उत्तर प्रदेश

गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति और सनातन का बढ़ता मान, योगी जी का धर्म-धुरन्दरो में बढ़ रहा सम्मान

राम मंदिर के बाद अब इतिहास की अगली परतें खुल रही

● गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति और सनातन का बढ़ता मान,  योगी जी का धर्म-धुरन्दरो में बढ़ रहा सम्मान

● राम मंदिर के बाद अब इतिहास की अगली परतें खुल रही

● हिंदुत्व भावुकता नहीं, प्रशासनिक संकल्प बन चुका

● तुष्टीकरण नहीं, सत्य की राजनीति का उदय

● गोरखनाथ परंपरा का तीसरा चरण विचार से सत्ता तक

● ज्ञानवापी-मथुरा बहस नहीं, ऐतिहासिक चेतना का प्रश्न

● सनातन आत्मविश्वास की वापसी का चेहरा

● कानून, संस्कृति और राष्ट्र तीनों का संतुलित नेतृत्व

● 21वीं सदी का भारत विकास के साथ सांस्कृतिक स्वाभिमान

 

(लेखिका : रीना एन सिंह)
अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट

भारत का इतिहास केवल राजवंशों की समय-रेखा या युद्धों की गणना नहीं है। यह उस निरंतर सभ्यतागत संघर्ष की कथा है, जिसमें तलवारों से अधिक स्मृतियों पर वार किए गए, मंदिरों से अधिक आत्माओं को तोड़ने की कोशिश हुई और सत्ता से अधिक संस्कृति को पराजित करने की योजनाएं रची गईं। विदेशी आक्रमण भारत के लिए केवल राजनीतिक गुलामी नहीं थे, वे एक सुनियोजित सांस्कृतिक दमन थे। जिसका लक्ष्य था भारत की सनातन चेतना, उसकी आस्था, उसके प्रतीक और उसकी स्मृति। मंदिरों को तोड़कर बनाई गई संरचनाएं महज धार्मिक ढांचे नहीं थीं, वे विजित समाज के सीने पर रखे गए ऐसे पत्थर थे, जो हर पीढ़ी को यह याद दिलाएं कि वह पराजित है, अधीन है और अपने ही देवस्थलों पर पराया है। इतिहास इस सच को जानता है कि बाबरी, शाही ईदगाह और ज्ञानवापी जैसे स्थल किसी इबादत की आवश्यकता से नहीं, बल्कि अहंकार की राजनीति से खड़े किए गए। ये संरचनाएं ‘नमाज’ से अधिक ‘निशान’ थीं—ताकि आने वाली पीढ़ियां यह भूल जाएं कि उनके देवताओं का जन्म कहां हुआ, उनकी सभ्यता की जड़ें कहां हैं और उनका आत्मसम्मान किस मिट्टी से उपजा है। यह मनोवैज्ञानिक युद्ध था, जो सदियों तक चला। लेकिन भारत की सनातन आत्मा ने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। वह टूटी नहीं, झुकी नहीं केवल समय की प्रतीक्षा करती रही। पांच सौ वर्षों तक यह संघर्ष कभी संतों की चेतावनी में जीवित रहा, कभी अखाड़ों की हुंकार में, कभी साधुओं की तपस्या में और कभी आम जन के मौन आक्रोश में। यह संघर्ष अदालतों तक पहुंचा, आंदोलनों में बदला, सत्ता से टकराया और अंततः राम जन्मभूमि पर राम मंदिर के पुनर्स्थापन के साथ इतिहास ने करवट ली। राम मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक पुनर्स्थापना नहीं था, वह उस दास-मानसिकता का अंत था, जिसे वर्षों तक ‘सद्भाव’ और ‘शांति’ के नाम पर थोपे रखा गया। वह क्षण भारत के लिए यह घोषणा था कि अन्याय कितना भी पुराना क्यों न हो, वह न्याय नहीं बन जाता। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व एक आकस्मिक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि पीढ़ियों की वैचारिक तपस्या का परिणाम है। यह वही परंपरा है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी हिंदू चेतना को राष्ट्रवाद से अलग नहीं होने दिया। महंत दिग्विजयनाथ ने जब ब्रिटिश सत्ता और मुस्लिम लीग दोनों के विरुद्ध स्वर उठाया, तब उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह संघर्ष सत्ता का नहीं, सभ्यता का है। महंत अवैद्यनाथ ने इस चेतना को जनांदोलन का रूप दिया और राम जन्मभूमि को केवल एक स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक बनाया। और आज, इसी परंपरा का तीसरा चरण योगी आदित्यनाथ के रूप में सामने है। जहां विचार सत्ता में और चेतना प्रशासन में परिवर्तित होती दिखाई देती है। योगी आदित्यनाथ उस नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हिंदुत्व को भावनात्मक नारेबाजी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे कानून, शासन, अनुशासन और सांस्कृतिक स्पष्टता में ढालता है। वे उस राजनीति के प्रतिपक्ष में खड़े हैं, जिसने दशकों तक तुष्टीकरण को ही शांति का पर्याय बना दिया। योगी का नेतृत्व इस भ्रम को तोड़ता है कि विकास और संस्कृति परस्पर विरोधी हैं। अयोध्या, काशी और मथुरा में चल रहे विकास कार्य यह साबित करते हैं कि जब जड़ें मज़बूत होती हैं, तभी राष्ट्र आर्थिक रूप से भी सशक्त होता है। आज जब ज्ञानवापी और कृष्ण जन्मभूमि जैसे प्रश्न फिर से राष्ट्रीय विमर्श में हैं, तब यह स्पष्ट हो चुका है कि ये मुद्दे अदालतों तक सीमित नहीं हैं। ये भारत की स्मृति, उसकी अस्मिता और उसकी ऐतिहासिक ईमानदारी से जुड़े प्रश्न हैं। योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे इन सवालों से भागते नहीं, उन्हें दबाते नहीं और न ही तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में चुप्पी साधते हैं। वे कानून के दायरे में सत्य के साथ खड़े होते हैं। 21वीं सदी का भारत अब केवल जीडीपी और इंफ्रास्ट्रक्चर की कहानी नहीं लिखना चाहता। यह सदी उस भारत की वापसी की सदी है, जो अपनी सनातन पहचान को लेकर आत्मविश्वासी है, जो अपने इतिहास से शर्मिंदा नहीं और जो भविष्य की ओर बिना भय के देखता है। और इस निर्णायक दौर में, योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व उस चेतना का प्रतीक बनकर उभरता है, जो कहती है गुलामी के प्रतीक ढहेंगे, सत्य प्रकट होगा और भारत अपनी सभ्यतागत गरिमा के साथ पुनः खड़ा होगा।

