राजनीति

दंगेंमातरम, चंदेमातरम, धन्धेमातरम, लुटेमातरम, सत्यानाशेमातरम, झूठेमातरम, धोखेमातरम, गंदेमातरम, मुर्खेमातरम नरेश ने सदन में करा दिया वंदेमातरम

घिन्न आती है ऐसे प्रधानसेवक पर, वंदे मातरम् की आड़ में संसद की असली मात…!, जब संकट चिल्लाए और सत्ता "वंदे मातरम्" गाए!

● दंगेंमातरम, चंदेमातरम, धन्धेमातरम, लुटेमातरम, सत्यानाशेमातरम, झूठेमातरम, धोखेमातरम, गंदेमातरम, मुर्खेमातरम नरेश ने सदन में करा दिया वंदेमातरम

● घिन्न आती है ऐसे प्रधानसेवक पर, वंदे मातरम् की आड़ में संसद की असली मात…!, 

● जब संकट चिल्लाए और सत्ता “वंदे मातरम्” गाए!

● देश जले ताली पर सत्ता, संसद में खेल शुरू

● वंदे मातरम् का सहारा, असल सवालों से किनारा

● जहां तथ्य कमजोर हों, वहां राष्ट्रवाद गाढ़ा कर दो

● ध्वज नहीं, धुव्रीकरण फहराने का नया संसदीय उत्सव

● संविधान परेशान, सत्ता चुनावी गान में व्यस्त

● संसद में बहस नहीं, चुनावी ‘बंकिम-लीला’ शुरू!

 

पँचशील अमित मौर्य

 

संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हुआ, लेकिन लग रहा था जैसे लोकतंत्र का तापमान गिरकर उस बिंदु पर पहुंच गया है, जहां सरकार बहस नहीं, बस ‘भावनाओं’ की धूप सेकना चाहती है। देश में एसआईआर के काम में लगे बीएलओ मर रहे हैं, इंडिगो का संकट लाखों यात्रियों की कमर तोड़ रहा है, दिल्ली पर आतंकी हमला हुआ है, प्रदूषण में लोग दम तोड़ रहे हैं, नौजवान नौकरी के लिए और किसान हक के लिए तड़प रहे हैं। लेकिन सत्ता के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। क्योंकि सरकार ने समाधान नहीं, बल्कि एक नया ‘राष्ट्रवादी नाटक’ खोज लिया है वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर संसद में दो दिन की राजनीतिक होली। इतिहास को सच्चाई से नहीं, भावनाओं से रंगने का यह नया खेल है जहां प्रधानमंत्री मोदी संसद में खड़े होकर बार-बार कांग्रेस, नेहरू और जिन्ना को घुमा-फिराकर निशाना बनाते हैं; और देश की असली समस्याएं बहस की सूची में जगह भी नहीं पातीं। यह वही सरकार है जो संवैधानिक संस्थाओं को तोड़ने का हर संभव प्रयास करती है, और फिर उसी संविधान की धूल झाड़कर विपक्ष को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाती है। सत्ता ने एक बार फिर चुनावी स्टंट को संसदीय विमर्श का नाम दे दिया है। बंगाल चुनाव सिर पर है, और मोदी सरकार को लगता है कि इतिहास से छेड़छाड़, भावनाओं का तड़का और वंदे मातरम् का जयघोष सारे असली मुद्दों की लाश पर विजय पताका फहराने में मदद करेगा। आखिर कब तक देश को समस्याओं से नहीं, भावनाओं से चलाया जाएगा!

संसद में ‘देशभक्ति’ का नया अध्याय मुद्दे बाहर, नाटक भीतर

भारत की संसद में शीतकालीन सत्र चल रहा है, लेकिन यह सत्र राष्ट्रहित का नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीतिक जादूगरी का प्रदर्शन बन गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर खास बहस रखवाई और विपक्ष सहित पूरे देश ने समझ लिया कि यह बहस नहीं, बल्कि एक नई विभाजन-राजनीति की पटकथा है। जब देश के सामने बेरोजगारी, महंगाई, प्रदूषण, कृषि संकट, बीएलओ की मौत, एयरलाइन संकट, आतंकवादी हमला, रुपये की गिरावट और अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता जैसे गंभीर मुद्दे मुंह बाये खड़े हों तब सरकार से अपेक्षा थी कि संसद में उन पर विचार होगा। लेकिन मोदी सरकार ने यह रास्ता चुना कि जितनी गहरी समस्या, उतना गहरा राष्ट्रवाद।

जब बहस की जगह प्रचार ने ली संसद बनी चुनावी मंच

संसद को इस बार सत्ता ने चुनावी मंच में बदल दिया है। जिस बहस में प्रधानमंत्री ने लगभग एक घंटे का भाषण दिया, उसमें ‘वंदे मातरम्’ से ज्यादा कांग्रेस और नेहरू का जिक्र था। मोदी ने 13 बार कांग्रेस और 7 बार नेहरू का नाम लिया, जैसे संसद का उद्देश्य आज के मुद्दों पर नहीं, बल्कि अतीत की धूल झाड़कर राजनीतिक टकराव पैदा करना हो। मोदी ने कहा कि कांग्रेस वंदे मातरम् के मामले में मुस्लिम लीग के दबाव में झुक गई थी। यह आरोप नया नहीं, लेकिन इसे संसद में राष्ट्रगीत की वर्षगांठ के बहाने उठाकर उन्होंने एक तरह से यह संकेत दिया कि आने वाला समय भी इसी तरह के विवादों से भरा होगा।

