मोदी जी ने ट्रम्प को तरेरी आंख, भारत की बचाई साख
डॉलर के दबाव से मुक्त होने की दिशा में भारत का निर्णायक कदम

● मोदी जी ने ट्रम्प को तरेरी आंख, भारत की बचाई साख
● डॉलर के दबाव से मुक्त होने की दिशा में भारत का निर्णायक कदम
● अमेरिकी खजाने में हिस्सेदारी घटाकर भारत ने दिखाई आर्थिक आत्मनिर्भरता
● बॉन्ड से सोने की ओर शिफ्ट रिजर्व बैंक की रणनीतिक चाल
● ट्रंप टैरिफ और प्रतिबंधों के बीच भारत का सधा हुआ जवाब
● डॉलर निर्भरता घटेगी, रुपये को मिलेगी मजबूती
● ब्रिक्स धुरी पर तेज होती डि-डॉलराइजेशन की राजनीति
● वैश्विक बाजार में सोने की बढ़ती भूमिका और भारत का लाभ
● अमेरिकी कर्ज संकट और वर्चस्व की लड़खड़ाती नींव
● भविष्य का संकेत बहु-मुद्रा विश्व की ओर बढ़ता भार
◆ अंशिका मौर्या
मुंबई। वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते समीकरणों के बीच भारत ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसे केवल वित्तीय निर्णय कहकर सीमित नहीं किया जा सकता। यह कदम दरअसल उस रणनीतिक सोच का परिचायक है, जिसमें राष्ट्रीय हित, आर्थिक सुरक्षा और राजनीतिक स्वायत्तता एक साथ जुड़ते हैं। अमेरिकी फेडरल बैंक और अमेरिकी वित्त मंत्रालय के हालिया आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि भारत ने अमेरिकी खजाने में अपनी हिस्सेदारी में लगभग 51 अरब डॉलर की कटौती की है और इसके बदले अपने स्वर्ण भंडार को मजबूत किया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों में तल्खी बढ़ी है। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद टैरिफ, प्रतिबंध और अमेरिका फर्स्ट की नीति ने विकासशील देशों पर दबाव बढ़ाया है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। रूस से तेल खरीद, व्यापार समझौते पर मतभेद और क्षेत्रीय राजनीति में पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी रुख इन सभी ने द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव पैदा किया। भारत का अमेरिकी बॉन्ड बेचना और सोना खरीदना केवल निवेश का पुनर्संतुलन नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे के टूटने का संकेत है, जो दशकों से डॉलर और अमेरिकी वित्तीय प्रणाली पर टिका था। अक्टूबर 2024 में अमेरिकी खजाने में भारत का निवेश जहां 241 अरब डॉलर था, वहीं अक्टूबर 2025 तक यह घटकर 190.7 अरब डॉलर रह गया। चार साल में पहली बार इतनी बड़ी कटौती ने वैश्विक बाजार का ध्यान खींचा है। सोने की ओर यह झुकाव ऐसे दौर में हो रहा है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में पीली धातु ने रिकॉर्ड ऊंचाई छुई है। जहां अमेरिकी बॉन्ड से औसतन 4 से 4.5 प्रतिशत का रिटर्न मिला, वहीं सोने ने चार गुना तक मुनाफा दिया। यही वजह है कि रिजर्व बैंक ने जोखिम और लाभ के संतुलन को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव किया। इस कदम का व्यापक अर्थ यह भी है कि भारत अब अपनी आर्थिक नीतियों को अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसलों से कम से कम प्रभावित होने देना चाहता है। ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव, डॉलर की मजबूती या कमजोरी इन सबका सीधा असर भारतीय बाजार, रुपये की कीमत और निवेशकों के भरोसे पर पड़ता रहा है। अब सोने का मजबूत भंडार इन झटकों को सहने की क्षमता बढ़ाएगा।
अमेरिकी खजाने से दूरी भरोसे की दरार या रणनीतिक समझदारी
अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड दशकों तक दुनिया के सबसे सुरक्षित निवेश माने जाते रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश ने भी अपने विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा इन्हीं बॉन्ड्स में लगाया, ताकि डॉलर की स्थिरता के साथ-साथ नियमित ब्याज आय मिलती रहे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में अमेरिका की आंतरिक आर्थिक स्थिति, बेलगाम सरकारी खर्च और रिकॉर्ड कर्ज ने इस ‘सुरक्षित निवेश’ की धारणा को कमजोर किया है। 38 खरब डॉलर से अधिक के सार्वजनिक कर्ज के बोझ तले दबा अमेरिका अब अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए टैरिफ, प्रतिबंध और दबाव की राजनीति अपना रहा है। भारत द्वारा 51 अरब डॉलर की हिस्सेदारी घटाना इसी बदलते परिदृश्य का परिणाम है। यह फैसला अचानक नहीं, बल्कि कई महीनों से चल रहे आकलन और वैश्विक संकेतों का नतीजा है।
