ट्रम्प के आगे मोदी एक बार पुनः “सरेंडर”,भारत की इज्जत का निकाल दिया “कचूमर”
ये कैसी डील? पूरी इकनॉमी ही अमेरिका को गिरवी रख दी, न खेती बची और न व्यापार- सब बंटाधार

– अब रूस के बजाय अमेरिका और वेनेजुएला से भारत को तेल खरीदना होगा
– अगले 5 साल तक सालाना 100 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने की मजबूरी
– भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलने का किया वादा
– भारत में अमेरिकी सामानों पर टैरिफ नहीं लगेगा, लेकिन अमेरिका हमारे सामानों पर 18% टैरिफ लगाएगा
– अमेरिका से आएंगे सोयाबीन तेल, पशुचारा और फल-सब्जियां
– जीडीपी का छठवां हिस्सा अमेरिका के हवाले, ट्रंप सरकार खुश

नई दिल्ली। जिसका अंदेशा था, वही हुआ। शनिवार सुबह अमेरिकी राष्ट्रपति भवन, यानी व्हाइट हाउस ने भारत के साथ ट्रेड डील का अंतरिम ढांचा जारी कर दिया। इससे पहले, भारतीय विदेश मंत्रालय बड़ी शान से यह कह रहा था कि भारत डील को लेकर अमेरिका के सामने नहीं झुका है और तेल खरीदी के मामले में भारत की सार्वभौमिकता कायम है।
लेकिन ट्रेड डील का ऐलान करते हुए अमेरिका ने साफ कर दिया कि उसने इसी शर्त पर डील को मंजूरी दी है कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा। इसका सीधा मतलब हुआ कि भारत की अपने ईंधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए सस्ता विकल्प ढूंढ़ने की आजादी छिन गई है। बड़ी बात यह है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुए सीजफायर की तरह इस बात का ऐलान भी पहले अमेरिका ने ही किया। इससे यह भी साफ हो चुका है कि चाहे पाकिस्तान से लड़ाई हो या फिर तेल की खरीद किससे करें, यह चुनना हो, सारी शर्तें अमेरिका तय कर रहा है। यानी भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था अमेरिका को गिरवी रख दी है और अब जो अमेरिका कहेगा, वही भारत को मानना पड़ेगा।


सोयाबीन तेल से लेकर फल-सब्जियों तक, सब अमेरिकी होंगे
व्हाइट हाउस के संचार विभाग की ओर से सभी पत्रकारों को भेजे गए ईमेल में सबसे पहली बात यही कही गई है कि रूस से तेल न खरीदने की शर्त पर अमेरिका ने भारत पर लगाए 25% अतिरिक्त टैरिफ को खत्म कर दिया है। इसके साथ ही भारत पर पहले लगाए गए 25% टैरिफ को घटाकर 18% करने का ऐलान किया गया है, जो कि अमेरिका में भेजे गए भारतीय सामानों पर लगेगा। इसके बदले में भारत अमेरिका के सभी औद्योगिक सामानों और कृषि उत्पादों और खाद्य पदार्थों में टैरिफ को खत्म करेगा, या उसे समयबद्ध तरीके से कम करेगा। यानी भारत में अमेरिकी कृषि और औद्योगिक उत्पादों पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा। अमेरिकी कृषि उत्पादों के रूप में दोनों देशों के संयुक्त साझा बयान में अमेरिकी शराब कारखानों से शराब बनाने के बाद बचा हुआ अनाज- जो कि पशु चारे के रूप में इस्तेमाल होता है, पशुचारे के रूप में उपयोग आने वाला लाल ज्वार , बादाम, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन का तेल और वाइल और स्पिरिट और कुछ अन्य का ही नाम लिया गया है। यानी भारत को अब मलेशिया और पूर्वी एशियाई देशों से पाम ऑयल मंगाने की अनुमति नहीं होगी। अमेरिका का यह शर्त भारत की सुप्रभुता पर एक और हमला है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने शनिवार सुबह जारी एक बयान में इस डील को मेक इन इंडिया कार्यक्रम की मजबूती में एक मील का पत्थर माना है।
