस पूरे नेटवर्क की मध्यस्थ कड़ी बन चुका था।
दवा माफिया के नाम उजागर प्रशांत उपाध्याय उर्फ लड्डू, निलेश गुप्ता, देवेंद्र आहूजा और पूरा रैकेट
इस मामले में जिन नामों का खुलासा हुआ है, वे सामान्य नहीं ये वही लोग हैं जिनकी पहुंच दवा मंडियों से लेकर सरकारी अफसरों तक है। प्रशांत उपाध्याय उर्फ लड्डू सप्तसागर दवा मंडी का कुख्यात खिलाड़ी है। नीलेश गुप्ता पहले दवा की दुकान पर नौकर था अब करोड़ों का मालिक बन चुका है। देवेंद्र आहूजा (प्रतापनगर, आगरा), गुंजन केसरी, विकास प्रजापति, विष्णु (पटना, बिहार), रोहित केसरी वाराणसी का ट्रांसपोर्टर, मिंटू कुमार गोदाम से कनेक्शन वाला शख्स। इन सबकी भूमिका साफ है किसी का काम माल उठाना, किसी का काम ट्रांसपोर्ट करना, किसी का काम गोदाम उपलब्ध कराना, किसी का काम आगे सप्लाई करना। एक संगठित माफिया नेटवर्क की पूरी परतें अब खुल चुकी हैं।
माल छिपाया कैसे गया, ड्रग विभाग के भ्रष्ट अफसरों का संरक्षण
दिनेश कुमार तिवारी, ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी अधिकारी का सबसे बड़ा नाम सामने आता है। सूत्रों की माने तो यही वह शख्स है जिसकी छत्रछाया में प्रशांत उपाध्याय और निलेश गुप्ता जैसे लोग खुलेआम अवैध कफ सिरप का धंधा करते थे। क्या एक भी पेटी बिना विभाग की अनुमति के निकल सकती है। क्या 150 पेटियां वाराणसी आ जाएं और अधिकारी को पता न चले? क्या लाखों की बिलिंग, उठान, स्टॉक, ट्रांसपोर्टेशन बिना ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी अधिकारी के ‘मौन आशीर्वाद’ के कैसे संभव है। बिल्कुल नहीं यह धंधा तभी इतना बड़ा हो पाया, क्योंकि विभाग के भीतर का ‘बड़ा भाई’ इस पूरे सिस्टम को चलते रहने देता था।
गोदाम मालिक का बेशर्म बहाना ‘मुझे कुछ पता नहीं’
गोदाम मालिक प्रबल कुमार ने वही कहा, जो हर पकड़ा गया अपराधी कहता है मुझे नहीं पता था। 150 पेटी कफ सिरप गोदाम में रखी हो, और मालिक को पता न हो ये कैसे संभव है। इतनी बड़ी मात्रा में माल उतरा हो, लोडिंग अनलोडिंग हुई हो, और मालिक को पता न हो।
यह सफ़ेद झूठ है, और जनता इसे समझती भी है। प्रबल कुमार भी उसी नेटवर्क का हिस्सा है, शायद छोटा खिलाड़ी, लेकिन रैकेट की रीढ़ ऐसे ही ‘छोटे किरदार’ ही बनते हैं।
सहारनपुर–पटना–आगरा का राष्ट्रीय कनेक्शन कफ सिरप का देशव्यापी रैकेट
इस गिरोह के तार एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं।
सहारनपुर के विशाल राणा और विभोर राणा से लेकर
पटना के विष्णु, आगरा के देवेंद्र आहूजा, वाराणसी के रोहित केसरी तक एक पूरा नेटवर्क है जो देशभर में कफ सिरप, ट्रामाडोल, कोडीन आधारित दवाओं की सप्लाई करता है। यह व्यापार सिर्फ अवैध नहीं यह युवाओं के भविष्य को चुराने वाला अपराध है। कई राज्यों की पुलिस महीनों से सिरप माफिया की तलाश में है, लेकिन वे खुलकर इसलिए चलते हैं क्योंकि सिस्टम के कुछ अधिकारी उनके लिए ढाल बनकर खड़े हैं।
जनता पूछ रही है क्या रोहनिया में कानून मर चुका है?
इतनी बड़ी मात्रा में अवैध कफ सिरप किसी छोटे रैकेट का काम नहीं हो सकता। यह स्पष्ट है कि स्थानीय प्रशासन, ड्रग विभाग, दवा मंडी और राजनीतिक संरक्षण सबने मिलकर इस धंधे को पनपने दिया।
क्या कोई ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी अधिकारी अपने क्षेत्र में चल रही 2 करोड़ की अवैध दवा को नहीं जानता,
क्या थाना–चौकी को कुछ भी जानकारी नहीं थी,
प्रधानपति को पता नहीं था कि गोदाम में क्या रखा है।
अगर यह सब नहीं जानते थे, तो फिर इन पदों पर बने रहने का क्या अधिकार है। अगर जानते थे तो यह अपराध सिर्फ कफ सिरप बेचने का नहीं पूरी व्यवस्था को बेच देने का अपराध है। यह सिर्फ जिम नहीं, यह पूरा सिस्टम सड़ा हुआ है। इस केस ने फिर साबित कर दिया की वाराणसी का दवा बाजार एक आधिकारिक, गैर-आधिकारिक ड्रग माफिया नेटवर्क चला रहा है। स्थानीय राजनीति, ड्रग विभाग, और दवा व्यापारियों की सांठ-गांठ यूपी, बिहार और बंगाल में नशे का साम्राज्य खड़ा कर चुकी है। अब बॉल पुलिस के पाले में है पुलिस इस रैकेट की सिर्फ ‘छोटी मछलियां’ पकड़ेगी या प्रशांत उपाध्याय, निलेश गुप्ता, विशाल राणा, ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी अधिकारी आदि बड़ी मछलियों को भी घसीटकर जेल भेजेगी।