इतिहास का नया संस्करण सरकारी आवश्यकताओं के अनुसार

प्रधानमंत्री ने कहा कि 1936 में जिन्ना ने वंदे मातरम् के खिलाफ अभियान चलाया और नेहरू कांग्रेस पर दबाव में आ गये। यह बात आधी सच्चाई है। पूरी सच्चाई यह है कि 1937 में कांग्रेस ने 11 में से 7 प्रांतों में सरकार बनाई। मुस्लिम लीग एक भी प्रांत नहीं जीत सकी। दूसरी ओर उसी समय सावरकर की हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग से गठबंधन कर तीन राज्यों में संयुक्त सरकारें चलाईं। लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण में इन तथ्यों को जगह नहीं मिली। शायद इसलिए, क्योंकि यह कहानी ‘राष्ट्रवादी नैरेटिव’ में फिट नहीं होती। मोदी ने यह भी नहीं बताया कि देश के स्वतंत्र होने के बाद वंदे मातरम् का प्रथम गायन 15 अगस्त 1947 की आधी रात संविधान सभा में सुचेता कृपलानी द्वारा गया गया था और यह निर्णय भी उसी कांग्रेस सरकार का था, जिसके खिलाफ आज कथित राष्ट्रवाद के नाम पर बहस छेड़ी जा रही है।

संविधान को घेरने की तैयारी

सत्ता का असली टारगेट केवल कांग्रेस नहीं है।
असल लक्ष्य है संविधान की वह शक्ति जो जनता को सरकार के खिलाफ खड़े होने का साहस देती है। यह वही संविधान है जिसकी बदौलत किसानों ने साल भर आंदोलन कर कृषि कानून वापस करवाया, संचार साथी ऐप वापस हुआ, वक्फ संशोधन बिल को समिति के पास भेजा गया, कई बड़े सरकारी फैसलों पर सरकार को बैकफुट पर जाना पड़ा। मोदी सरकार के लिए यह असहज स्थिति है कि बहुमत होने के बावजूद जनता के प्रतिरोध से उसे कदम पीछे खींचने पड़े। इसलिए सत्ता अब ऐसे मुद्दे ढूंढ रही है जिनमें बहस जनता नहीं, भावनाएं तय करें। वंदे मातरम् का विवाद उसी प्रयोगशाला में तैयार हुआ एक और नमूना है।

बंगाल इस कहानी का छिपा हुआ मुख्य पात्र

भारत की संसद में हुई दो दिन की यह भावनात्मक राजनीति दरअसल बंगाल चुनाव का ट्रेलर है। भाजपा को बंगाल में लगातार हार मिल रही है। बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा, हुमायूं कबीर का बयान, बाबरी का विवाद, और अब वंदे मातरम् सभी मुद्दों का एक ही आखिरी पड़ाव है चुनाव में ध्रुवीकरण। पहले मोदी ने सुभाषचंद्र बोस को भुनाने की कोशिश की नतीजा कुछ नहीं। फिर टैगोर की तरह दाढ़ी बढ़ाई बंगाल ने स्वीकार नहीं किया। अब बारी बंगाल की आत्मा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और उनके गीत को ‘राजनीतिक हथियार’ बनाने की है।

संसद को नाटकशाला बनने से कौन रोकेगा

विपक्ष का आरोप है कि सरकार संसद को बहस का मंच नहीं, बल्कि एक भावनात्मक ब्लैकमेल सेंटर बना चुकी है। मुद्दों पर बात बंद, इतिहास पर झगड़े चालू। क्या संसद अब राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान, राष्ट्रवाद और प्रतीकों के विवादों का अखाड़ा बन जाएगी? क्या देश की असल समस्याओं पर अब कोई चर्चा होगी? क्या जनता बेरोजगारी और महंगाई झेले और सरकार राष्ट्रवाद का शोर मचा कर तालियां बटोरे?

देश के लिए खतरे की शुरुआत

इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा डर यही है कि यह केवल शुरुआत है। मोदी सरकार जिस तरह इतिहास और भावनाओं का उपयोग करके असली मुद्दों को किनारे कर रही है, उससे आगे चलकर राजनीतिक टकराव बढ़ेगा, सामाजिक तनाव बढ़ेगा और संविधान पर दबाव भी। यह बहस वंदे मातरम् की नहीं है, यह बहस लोकतंत्र बनाम भावनात्मक तानाशाही की है। जब संसद में तथ्य हारने लगें और भावनाएं जीतने लगें, तब समझिए कि राजनीति एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है।

* शीतकालीन सत्र में असली मुद्दों से बचने की रणनीति।
* वंदे मातरम् बहस के पीछे छिपा राजनीतिक एजेंडा।
* पीएम के भाषण में कांग्रेस-नेहरू के बार-बार उल्लेख की मंशा।
* इतिहास का आधा सच, आधा प्रचार बनाकर पेश करने की प्रवृत्ति।
* संघ-हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की उपेक्षित ऐतिहासिक सच्चाई।
* संविधान की शक्ति से सरकार की असहजता और जनता का प्रतिरोध।
* बंगाल चुनाव को केंद्र में रखकर भावनात्मक मुद्दों का उपयोग।
* संसद को बहस के बजाय विभाजनकारी विमर्श का मंच बनाने की चिंता।
* विपक्ष के लिए भविष्य की चुनौती संविधान और लोकतंत्र की रक्षा।

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