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पूंजी का डिजिटल जाल, इंसानों के लिये बना जी का जंजाल

उत्पादन से बाहर हो रहा श्रम और मुनाफा निगल रहा है मनुष्य

● पूंजी का डिजिटल जाल, इंसानों के लिये बना जी का जंजाल

● उत्पादन से बाहर हो रहा श्रम और मुनाफा निगल रहा है मनुष्य

● सामंती बेड़ियां टूटीं, लेकिन शोषण और निर्मम हुआ
मुनाफा किसका, श्रम किसका?

● व्यापार मूल्य नहीं रचता, फिर भी मालिक क्यों बन बैठा?

● डिजिटल युग मशीनों ने नहीं, मनुष्यता ने नौकरी खोई, गिग इकॉनमी या असुरक्षा इकॉनमी?

● डेटा नया तेल या नया हथियार?

● सोशल मीडिया जहां उपभोक्ता नहीं, इंसान ही उत्पाद

● भविष्य का संकट पूंजी का राज, श्रम का विस्थापन

 

◆ (मनोज अभिज्ञान)

पूंजीवाद को अक्सर विकास, आधुनिकता और प्रगति के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कहा जाता है कि इस व्यवस्था ने सामंती जड़ता को तोड़ा, उद्योग लगाए, रोज़गार पैदा किया और दुनिया को आपस में जोड़ा। यह दावा आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं। क्योंकि जिस पूंजीवादी व्यवस्था ने उत्पादन को संगठित किया, उसी ने शोषण को भी संस्थागत बना दिया। सामंतवाद में शोषण खुला और क्रूर था, जबकि पूंजीवाद में वह कानूनी, संरचित और अदृश्य हो गया। अब जंजीरें लोहे की नहीं, अनुबंधों, बाजार और तकनीक की हैं। श्रमिक अब जमींदार का गुलाम नहीं, बल्कि ‘कर्मचारी’, ‘फ्रीलांसर’ या ‘गिग वर्कर’ है, नाम बदला है, हालत नहीं। पूंजीवाद की बुनियादी सच्चाई यही है कि उत्पादन का वास्तविक भार श्रमिक उठाता है, लेकिन लाभ पर अधिकार पूंजीपति का होता है। यह व्यवस्था श्रम और मुनाफे के बीच एक गहरी असमानता पर टिकी है। श्रमिक अपनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा खपाकर मूल्य पैदा करता है, जबकि पूंजीपति उस मूल्य को अपने स्वामित्व में बदल लेता है। इसे ही कार्ल मार्क्स ने अधिशेष मूल्य कहा वह अतिरिक्त मूल्य जो श्रमिक पैदा करता है लेकिन उसे मिलता नहीं। 21वीं सदी में यह शोषण और भी जटिल हो गया है। अब कारखानों की चिमनियां नहीं, बल्कि सर्वर, एल्गोरिदम और डेटा सेंटर इस व्यवस्था के प्रतीक हैं। श्रमिक की जगह मशीनें नहीं ले रहीं पूंजी श्रमिक को ही गैर जरूरी बना रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और प्लेटफॉर्म इकॉनमी ने एक ऐसा दौर पैदा किया है जहां काम तो है, लेकिन सुरक्षा नहीं, मेहनत है, लेकिन अधिकार नहीं। आज का श्रमिक अक्सर यह भी नहीं जानता कि वह किसके लिए काम कर रहा है। सोशल मीडिया पर सक्रिय उपयोगकर्ता, ऐप पर ऑर्डर डिलीवर करता युवक, ऑनलाइन कंटेंट बनाता क्रिएटर सब इस नए पूंजीवादी तंत्र के अदृश्य मजदूर हैं। वे ‘फ्री’ सेवाओं के बदले अपना डेटा, समय और रचनात्मकता सौंप रहे हैं, जबकि मुनाफा चंद कॉरपोरेट घरानों की तिजोरी में जा रहा है।

उत्पादन और श्रम असमानता की जड़

पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था का मूल विरोधाभास यही है कि जो उत्पादन करता है, वह मालिक नहीं होता और जो मालिक होता है, वह उत्पादन नहीं करता। श्रमिक दिनभर मशीन चलाता है, लेकिन मशीन की मालिकाना हक पूंजीपति की होती है। श्रमिक को उसकी मजदूरी मिल जाती है, लेकिन उसके श्रम से पैदा हुआ अतिरिक्त मूल्य मुनाफे में बदल जाता है। पूंजीवाद यह भ्रम पैदा करता है कि व्यापार ही सबसे बड़ा योगदान है। जबकि सच्चाई यह है कि व्यापार मूल्य पैदा नहीं करता, केवल उसका वितरण करता है। फिर भी व्यापारी समाज में सबसे शक्तिशाली वर्ग बन बैठा है। यह शक्ति श्रम से नहीं, नियंत्रण से आती है।

