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टाटा से लेकर अडानी ग्रुप की लुटमलूट, मोदी सरकार में मिली है जमकर छूट

टाटा से अदानी मॉडल तक स्टील माफिया, मोदी सत्ता की चुप्पी और जनता से आठ साल की खुली लूट

● टाटा से लेकर अडानी ग्रुप की लुटमलूट, मोदी सरकार में मिली है जमकर छूट

● टाटा से अदानी मॉडल तक स्टील माफिया, मोदी सत्ता की चुप्पी और जनता से आठ साल की खुली लूट

● टाटा और उसके 25 चोर अब अदानी की राह पर
स्टील की सप्लाई रोकी, दाम बढ़ाए जनता को दोनों हाथों से लूटा

● प्रतिस्पर्धा आयोग ने 8 साल बाद खोली फाइल, गोदी मीडिया ने दबाई खबर

● सेल भी कटघरे में सरकारी कंपनी भी लूट में शामिल
मोदी राज में कार्टेल राज

● कंपनियों ने तय किए दाम, सरकार बनी मूकदर्शक

● इलेक्टोरल बॉन्ड का खेल? चंदा लेकर सोती रही सत्ता!

● सेबी भी सवालों के घेरे में शेयर बाजार का पहरेदार क्यों रहा अंधा?

● क्या जुर्माना देकर छूट जाएंगे लुटेरे, या होगी असली सजा?

 

ऋतिक मौर्य

भारत में जब भी टाटा का नाम लिया जाता है, तो उसके साथ नैतिकता, राष्ट्रवाद और भरोसे की एक आभा जोड़ दी जाती है। दशकों से टाटा समूह को ईमानदार पूंजीवाद का प्रतीक बनाकर पेश किया गया। लेकिन अब वही टाटा, अडानी मॉडल की राह पर चलते हुए जनता की जेब पर डाका डालने के आरोपों में घिर गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि अदानी के कारनामे विदेशी रिपोर्टों से उजागर हुए, जबकि टाटा और उसके साथियों की पोल भारत की अपनी संवैधानिक संस्था प्रतिस्पर्धा आयोग ने खोली है। यह कोई मामूली मामला नहीं है। यह स्टील जैसी बुनियादी वस्तु की कीमतों से जुड़ा अपराध है, जो मकान, पुल, सड़क, रेलवे, स्कूल, अस्पताल यानी आम आदमी की जिंदगी की रीढ़ है। इस स्टील के दाम अगर कृत्रिम तरीके से बढ़ाए जाएं, सप्लाई रोकी जाए और मुनाफे के लिए कार्टेल बनाकर बाजार को बंधक बनाया जाए, तो यह केवल व्यापारिक अपराध नहीं, बल्कि देश और जनता के खिलाफ आर्थिक साजिश है। यही वजह है कि प्रतिस्पर्धा आयोग ने साफ शब्दों में इसे जनता से गद्दारी की श्रेणी में रखा है। आरोप बेहद गंभीर हैं। टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू, जिंदल स्टील, सार्वजनिक क्षेत्र की स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) समेत 25 से अधिक कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने आपस में मिलीभगत कर स्टील की सप्लाई जानबूझकर रोकी, उत्पादन घटाया और फिर एक साथ दाम बढ़ाकर भारी मुनाफा कमाया। यह खेल कोई एक-दो महीने नहीं, बल्कि 2015 से लगातार आठ साल तक चलता रहा यानी पूरे मोदी युग में। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस खुली लूट के दौरान न तो केंद्र सरकार की नींद टूटी, न सेबी जागा और न ही गोदी मीडिया ने इसे मुद्दा बनाया। जैसे ही यह खबर सामने आई, अंबानी-अडानी समर्थित चैनलों ने इसे दबा दिया। हिंदी मीडिया ने तो मानो सामूहिक चुप्पी साध ली। ऐसा लगता है जैसे मीडिया की नसों में भी कॉरपोरेट का नमक दौड़ रहा हो। अब सवाल उठता है क्या यह चुप्पी महज संयोग है? या फिर इसके पीछे वही इलेक्टोरल बॉन्ड वाला खेल है, जिसमें कंपनियां सत्ता को चंदा देती हैं और बदले में सरकार आंख मूंद लेती है? अगर ऐसा है, तो यह केवल स्टील कंपनियों का अपराध नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक-सांस्थानिक मिलीभगत का मामला है। प्रतिस्पर्धा आयोग ने जब इन कंपनियों से पिछले आठ महीनों का पूरा लेखा-जोखा मांगा, तो सबकी बोलती बंद हो गई। एक भी कंपनी ने सार्वजनिक रूप से जवाब देना जरूरी नहीं समझा। यह चुप्पी खुद गवाही है।

