देश-विदेश

मोदी जी का नोटबंदी-देशबंदी के बाद अब वोटबंदी का प्लान, बेहद गंदे आचरण का है ये इंसान

● मोदी जी का नोटबंदी-देशबंदी के बाद अब वोटबंदी का प्लान, बेहद गंदे आचरण का है ये इंसान

● लोकतंत्र की कतार में दम तोड़ता नागरिक

● फैसले अब कानून नहीं, आपदा बन चुके

● नोटबंदी से वोटबंदी तक नागरिक पर लगातार हमले की राजनीति

● लोकतंत्र में उलटी जवाबदेही राज्य शक करता है, नागरिक साबित करता है

● मतदाता सूची नहीं, बहिष्करण का औजार

● बीएलओ लोकतंत्र की चक्की में पिसता कर्मचारी

● सर्वेश सिंह की मौत सिस्टम की संवेदनहीनता का सबूत

● गरीब, प्रवासी और हाशिए पर खड़े लोग निशाने पर क्यों?

● नोटिफिकेशन से चलाया जा रहा देश, संसद सिर्फ दर्शक

 

अजय कुमार शुक्ला

भारत में अब सरकारी फैसले किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की तरह नहीं, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं की तरह गिरते हैं अचानक, बिना चेतावनी, बिना तैयारी और बिना मानवीय संवेदना के। जैसे भूकंप आता है और मलबे में लोग दब जाते हैं, वैसे ही अब एक रात में फैसले होते हैं और करोड़ों नागरिक अपनी जिंदगी के मलबे में फंस जाते हैं। 8 नवंबर 2016 की रात नोट बंदी आई। देश को बताया गया यह काला धन पर निर्णायक प्रहार है। लेकिन अगले ही दिन साफ़ हो गया कि यह प्रहार काला धन पर नहीं, आम आदमी की सांसों पर है। अस्पतालों के बाहर कतारें थीं, बैंकों के बाहर लाशें। शादी-ब्याह रुके, इलाज रुका, रोज कमाने वालों की रोजी रुकी। सरकार ने इसे ‘अस्थायी तकलीफ’ कहा, लेकिन जिन घरों से अर्थियां उठीं, उनके लिए यह स्थायी नुकसान था। मार्च 2020 की एक रात देशबंदी लागू हुई। कहा गया यह महामारी से बचाव है। लेकिन हकीकत यह थी कि देश को बंद कर दिया गया, बिना यह सोचे कि जिनके पास घर नहीं, वे कहां रुकेंगे। शहरों से गांवों तक सड़कों पर भूख, लाठियां और लाशें बिछ गईं। पैदल चलते मजदूर, दम तोड़ते बच्चे, इलाज न मिलने से मरते मरीज यह सब ‘लॉकडाउन सक्सेस स्टोरी’ के कोलाज में कहीं फिट नहीं बैठता था। अब 2025 में वही सिलसिला एक नए नाम के साथ सामने है वोटबंदी।

वोटबंदी प्रशासनिक प्रक्रिया या लोकतांत्रिक दंड?

वोटबंदी कोई आधिकारिक शब्द नहीं है, लेकिन जो हो रहा है, उसके लिए इससे सटीक शब्द शायद ही कोई और हो। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के नाम पर मतदाता सूची का जो ‘संशोधन’ किया जा रहा है, वह साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह नागरिक को कटघरे में खड़ा करने की कवायद है। देश के बारह राज्यों में नागरिकों से कहा जा रहा है कि वे साबित करें कि वे मतदाता हैं। वह भी 2003 की मतदाता सूची के आधार पर। सवाल यह नहीं है कि सूची अपडेट होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या 22 साल पुराने रिकॉर्ड से आज के नागरिक को परखा जाएगा? क्या सरकार और चुनाव आयोग द्वारा जारी की गई वोटर आईडी अब भरोसेमंद नहीं रही? क्या नागरिक हर चुनाव से पहले अपनी नागरिकता दोबारा साबित करेगा? यह प्रक्रिया उस बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांत को उलट देती है, जिसमें नागरिक को अधिकार मिलता है और राज्य जिम्मेदार होता है। यहां राज्य अविश्वास जता रहा है और नागरिक को आरोपी की तरह खुद को निर्दोष साबित करना पड़ रहा है।