डिजिटल शोषण का नया चेहरा

गिग इकॉनमी में काम करने वाला श्रमिक न कर्मचारी है, न मालिक। उसके पास न स्थायित्व है, न बीमा, न भविष्य। ऐप जब चाहे उसे हटा सकता है। यह आजादी नहीं, अस्थिरता का नया नाम है। आज डेटा वही भूमिका निभा रहा है जो कभी जमीन और मशीन निभाती थीं। उपयोगकर्ता सोशल मीडिया पर जो कुछ करता है, वही उसका श्रम है लेकिन उसका कोई मेहनताना नहीं। कंपनियां इसी डेटा से अरबों कमाती हैं। एआई और ऑटोमेशन से पूंजी का केंद्रीकरण और तेज होगा। बेरोजगारी बढ़ेगी, असमानता गहराएगी और लोकतंत्र पर कॉरपोरेट का कब्जा और मजबूत होगा।

सामंतवाद से पूंजीवाद तक शोषण का केवल रूप बदला

इतिहास यह बताता है कि सत्ता और शोषण कभी खत्म नहीं होते, केवल अपना रूप बदलते हैं। सामंतवाद में शोषण खुला, क्रूर और प्रत्यक्ष था। जमींदार सामने खड़ा होता था और किसान उसके खेत में बंधुआ मजदूर की तरह काम करता था। पूंजीवाद ने इस व्यवस्था को तोड़ा, लेकिन शोषण को समाप्त नहीं किया। उसने शोषण को अधिक व्यवस्थित, कानूनी और अदृश्य बना दिया।
पूंजीवाद ने कहा अब कोई गुलाम नहीं होगा, सब स्वतंत्र होंगे। लेकिन यह स्वतंत्रता केवल कागजों में थी। असल में श्रमिक जमीन से हटाकर फैक्ट्री में खड़ा कर दिया गया। अब जमींदार की जगह मालिक था, हुक्म की जगह अनुबंध था और कोड़े की जगह भूख। पूंजीपति वर्ग ने उत्पादन के साधनों जमीन, मशीन, पूंजी और बाजार पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। यहीं से असमानता की असली कहानी शुरू होती है। उत्पादन सामूहिक है, लेकिन स्वामित्व निजी। श्रम सामूहिक है, लेकिन मुनाफा निजी।

उत्पादन, श्रम और अधिशेष मूल्य मुनाफे की असहज सच्चाई

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा झूठ यह है कि पूंजीपति रोजगार देता है। सच यह है कि श्रमिक अपने श्रम से पूंजीपति को मुनाफा देता है। अगर श्रमिक काम न करे, तो मशीनें लोहे का ढेर बनकर रह जाएं। कार्ल मार्क्स ने जिस अधिशेष मूल्य की अवधारणा को सामने रखा, वह पूंजीवाद की रीढ़ तोड़ने वाला सच है। श्रमिक जितना मूल्य पैदा करता है, उसे उसकी पूरी कीमत नहीं मिलती। उसे केवल इतनी मजदूरी दी जाती है, जिससे वह अगली सुबह फिर काम पर आ सके। शेष मूल्य जो श्रमिक की मेहनत से पैदा हुआ मुनाफे में बदलकर पूंजीपति की जेब में चला जाता है। यही शोषण व चोरी है, लेकिन कानूनन वैध।

व्यापार का भ्रम और मालिक बनने की राजनीति

पूंजीवाद ने व्यापार को मूल्य-निर्माण का पर्याय बना दिया। यह बताया गया कि जो बेचता है, वही असली उत्पादक है। जबकि सच्चाई यह है कि व्यापार मूल्य पैदा नहीं करता, वह केवल पहले से पैदा मूल्य का वितरण करता है। फिर सवाल उठता है अगर व्यापारी मूल्य नहीं बनाता, तो वह मालिक क्यों है? जिसके पास बाजार पर नियंत्रण है, वही मालिक है। जिसके पास उत्पादन पर नियंत्रण है, वही शासक है। छोटे उत्पादक, कारीगर और किसान इस व्यवस्था में सबसे पहले कुचले जाते हैं। बड़े कॉरपोरेट छूट, घाटा और प्रतिस्पर्धा के नाम पर उन्हें बाहर कर देते हैं। यह मुक्त बाजार नहीं, कॉरपोरेट तानाशाही है।

