चन्दौली

चकिया में फर्जी डायग्नोस्टिक रैकेट का चल रहा धंधा, सीएमओ वाई के राय बना अंधा

बिना डॉक्टर-बिना लाइसेंस चल रहे दर्जनों सेंटर

● चकिया में फर्जी डायग्नोस्टिक रैकेट का चल रहा धंधा, सीएमओ वाई के राय बना अंधा

● बिना डॉक्टर-बिना लाइसेंस चल रहे दर्जनों सेंटर

● रिपोर्ट पर डॉक्टर का नाम… सेंटर पर डॉक्टर गायब

● कागज पर डॉक्टर, लेकिन सेंटर पर एक भी नहीं, आखिर कौन बना रहा है रिपोर्ट?

● बिना लाइसेंस, बिना प्रमाणन मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़

● न पंजीकरण, न मशीनों का कैलिब्रेशन, न टेक्नीशियन का सर्टिफिकेट फिर भी धड़ल्ले से जांच जारी

● फर्जी रिपोर्टों से इलाज बेपटरी बीमारी बढ़ी, खर्च भी बढ़ा

● थायराइड, शुगर, वीर्य-परीक्षण से लेकर अल्ट्रासाउंड तक की गलत रिपोर्टें इलाज की दिशा ही उलटी।

● टेक्नीशियन कर रहे अल्ट्रासाउंड कानून का खुलेआम उल्लंघन

● सोनोलॉजिस्ट गायब, बटन दबा रहा टेक्नीशियन अल्ट्रासाउंड बिना डॉक्टर के

● स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी मिलीभगत या लापरवाही?

● स्कैन किए हस्ताक्षर, टेम्पलेट रिपोर्ट पूरी जांच बनी मजाक

● पीलीभीत में 22 सेंटर सील, चकिया में एक भी कार्रवाई नहीं

● कानून वही, देश वही फिर चकिया में कार्रवाई क्यों शून्य, क्या संरक्षण प्राप्त है फर्जी सेंटरों को?

● ग्रामीणों का टूटा भरोसा अब जांच कराने का मन नहीं करता

 

◆ विशेष संवाददाता

चकिया, चंदौली। जहां मरीजों की जिंदगी का सवाल हो, वहां नियम, मानक, लाइसेंस और विशेषज्ञ डॉक्टर की मौजूदगी बुनियादी आवश्यकता होती है। लेकिन चकिया ब्लॉक में यह सब ‘कागजों में’ है, जमीनी हकीकत पूरी तरह उलट। दर्जनों डायग्नोस्टिक और पैथोलॉजी सेंटर ऐसे चल रहे हैं जैसे सबकुछ ठीक हो न डॉक्टर, न पंजीकरण, न मशीनों का सत्यापन और न ही रिपोर्ट की विश्वसनीयता। ग्रामीणों की शिकायतें इतनी गंभीर हैं कि किसी भी विकसित स्वास्थ्य प्रणाली में एक ही शिकायत पूरे सिस्टम को हिला दे, लेकिन चकिया में यह सब धड़ल्ले से जारी है। ग्रामीणों का कहना है कि आखिर रिपोर्ट कौन बना रहा है, डॉक्टर कौन है लाइसेंस का।पता नहीं है? स्वास्थ्य विभाग की खामोशी ही सबसे बड़ा अपराध बन गया है।चन्दौली जिले का मुख्य चिकित्साधिकारी धृतराष्ट्र बन कर फर्जी डायग्नोस्टिक सेंटरो से अवैध वसूली करवा रहा है।

पर्ची पर ‘डॉक्टर’ का नाम… सेंटर पर डॉक्टर गायब!