मतदाता सूची नहीं, ‘शुद्धिकरण अभियान’

सरकार और चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची का पुनरीक्षण बता रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। यह मतदाता सूची का संशोधन नहीं, मतदाता का शुद्धिकरण अभियान बन चुका है। दस्तावेजों की लंबी सूची, जन्म प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण, माता-पिता के दस्तावेज, नाम, पता, उम्र की पूर्ण समानता और इन सबमें जरा-सी गड़बड़ी का मतलब नाम काटा जाएगा।भारत जैसे देश में आज भी करोड़ों लोगों के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है, जहां प्रवास एक मजबूरी है, झुग्गियों में रहने वाले हर दो साल में पता बदलते हैं वहां यह प्रक्रिया सीधा-सीधा बहिष्करण का औजार बन जाती है।

बीएलओ लोकतंत्र के सबसे थके हुए सिपाही

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे क्रूर पहलू हैइसका बोझ जिन पर डाला गया है। वो बूथ लेवल ऑफिसर अधिकतर स्कूल शिक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, निम्न श्रेणी के सरकारी कर्मचारी। एक बीएलओ पर हजारों मतदाताओं की जिम्मेदारी। अव्यवहारिक समय सीमा। दिन में ड्यूटी, रात में डाटा एंट्री और अगर लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो एफआईआर, विभागीय कार्रवाई, निलंबन की धमकी। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार से लगातार रिपोर्टें आ रही हैं कि बीएलओ मानसिक तनाव, बीमारियों और आत्महत्या के कगार पर पहुंच चुके हैं।

सर्वेश सिंह की मौत सिस्टम का पोस्टमार्टम

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के 46 वर्षीय शिक्षक सर्वेश सिंह की आत्महत्या कोई व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है। यह इस पूरी व्यवस्था का पोस्टमार्टम है। सर्वेश सिंह 20 दिनों से सोए नहीं थे। लगातार टास्क पूरे करने की कोशिश कर रहे थे। दबाव इतना कि वे अपनी बेटियों और मां से माफी मांगते हुए मरने को मजबूर हो गए। उनके सुसाइड नोट में कहीं भी व्यक्तिगत कारण नहीं, सिर्फ काम का दबाव है। लेकिन सिस्टम के लिए यह सिर्फ एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ है। क्योंकि सिस्टम यह मानने को तैयार नहीं कि वह इंसान था मशीन नहीं।

नागरिक भी कटघरे में

दूसरी तरफ नागरिक खासतौर पर गरीब, प्रवासी मजदूर, दलित, आदिवासी, बुजुर्ग और महिलाएं—अपने ही अस्तित्व को साबित करने की कतार में खड़े हैं। किसी का नाम थोड़ा अलग लिखा है, किसी की उम्र में अंतर है, किसी का पता बदल गया है, किसी के माता-पिता का नाम मेल नहीं खाता और हर गलती की एक ही सजा नाम कटेगा। यह वही देश है जिसने नोटबंदी में लोगों को अपने ही पैसे से दूर कर दिया।
यह वही देश है जिसने लॉकडाउन में लोगों को अपने ही घर से बेदखल कर दिया। अब वही देश लोगों को उनके वोट से वंचित करने की ओर बढ़ रहा है।

यह संयोग नहीं, क्रोनोलॉजी

सरकार इसे संयोग कहे, लेकिन पैटर्न साफ है पहले नॉटबंदी के बहाने पैसा छीना गया फिर लॉकडाउन के बहाने आवाजाही रोकी गई अब वोटबंदी के नाम।पर राजनीतिक अधिकार पर चोट है। हर बार कहा गया यह राष्ट्रहित में है। हर बार कीमत चुकाई सबसे कमजोर ने।