भारत में स्टील केवल एक धातु नहीं, बल्कि आम आदमी के सपनों, जरूरतों और विकास की रीढ़ है। घर की छत से लेकर पुल, सड़क, रेलवे लाइन, स्कूल, अस्पताल और कारखानों तक हर जगह स्टील का इस्तेमाल होता है। ऐसे में स्टील की कीमतों से छेड़छाड़ करना सीधे-सीधे जनता की जेब पर डाका डालने के बराबर है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि यही काम देश की सबसे बड़ी और कथित रूप से “ईमानदार” कंपनियों ने संगठित तरीके से किया—और सरकार वर्षों तक आंख मूंदे बैठी रही। भारत के प्रतिस्पर्धा आयोग की जांच ने उस सच्चाई से पर्दा उठाया है, जिसे आठ साल तक दबाया गया। आयोग के अनुसार टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू, जिंदल स्टील एंड पावर, सरकारी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया समेत 25 से अधिक कंपनियों ने मिलकर एक कार्टेल बनाया। इस कार्टेल का मकसद साफ था। स्टील की सप्लाई को जानबूझकर सीमित करना, बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करना और फिर एक साथ दाम बढ़ाकर बेतहाशा मुनाफा कमाना।

2015 से शुरू हुई लूट, मोदी युग में परवान

जांच में सामने आया है कि यह खेल 2015 से लगातार चलता आ रहा है। यानी यह पूरा घोटाला उस दौर में पनपा, जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार थी और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के नाम पर कॉरपोरेट्स को खुली छूट दी जा रही थी। स्टील के दामों में बार-बार एक जैसी वृद्धि, एक ही समय पर लगभग सभी कंपनियों द्वारा कीमतें बढ़ाना और उत्पादन में अचानक कटौती, ये सभी संकेत साफ तौर पर मिलीभगत की ओर इशारा करते हैं।
इस दौरान आम लोग महंगे मकान, महंगे निर्माण और बढ़ती महंगाई की मार झेलते रहे, लेकिन न तो सरकार ने सवाल उठाए और न ही नियामक संस्थाओं ने समय पर कार्रवाई की।

सेल का नाम सबसे बड़ा नैतिक अपराध

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर और शर्मनाक तथ्य यह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया भी आरोपियों में शामिल है। एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी, जो जनता के टैक्स से चलती है, अगर निजी कंपनियों के साथ मिलकर कीमतें बढ़ाने और सप्लाई रोकने का खेल खेले तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि नैतिक पतन का प्रमाण है। यह सवाल अब टालने लायक नहीं रहा क्या सरकार खुद अपनी कंपनी के जरिए जनता को लूटने में साझेदार थी?

बिल्डरों की शिकायत से खुला मामला

यह घोटाला तब उजागर हुआ, जब 2021 में कुछ बिल्डरों ने अदालत में आपराधिक याचिका दायर की। उनका आरोप था कि स्टील निर्माता कंपनियों ने जान बूझकर सप्लाई रोकी, जिससे निर्माण कार्य ठप हो गए और लागत कई गुना बढ़ गई। इसी शिकायत के बाद प्रतिस्पर्धा आयोग हरकत में आया और कुछ कंपनियों पर छापे भी मारे गए। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि जांच के शुरुआती संकेत मिलने के बावजूद इस मामले को वर्षों तक ठंडे बस्ते में डाले रखा गया। अक्टूबर 2024 में आयोग ने कंपनियों से विस्तृत लेखा-जोखा मांगा, लेकिन उस वक्त भी गोदी मीडिया ने इस खबर को पूरी तरह दबा दिया।