चकिया के कई केंद्रों में मरीजों ने बताया कि रिपोर्ट पर दर्ज डॉक्टर का नाम केवल शोपीस है। एक ग्रामीण ने कहा कि रिपोर्ट पर डॉक्टर का नाम था, लेकिन केयर डायग्नोस्टिक सेंटर में कोई डॉक्टर दिखाई ही नहीं दिया। मशीन चल रही थी, टेक्नीशियन बैठा था, और पांच मिनट में रिपोर्ट प्रिंट होकर मिल गई। डॉक्टर केवल कागज पर हैं, मशीनें केवल कमाई का जरिया, जो मेडिकल अपराध है।

थायराइड, शुगर, वीर्य-जांच की गलत रिपोर्ट इलाज पटरी से उतरा

एक युवक ने बताया कि उसकी थायराइड रिपोर्ट हाइपो बताई गई। सरकारी अस्पताल में दोबारा जांच हुई तो रिपोर्ट सामान्य निकली। मरीज बोला कि उन्होंने झूठी रिपोर्ट दे दी, मैं दवा शुरू करने वाला था, बाद में पता चला कि रिपोर्ट गलत है। गलत रिपोर्ट का मतलब गलत इलाज कई बार जीवनभर की बीमारी, कई बार जान जाने तक का खतरा। चकिया में ये खतरे रोज पैदा हो रहे हैं।

पंजीकरण का नामोंनिशान नहीं

भारत में नैदानिक ​​प्रतिष्ठान अधिनियम, 2010 के तहत हर लैब, डायग्नोस्टिक सेंटर का पंजीकरण अनिवार्य है।
लेकिन चकिया में बिना पंजीकरण के चलता है। ये सेंटर
न पंजीकृत, न डॉक्टर का सत्यापन, न मशीनों का कैलिब्रेशन, न टेक्नीशियन का प्रमाणपत्र और न ही बायोमेडिकल वेस्ट का निस्तारण का प्रमाणपत्र है, फिर भी हर दिन सैकड़ों रिपोर्ट बना रहे हैं। यह जनता के साथ स्वास्थ्य धोखाधड़ी है।

स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी, मिलीभगत का आरोप

ग्रामीणों, स्थानीय डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग की मौन सहमति ने इन फर्जी लैबों को खुली छूट दे रखी है। शिकायत के बाद भी निरीक्षण टीम महीनों तक सेंटरों में नहीं पहुंचती है
पंजीकरण सूची सार्वजनिक नहीं, शिकायत पर कार्रवाई नहीं, कुछ सेंटर राजनीतिक संरक्षण में विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहे हैं। एक डॉक्टर ने कहा कि ये सेंटर कमीशन-आधारित हैं। रिपोर्ट झट से दे देते हैं ताकि मरीज जल्दी लौटे। हमारी मजबूरी है कि रिपोर्ट के आधार पर मरीज का इलाज करना पड़ता है।

मरीजों का दर्द दवा गलत, पैसा बर्बाद, भरोसा खत्म

ग्रामीण इलाकों में लोग जांच कराने इस उम्मीद से आते हैं कि जांच के बाद सही इलाज मिलेगा। लेकिन उसके बदले हमें धोखा मिलता है। कहा कि गलत रिपोर्ट से गलत दवा, मरीज की हालत ठीक होने के बजाय और बिगड़ना, दोबारा जांच का खर्च, समय की बर्बादी, मानसिक तनाव अलग से रहता है। मरीज रमेश मिश्रा ने खा कि अब जांच कराने का मन ही नहीं करता। पैसे भी लगते हैं और बीमारी भी समझ में नहीं आती। फर्जी रिपोर्टों की छपाई कागज पर डॉक्टर, जमीन पर दलाल ज्यादातर सेंटरों की यही वास्तविकता है। रिपोर्ट पहले से टेम्पलेट में फीड, डॉक्टर का नाम बिना अनुमति इस्तेमाल, हस्ताक्षर स्कैन कर चिपकाया जाता है। टेस्ट मशीनें अप्रमाणित, टेक्नीशियन अवैध रूप से अल्ट्रासाउंड तक करते हैं। एक महिला ने कहा कि सोनोलॉजिस्ट नहीं था, टेक्नीशियन मशीन चला रहा था और दस मिनट में फोटो व रिपोर्ट भी दे दी। जबकि अल्ट्रासाउंड बिना डॉक्टर के चलाना कानूनी अपराध है।
लेकिन चकिया में यह रोजमर्रा का धंधा है।