सुप्रीम कोर्ट बनाम चुनाव आयोग

तमिलनाडु से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि बीएलओ पर काम का दबाव कम किया जाए, कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए। यह एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप था। लेकिन चुनाव आयोग ने याचिका को ही ‘निराधार’ बता दिया। यह टकराव सिर्फ संस्थाओं के बीच नहीं है यह सत्ता के अहंकार और जमीनी हकीकत के बीच की लड़ाई है।

इतिहास खुद को दोहरा रहा

नोटबंदी में 100 से ज्यादा दर्ज मौतें, लॉकडाउन में लाखों अप्रत्यक्ष मौतें, अब वोटबंदी में मानसिक तनाव, आत्महत्या और बहिष्करण। हर बार कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं। हर बार सरकार की चुप्पी। नोटबंदी पर जस्टिस बी. वी. नागरत्ना की ऐतिहासिक असहमति याद की जानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि ऐसा फैसला संसद में कानून बनाकर होना चाहिए था, न कि एक नोटिफिकेशन से। आज वोटबंदी पर भी वही सवाल है कि क्या संसद सिर्फ मुहर लगाने की संस्था रह गई है?
लोकतंत्र का मंदिर खाली होता जा रहा है। देश नोटिफिकेशन से चलाया जा रहा है।

किसे बाहर किया जा रहा

यह सवाल सबसे अहम है। प्रवासी मजदूर, झुग्गी बस्तियों में रहने वाले, मुस्लिम, दलित, आदिवासी इलाके, बुजुर्ग और महिलाएं यानी वही तबका, जो पहले ही हाशिये पर है। सरकार नहीं सुनना चाहती सरकार इन सवालों से बच रही है। क्या वोट देना अब अधिकार नहीं, विशेषाधिकार है? क्या नागरिक को हर चुनाव में खुद को साबित करना होगा? क्या लोकतंत्र अब केवल ‘अनुकूल मतदाताओं’ का खेल बन गया है? यह लेख किसी एक नीति का विरोध नहीं है। यह उस शासन-शैली का प्रतिरोध है जिसमें जनता आंकड़ा है, नागरिक बाधा है और सवाल अपराध। अगर वोट देना साबित करने की चीज बन गया, तो अगला कदम सोचना साबित करना होगा। ‘फिर उसी बेवफा पर मरते हैं, फिर वही जिंदगी हमारी है’। लेकिन सवाल यही है कि
क्या हर बार मरना ही हमारी नियति है?

* नोटबंदी, लॉकडाउन और अब वोटबंदी — फैसलों की एक खतरनाक श्रृंखला
* हर बड़े निर्णय में नागरिक को तैयारी और भरोसे से वंचित किया गया
* वोटबंदी लोकतांत्रिक सुधार नहीं, नागरिक को संदेह के घेरे में खड़ा करने की प्रक्रिया
* 2003 की मतदाता सूची के आधार पर आज के मतदाता को परखने की अव्यवहारिक शर्त
* दस्तावेजी जाल में फंसाकर नाम काटने का खतरा
* बीएलओ पर असहनीय कार्यभार, मानसिक तनाव और दमन
* सर्वेश सिंह की आत्महत्या सिस्टम की क्रूरता का प्रतीक
* गरीब, प्रवासी, दलित, आदिवासी और महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित
* सुप्रीम कोर्ट के निर्देश बनाम चुनाव आयोग का अहंकारी रवैया
* लोकतंत्र अधिकार से विशेषाधिकार में बदलता हुआ
* देश कानून से नहीं, नोटिफिकेशन से चलाया जा रहा
* सवाल पूछना अपराध, चुप रहना नागरिक कर्तव्य बनता जा रहा

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