ट्रंप फैक्टर व्यापार से लेकर भूराजनीति तक
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और आक्रामक हो गई है। रूस से कच्चा तेल खरीदने पर भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाना, व्यापार समझौते में भारत को कठघरे में खड़ा करना और पाकिस्तान को रणनीतिक तवज्जो देना। इन सबने भारत-अमेरिका संबंधों में अविश्वास की खाई गहरी की। अमेरिकी संसद में और प्रतिबंधों के बिल की तैयारी ने भी भारत को यह संकेत दिया कि भविष्य में आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक का अमेरिकी बॉन्ड से दूरी बनाना एक रक्षात्मक नहीं, बल्कि पूर्व-सक्रिय रणनीति मानी जा रही है।
बॉन्ड बेचकर सोना खरीदना क्या है आर्थिक संदेश
अमेरिकी बॉन्ड से भारत को औसतन 4 से 4.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिला है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों ने बीते एक दशक में कहीं ज्यादा रिटर्न दिया है। हालिया भू-राजनीतिक तनावों, युद्धों और मुद्रा संकटों के बीच सोना एक बार फिर ‘अल्टीमेट सेफ हेवन’ बनकर उभरा है। भारत ने अमेरिकी खजाने से निकाले गए धन को सोने में निवेश कर यह साफ संदेश दिया है कि वह अपने भंडार को ऐसी संपत्ति में बदलना चाहता है, जो किसी एक देश की नीतियों पर निर्भर न हो।
मजबूत होता स्वर्ण भंडार, मजबूत होता रुपया
भारत के पास अब लगभग 880 मीट्रिक टन सोना है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। अधिक स्वर्ण भंडार का अर्थ है। मुद्रास्फीति के झटकों से बेहतर मुकाबला, रुपये के अवमूल्यन पर नियंत्रण और वैश्विक संकट में स्थिरता। बीते वर्षों में डॉलर की मजबूती ने रुपये को 90 के स्तर तक कमजोर किया। सोने में बढ़ा निवेश ऐसे दबावों को संतुलित करने में मददगार साबित हो सकता है।
शेयर बाजार और विदेशी निवेश पर असर
डॉलर और अमेरिकी ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर पड़ता है। निफ्टी की शीर्ष 100 कंपनियों का मार्केट कैप कई बार केवल अमेरिकी फेड के संकेतों से हिल गया। डॉलर निर्भरता घटने से भारतीय बाजार अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर और स्थिर बन सकता है। इसके साथ ही मजबूत स्वर्ण और विदेशी मुद्रा भंडार विदेशी निवेशकों के लिए भरोसे का संकेत देता है, जिससे दीर्घकालिक निवेश आकर्षित हो सकता है।
ब्रिक्स की सामूहिक चाल
भारत अकेला नहीं है। चीन, रूस और ब्राजील जैसे ब्रिक्स देशों ने भी अमेरिकी खजाने में अपनी हिस्सेदारी घटाई है। केवल अक्टूबर में ही ब्रिक्स देशों ने 50 अरब डॉलर के अमेरिकी बॉन्ड बेचे। 2024-25 में यह आंकड़ा 200 अरब डॉलर के पार पहुंच गया। इन देशों ने आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं और युआन को बढ़ावा देकर डॉलर के वर्चस्व को चुनौती दी है। इसका नतीजा यह हुआ कि वैश्विक मुद्रा बाजार में डॉलर की हिस्सेदारी घटकर 42 प्रतिशत पर आ गई है।
क्या भारत युआन या रुपये में व्यापार की ओर बढ़ेगा
फिलहाल भारत संतुलन की नीति पर चल रहा है। न वह डॉलर को तुरंत छोड़ रहा है, न ही किसी एक वैकल्पिक मुद्रा पर पूरी तरह निर्भर हो रहा है। लेकिन मजबूत सोना भंडार भविष्य में रुपये या अन्य मुद्राओं में व्यापार की राह आसान बना सकता है।
अमेरिका की चिंता क्यों बढ़ी
डॉलर की बादशाहत अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत रही है। जैसे-जैसे देश डॉलर से दूरी बना रहे हैं, अमेरिका की आर्थिक पकड़ कमजोर हो रही है। यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन इस प्रक्रिया से घबराया हुआ है और दबाव की नीति अपना रहा है। भारत का कदम साफ संकेत देता है कि अब आर्थिक नीतियां किसी एक महाशक्ति की मर्जी पर नहीं चलेंगी। यह आत्मनिर्भर भारत की उस सोच का विस्तार है, जिसमें रणनीतिक स्वायत्तता सर्वोपरि है।
* भारत ने अमेरिकी खजाने से 51 अरब डॉलर की हिस्सेदारी घटाई
* सोने में निवेश बढ़ाकर स्वर्ण भंडार मजबूत किया
* डॉलर निर्भरता कम करने की रणनीति
* ब्रिक्स देशों के साथ तालमेल
* अमेरिकी टैरिफ का शांत लेकिन असरदार जवाब