विदेशी मीडिया ने खोली पोल, शेयर बाजार हिला

मंगलवार, 5 अक्टूबर को जब एक विदेशी मीडिया संस्थान ने इस खबर को उजागर किया, तब जाकर भारत में हलचल मची। खबर सामने आते ही आरोपी कंपनियों के शेयरों में 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट इस बात का सबूत थी कि बाजार को भी इस कार्टेल की भनक नहीं थी या फिर सब कुछ जानबूझकर छिपाया जा रहा था।

सेबी की भूमिका पर बड़ा सवाल

यहां एक और अहम सवाल उठता है सेबी आखिर कर क्या रहा था? शेयर बाजार की निगरानी करने वाली संस्था को इन कंपनियों के असामान्य व्यवहार, एकसाथ दाम बढ़ाने और मुनाफे में अचानक उछाल पर संदेह क्यों नहीं हुआ? क्या सेबी भी उसी तरह “सोई” रही, जैसे केंद्र सरकार?

इलेक्टोरल बॉन्ड और सत्ता-कॉरपोरेट गठजोड़

बाजार के जानकार और राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे मामले को इलेक्टोरल बॉन्ड से जोड़कर देख रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इन कंपनियों ने सत्ता को भारी चंदा देकर अपने खिलाफ कार्रवाई रुकवा दी? अगर ऐसा है, तो यह लोकतंत्र और बाजार दोनों के लिए घातक संकेत है। इसका मतलब यह होगा कि जनता की जेब कटती रही और सत्ता चंदा गिनती रही।

31 कंपनियों का नेटवर्क, 26 मैनेजर नामजद

प्रतिस्पर्धा आयोग के मुताबिक यह कार्टेल केवल 25 कंपनियों तक सीमित नहीं हो सकता। जांच में संकेत मिले हैं कि करीब 31 कंपनियां और 26 से अधिक शीर्ष अधिकारी इस खेल में शामिल हो सकते हैं। आयोग अब इन सभी के खिलाफ भारी जुर्माने की तैयारी कर रहा है और कंपनियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा।

केवल जुर्माना या असली सजा?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इतनी बड़ी लूट के बाद केवल जुर्माना लगाकर मामला खत्म कर दिया जाएगा? आठ साल तक देश की जनता से हजारों करोड़ की वसूली करने वालों को अगर सिर्फ आर्थिक दंड देकर छोड़ दिया गया, तो यह खुद न्याय व्यवस्था की हार होगी। यह मामला सिर्फ टाटा या स्टील कंपनियों का नहीं है। यह मोदी काल के कार्टेल कैपिटलिज्म का आईना है, जहां कॉरपोरेट्स सरकार के संरक्षण में जनता को लूटते रहे। अब वक्त आ गया है कि कार्टेल बनाने वालों पर आपराधिक मुकदमे चलें केवल कंपनियां नहीं, उनके सीईओ और मैनेजर भी जेल जाएं, इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए हुए लेन-देन की जांच हो, सेबी और संबंधित मंत्रालय की भूमिका की भी जवाबदेही तय हो
क्योंकि अगर जनता की लूट पर सिर्फ जुर्माना ही सजा है, तो यह देश में कानून नहीं, कॉरपोरेट राज होने का ऐलान होगा।

* टाटा स्टील समेत 25 से ज्यादा कंपनियों पर दाम तय करने का आरोप
* 2015 से जारी स्टील की संगठित लूट
* सप्लाई रोककर कृत्रिम महंगाई
* सेल जैसी सरकारी कंपनी भी आरोपी
* सेबी और सरकार की रहस्यमय चुप्पी
* इलेक्टोरल बॉन्ड से सत्ता कॉरपोरेट गठजोड़ का शक
* 31 कंपनियों और 26 मैनेजरों पर कार्रवाई की तैयारी
जुर्माना नहीं, आपराधिक सजा की मांग

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