डिजिटल युग जब मशीनों से पहले मनुष्य बेकार हुआ

21वीं सदी में पूंजीवाद ने डिजिटल के रूप में नया चेहरा पहना, कहा कि तकनीक मानव को मुक्त करेगी। हकीकत यह है कि तकनीक ने पूंजी को और शक्तिशाली बना दिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और एल्गोरिदम का इस्तेमाल श्रमिक की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि उसकी निर्भरता ख़त्म करने के लिए किया जा रहा है। मशीनें श्रमिक की जगह नहीं ले रहीं—पूंजी श्रमिक को ही अप्रासंगिक बना रही है। जो श्रमिक बचे हैं, वे अस्थायी, डराए हुए और असुरक्षित हैं। जो हटाए गए हैं, वे बेरोजगार हैं।

गिग इकॉनमी आजादी या नया बंधन?

गिग इकॉनमी को स्वतंत्रता के रूप में प्रचारित किया गया। असल में यह स्थायित्व-विहीन गुलामी है। डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर, फ्रीलांसर, कंटेंट क्रिएटर ये सब नए युग के मजदूर हैं। इनके पास न पीएफ है, न बीमा, न छुट्टी, न भविष्य। ऐप जब चाहे इन्हें बाहर कर सकता है। यह श्रमिक नहीं, डेटा-आधारित दास हैं।

डेटा नया तेल या नया औपनिवेशिक हथियार

आज डेटा को नया तेल कहा जाता है। लेकिन यह तेल जनता का है और मुनाफा चंद कंपनियों का। गूगल, फेसबुक, अमेजन जैसी कंपनियां केवल सेवाएं नहीं देतीं वे व्यवहार, सोच और आदतें इकट्ठा करती हैं। उपयोगकर्ता जितना समय स्क्रीन पर बिताता है, उतना ही वह कंपनी के लिए बिना मजदूरी के श्रम करता है। यह शोषण नहीं तो और क्या है? सोशल मीडिया जहां उपयोगकर्ता ही उत्पाद है, सोशल मीडिया में उपभोक्ता भ्रम है। असल में मनुष्य ही उत्पाद है, हर पोस्ट, हर लाइक, हर कमेंट डेटा है और यह डेटा बिकता है। लोग समझते हैं कि वे मुफ्त प्लेटफॉर्म इस्तेमाल कर रहे हैं।
असल में वे अपनी निजता, समय और चेतना गिरवी रख चुके हैं।

एआई और भविष्य पूंजी का राज, श्रम का अंत?

आने वाला समय और खतरनाक है। एआई निर्णय लेगा, एल्गोरिदम तय करेगा और पूंजी मालिक निर्देश देगा। लोकतंत्र, श्रम अधिकार और सामाजिक सुरक्षा सब खतरे में हैं। अगर उत्पादन से मनुष्य हट गया, तो सवाल है वह जिएगा कैसे? नया विकल्प या स्थायी अंधकार
यह व्यवस्था खुद को सुधार नहीं सकती। पूंजीवाद मानवीय नहीं हो सकता। जरूरत है मजबूत श्रम कानूनों की, डिजिटल अधिकारों की, डेटा पर जनता के स्वामित्व की और सबसे जरूरी एक वैकल्पिक आर्थिक दृष्टि कि वरना यह डिजिटल पूंजीवाद मनुष्य को इतिहास का सबसे सस्ता, सबसे असुरक्षित और सबसे खामोश मजदूर बना देगा।

* पूंजीवाद ने शोषण को कानूनी जामा पहनाया
* डिजिटल युग में श्रमिक अदृश्य हो गया
* गिग इकॉनमी सुरक्षा नहीं, असुरक्षा है
* सोशल मीडिया में उपयोगकर्ता ही उत्पाद है
* डेटा नया हथियार बन चुका है
* एआई से पूंजी मजबूत, श्रम कमजोर
* श्रम कानून तकनीक के सामने बौने
* नया आर्थिक विकल्प अब अनिवार्य

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