500 बिलियन डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने होंगे
डील के तहत भारत को अगले 5 साल में 500 बिलियन डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने होंगे। भारत इस समय करीब 40 बिलियन डॉलर के अमेरिकी उत्पाद मंगाता है। इसका मतलब यह है कि अगले पांच साल में भारत को अमेरिका से 11 गुना आयात बढ़ाना होगा। यह भारत के 450 बिलियन डॉलर के सकल विदेशी आयात से भी अधिक है। इसके दो खतरनाक परिणाम होंगे- पहला तो यह कि इससे भारत का व्यापार घाटा आसमान छूने लगेगा और दूसरा यह कि भारत की मुद्रा, यानी रुपया और कमजोर हो जाएगा। भारत और अमेरिका का व्यापार संतुलन अभी भारत के पक्ष में है। अमेरिका ने बयान में कहा है कि वह अपने 30 ट्रलियन डॉलर के बाजार को भारतीय उत्पादों के लिए पूरी तरह से खोल देगा, लेकिन भारत के उत्पादों पर वह 18% टैरिफ लगाएगा। दोनों देशों ने यह भी कहा है कि वे कुछ चुने हुए क्षेत्रों में अपने-अपने नियमों पर चर्चा करेंगे, ताकि इनका पालन करना आसान हो सके। अगर भविष्य में कोई देश तय टैरिफ में कोई बदलाव करता है, तो दूसरा देश भी अपने वादों में संशोधन कर सकता है। अमेरिका और भारत ने पूर्ण व्यापार समझौते की बातचीत के जरिए बाजार पहुंच को और बढ़ाने का फैसला किया है। अमेरिका ने भारत की मांग को ध्यान में रखते हुए कहा है कि वह व्यापार समझौते की बातचीत के दौरान भारतीय सामानों पर अपने टैरिफ कम करने की दिशा में काम करेगा।
अमेरिका से क्या खरीदेगा भारत
डील के तहत भारत को अगले 5 साल में अमेरिका से कई सामानों को खरीदना होगा। इनमें प्रमुख हैं- एनर्जी प्रोडक्ट, विमान और विमान के पार्ट्स, कीमती धातुएं, टेक्नॉलाजी प्रोडक्ट, कुकिंग कोल। इस तरह भारत को अमेरिका से अपना आयात सालाना करीब 100 बिलियन डॉलर की दर से बढ़ाना होगा। इसमें सबसे प्रमुख है अमेरिकी तेल और गैस। भारत को अब रूस की बजाय अमेरिका और उसके पिट्ठू देश वेनेजुएला से तेल खरीदना होगा। भारत की सालाना तेल की खपत करीब 250 मिलियन टन है, जिसका 85% हिस्सा भारत विदेशों से मंगवाता है। अभी तक भारत अपने इस आयात का सस्ता और सुलभ विकल्प तलाशता था। लेकिन अब अमेरिका ने भारत के हाथ बांध दिए हैं, जिससे मजबूरन हमें अमेरिका और वेनेजुएला से महंगा तेल खरीदना पड़ेगा। अमेरिका ने भारत को यह धमकी भी दी है कि अगर उसने रूस से फिर तेल खरीदा तो वह दोबारा टैरिफ लगाएगा। ऐसे में भारत को अपने तेल आयात पर खर्च होने वाले 161 अरब डॉलर का बड़ा हिस्सा अमेरिका में झोंकना ही पड़ेगा। इसके सिवा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है। अगर भारत वेनेजुएला की जगह अरब देशों से तेल खरीदता है तो भी भारत को खरीद का ज्यादातर तेल अमेरिका से ही लेना होगा, ताकि सालाना 100 अरब डॉलर के निवेश को सुरक्षित रखा जा सके।
अमेरिकी किसानों के लिए भारत अपने बाजार खोलेगा