गुलामी के प्रतीक इतिहास का सच दबाया गया

भारत में मंदिर विध्वंस कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी। बाबरी, शाही ईदगाह और ज्ञानवापी जैसे स्थल इस रणनीति के दस्तावेज हैं। इन संरचनाओं का उद्देश्य इबादत से अधिक, विजित समाज को मानसिक रूप से अधीन रखना था। इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग भले ही इस पर मौन साधे रहा हो, लेकिन लोक स्मृति ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि ये प्रश्न सदियों बाद भी जीवित रहे।

राम मंदिर केवल निर्णय नहीं, सभ्यता का मोड़

राम मंदिर आंदोलन को सीमित दृष्टि से देखना ऐतिहासिक भूल होगी। यह आंदोलन उस चेतना का परिणाम था, जो कहती थी कि अन्याय चाहे कितना पुराना क्यों न हो, वह न्याय नहीं बन जाता। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय कानूनी था, लेकिन उसका सामाजिक प्रभाव सभ्यतागत था। इसने यह स्पष्ट किया कि सत्य को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं।

गोरखनाथ परंपरा विचार से नेतृत्व तक

महंत दिग्विजयनाथ ने ब्रिटिश सत्ता और मुस्लिम लीग दोनों के विरुद्ध हिंदू स्वाभिमान की आवाज उठाई। अवैद्यनाथ ने उसे जनांदोलन का स्वरूप दिया। योगी आदित्यनाथ ने उसी विचार को सत्ता की भाषा दी। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं, बल्कि पीढ़ियों की तैयारी का परिणाम है।

योगी आदित्यनाथ भावुकता से आगे का हिंदुत्व

योगी का हिंदुत्व नारों तक सीमित नहीं। वह कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक सख्ती, माफिया-विरोधी अभियान और सांस्कृतिक स्पष्टता में दिखता है। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश केवल धार्मिक पहचान ही नहीं, बल्कि शासन की दृढ़ता का उदाहरण भी बनता है।

ज्ञानवापी और मथुरा बहस क्यों नहीं रुकती

ये प्रश्न इतिहास के दबे हुए पन्ने हैं। ज्ञानवापी में मिले प्रमाण केवल आस्था नहीं, तथ्य भी हैं। मथुरा में शाही ईदगाह का प्रश्न केवल जमीन का नहीं, स्मृति का है। योगी आदित्यनाथ इन मुद्दों पर चुप्पी नहीं साधते, बल्कि कानून के दायरे में सत्य की बात करते हैं।

तुष्टीकरण बनाम सत्य की राजनीति

पिछले दशकों में सत्ता ने शांति के नाम पर असत्य को संरक्षण दिया। योगी की राजनीति इस प्रवृत्ति का प्रतिवाद है। वे कहते हैं तुष्टीकरण से नहीं, न्याय से स्थिरता आती है। यही दृष्टि उन्हें अन्य नेताओं से अलग करती है।

विकास और संस्कृति झूठा द्वंद्व

यह प्रचारित किया गया कि सांस्कृतिक प्रश्न विकास के विरोधी हैं। योगी मॉडल इस मिथक को तोड़ता है। काशी, अयोध्या और मथुरा में विकास के साथ सांस्कृतिक पुनर्स्थापना इसका उदाहरण है।

राष्ट्रव्यापी प्रभाव

योगी आदित्यनाथ आज केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक वैचारिक संदर्भ बन चुके हैं। उनका नेतृत्व उस भारत की आकांक्षा को स्वर देता है, जो आत्मविश्वासी है, अपने इतिहास से शर्मिंदा नहीं और भविष्य को लेकर स्पष्ट है। क्योंकि यह नेतृत्व सुविधाजनक नहीं है। यह समझौतावादी नहीं, स्पष्टवादी है। यह इतिहास के उन अध्यायों को खोलता है, जिन्हें बंद रखने में कई राजनीतिक हित जुड़े थे।

21वीं सदी का भारत और योगी फैक्टर

आज भारत केवल आर्थिक महाशक्ति बनने की दौड़ में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापना के चरण में है। इस यात्रा को ऐसा नेतृत्व चाहिए जो दबाव में न झुके। योगी आदित्यनाथ इसी कारण इस दौर के सबसे निर्णायक नेताओं में गिने जा रहे हैं।

* राम मंदिर ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का द्वार खोला
* ज्ञानवापी और मथुरा ऐतिहासिक स्मृति के प्रश्न
* योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का प्रशासनिक मॉडल
* तुष्टीकरण की राजनीति का स्पष्ट अंत
* विकास और संस्कृति का संतुलित दृष्टिकोण
* गोरखनाथ परंपरा का सत्ता में रूपांतरण
* 21वीं सदी का आत्मविश्वासी भारत
* सनातन चेतना के साथ आर्थिक सशक्तिकरण

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