पीलीभीत में 22 फर्जी संस्थान सील चकिया में कार्रवाई शून्य

2025 में पीलीभीत जिले में ऐसे अवैध चिकित्सा संस्थानों पर बड़ी कार्रवाई हुई। 22 सेंटर सील हुए लेकिन चकिया में शिकायतें महीनों पुरानी कार्रवाई एक भी नहीं। यही अंतर स्पष्ट करता है कि समस्या कानून की नहीं इच्छाशक्ति की है।

सूत्रों की मानें तो अगर स्थिति न सुधरी तो मरीज गलत इलाज से बीमार पड़ते रहेंगे, गंभीर बीमारियां अनदेखी रह जाएंगी। गर्भवती महिलाओं को गलत अल्ट्रासाउंड से जान का खतरा, बच्चों के टेस्ट गलत आने से विकास प्रभावित होगा और क्षेत्र में स्वास्थ्य आपदा उत्पन्न हो जाएगी। रामलाल ने कहा कि अगर फर्जी सेंटर नहीं बंद हुए, तो लोग इलाज से भरोसा खो देंगे।

ब्रजेश पाठक आदेश जूते की नोंक पर

उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री व चिकित्सा शिक्षा मंत्री ब्रजेश पाठक उर्फ छापामंत्री के के नाम से चर्चित इनके आदेश को चन्दौली जिले का सीएमओ वाई के राय अपने जूते की नोंक पर रखता है। पूरे जिले में अवैध हॉस्पिटल्स व लैब सेंटर व फर्जी डायग्नोस्टिक सेंटरों की बाढ़ आ गयी है,लेकिन इस बे-ईमान सीएमओ वाई के राय के कानों पर जू नही रेंग रही है। मानक विहीन स्वास्थ्य केंद्रों से बंधी बधाई रकम इस बागड़बिल्ले सीएमओ तक पहुँच रही है।सूत्रों की माने तो नए पंजीकरण में भी इसके द्वारा भारी धन उगाही की जा रही है। ये अवैध वसूली में इतना डूब गया है कि इसे ब्रजेश पाठक का कोई भय नही है। वैसे भी इस गलबजउनी सरकार से उम्मीद ही क्या की जा सकती है इनका झूठा भाषण ही इनका शासन है।

* चकिया में दर्जनों डायग्नोस्टिक सेंटर बिना लाइसेंस, बिना डॉक्टर चल रहे
* फर्जी रिपोर्ट, स्कैन किए हस्ताक्षर, अप्रमाणित उपकरण मरीजों की जान खतरे में
* ग्रामीणों की शिकायत के बाद भी स्वास्थ्य विभाग चुप मिलीभगत का आरोप
* थायराइड, शुगर, अल्ट्रासाउंड की रिपोर्ट गलत, इलाज में गड़बड़ी
* ग्रामीणों का टूटता विश्वास, आर्थिक-मानसिक बोझ बढ़ा
* अल्ट्रासाउंड बिना डॉक्टर के होना कानूनी अपराध, चकिया में आम प्रथा

चकिया ब्लॉक में डायग्नोस्टिक सेंटरों का ऐसा अनियंत्रित विस्तार हुआ है जो पूरी स्वास्थ्य-व्यवस्था, मरीजों के जीवन और सरकारी निगरानी तंत्र की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल उठाता है। जनस्वास्थ्य के लिए बनाए गए नियमों को ठेंगे पर रखते हुए दर्जनों फर्जी लैब्स चल रही है। जिनमें न डॉक्टर है, न पंजीकरण, न तकनीकी मानक। इसके बावजूद रोज सैकड़ों रिपोर्टें तैयार की जा रही हैं, और गांव के मरीज इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर दवाइयां और इलाज शुरू कर देते हैं। परिणाम, बीमारी का बढ़ना और इलाज का बेपटरी हो जाना आम बात हो चुकी है। चकिया के लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जनता की जान ज्यादा कीमती है या फर्जी सेंटरों की कमाई। चकिया की यह स्थिति केवल चिकित्सा अनियमितता नहीं, बल्कि स्वास्थ्य अधिकार का दमन है। जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक यह साबित माना जाएगा कि चकिया में स्वास्थ्य विभाग के सामने मरीज की जान की कीमत कुछ नहीं।

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