डील को पूरा करने में अहम भूमिका निभाने वाले अमेरिकी वार्ताकारों का कहना है कि भारत ने अमेरिकी किसानों के लिए अपने बाजार को पूरी तरह खोलने का वादा किया है। यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव ने शुक्रवार देर रात (भारतीय समयानुसार शनिवार को) जारी एक बयान में कहा है कि भारत ने कई प्रमुख अमेरिकी कृषि उत्पादों को अपने बाजार में शून्य फीसदी टैरिफ के साथ जगह देने का वादा किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि डील के अंतरिम ढांचे में जिन अमेरिकी कृषि उत्पादों का जिक्र है, उसकी फेहरिस्त कहीं लंबी है। भारत और अमेरिका के बीच बीते 4 महीने से जारी बातचीत इसलिए अटकी हुई थी, क्योंकि भारत अपने बाजार में अमेरिकी सोयाबीन, जीएम मक्का जैसे उत्पादों को आने नहीं देना चाहता था। लेकिन अब यह मालूम होता है कि भारत ने दबाव में आकर इन उत्पादों को मंगाने पर भी हां कर दी है।
अमेरिकी विमान कंपनियों की चांदी
अंतरिम ढांचे में यह भी कहा गया है कि भारत को अमेरिकी विमानों का शुल्क मुक्त आयात करने की छूट मिलेगी। इस घोषणा से अमेरिकी विमान कंपनियों की चांदी हो जाएगी, जो इस समय चीन और रूस की विमान कंपनियों से कड़े मुकाबले का सामना कर रही हैं। भारत ने अमेरिकी विमान कंपनी बोइंग से 88 विमानों के आयात करने का फैसला किया है। करीब 80 बिलियन डॉलर के इस सौदे को डील के बाद जल्दी ही हरी झंडी मिलने की उम्मीद है। अमेरिका ने भारत को विमानों के कल-पुर्जों में भी शुल्क मुक्त निर्यात का ऐलान किया है।
अगले 5 साल में भारत की 1/6 जीडीपी अमेरिका की होगी
अमेरिका से ट्रेड डील के तहत भारत को अगले 5 साल में अपना आयात 500 अरब डॉलर तक बढ़ाना है। इसका मतलब है कि पांच साल बाद भारत की जीडीपी का छठा हिस्सा अमेरिका का होगा। यह चौंकाने वाला आंकड़ा इसलिए है, क्योंकि भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अमेरिका के आगे गिरवी रख दिया है। भारत में अमेरिकी सामानों पर अभी 13% टैरिफ लगता है, जिसे 0% करना होगा। वहीं, अमेरिका में भारतीय सामानों पर 18% टैरिफ लगेगा। यानी हर एक डॉलर के अमेरिकी सामान पर भारत को 18 रुपए गंवाना होगा। अगर डॉलर का भाव मौजूदा स्तर, यानी 90 रुपए मान लें तो भारत को 72 रुपए का नुकसान है। डॉलर के रेट और बढ़ने की सूरत में हमारा नुकसान और ज्यादा होगा। अभी मेडिकल उपकरणों, कंप्यूटर और इससे जुड़ी सामग्री, दवाआं और भारत में अमेरिकी सामानों की पहुंच में बाधक नीतियों को और सरल बनाने पर बातचीत चल रही है। इसी तरह भारत से अमेरिका को भेजी जाने वाली सूचना तकनीक की सेवाओं और आईटी सेक्टर को लेकर ट्रेड डील पर अभी भी बातचीत चल रही है। अभी यह तय नहीं है कि अमेरिका इन पर किस तरह का टैरिफ लगाएगा।
गोयल ने डील का समर्थन किया
भारतीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भारत और अमेरिका के बीच का समर्थन करते हुए कहा कि भारत ने अपने कृषि और डेयरी सेक्टर को पूरी तरह सुरक्षित रखा है। भारत ने मक्का, गेहूं, चावल, सोया, पोल्ट्री, दूध, पनीर, एथेनॉल (ईंधन), तंबाकू, कुछ सब्जियों और मांस जैसे कृषि और डेयरी उत्पादों को पूरी तरह संरक्षित रखा है। इन उत्पादों पर अमेरिका को कोई टैरिफ रियायत नहीं दी गई है। उन्होंने कहा कि यह फैसला किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। हालांकि, गोयल यह बात छिपा गए कि डील में दोनों देशों को टैरिफ में वस्तुओं के आधार पर बदलाव करने की छूट भी मिली हुई है। अब जिस तरह से अमेरिका ने अपनी शर्तों पर भारत से डील पर जबर्दस्ती हस्ताक्षर करवाए हैं, उसी तरह वे आगे चलकर अगर भारत को अपने सभी कृषि उत्पादों को बाजार में लाने की अनुमति देने का दबाव बनाते हैं तो क्या होगा ?




