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मोदी के संरक्षण में 54 हजार करोड़ का घोटाला, न खाऊंगा न खाने दूंगा के नारे का निकल गया दिवाला

मोदी सरकार के 15 मंत्रालयों में 54 हजार करोड़ रुपए से अधिक का घोटाला, संसद में CAG की रिपोर्ट में सवाल- अफसरों ने यह क्या कर डाला?

* सरकार से जारी हुए फंड में 54282 करोड़ रुपए का कोई हिसाब-किताब नहीं
* न उपयोगिता प्रमाण पत्र और न इसका सबूत कि पैसा ठीक से खर्च हुआ
* बीते 3 साल से 32 हजार करोड़ रुपए से अधिक का यूसी केंद्र के पास नहीं
* नियमों के अनुसार 12 महीने में देना पड़ता है यूसी, वरना होता है गबन का अंदेशा
* क्या जमीन निगल गई या अफसर खा गए- सरकार में कौन देगा इसका जवाब?

नई दिल्ली। रोजाना 18 घंटे काम करने वाली केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार भारत की गरीब जनता का 54 हजार करोड़ रुपए खा गई। भारत सरकार के ही महालेखाकार नियंत्रक ने मार्च 2025 की अपनी वित्तीय ऑडिट रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, 54 हजार करोड़ रुपए की इतनी बड़ी रकम का सरकार के पास कोई हिसाब नहीं है कि ये पैसे गए कहां और कैसे खर्च हुए।

संसद के पटल पर रखी गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने 54 हजार करोड़ रुपए की रकम का उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं दिया है। इससे देश में लेखा संबंधी मामलों में पारदर्शिता और गंभीरता की साफ कमी नजर आती है। सीएजी का यह भी कहना है कि इससे यह भी पता चलता है कि केंद्र सरकार के अधिकारी अपने बही-खातों के रखरखाव की तरफ कितने गंभीर हैं।

आखिर कहां गए 54282 करोड़?

सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह पैसा केंद्र सरकार के 15 मंत्रालयों और विभागों का है, जिन्हें मिले अनुदान के आधार पर 54282 करोड़ रुपए के खर्च का उपयोगिता प्रमाण पत्र देना था। लेकिन 31 मार्च 2025 की तारीख तक सीएजी को 33973 उपयोगिता प्रमाण पत्र प्राप्त हुए, जिसमें यह पैसा बकाया दिखा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, वहीं 38287 करोड़ रुपया बीते तीन वित्त वर्ष से लंबित है। इसका मतलब है कि इस पैसे के एवज में भी बीते तीन साल से कोई उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं दिया गया है। यानी बिना उपयोगिता प्रमाण पत्र के करीब 1 लाख करोड़ रुपए केंद्र की मोदी सरकार पर बकाया है। इसके बारे में सरकारी अधिकारियों को भी नहीं मालूम कि यह पैसा गया कहां। यह किस पर और किस मद में खर्च हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार पर 1985-86 की रकम भी बिना उपयोगिता प्रमाण पत्र के बकाया है। रिपोर्ट के अनुसार, बकाया राशि की इतनी बड़ी संख्या बिना उपयोग प्रमाण पत्र के होना सामान्य वित्तीय नियम 2017 के तहत गैरकानूनी है। इसके नियम 238 में कहा गया है कि सभी मंत्रालयों और विभागों को सरकारी फंड से पैसा आवंटित होने के 12 महीने के भीतर इस बात का उपयोगिता प्रमाण पत्र देना होता है कि जिस मद में पैसा आया था, उसे उसी मद में खर्च किया गया है।

किस मंत्रालयों ने दबाया पैसा

54 हजार 282 करोड़ रुपए के हिसाब में कमी का सबसे ज्यादा प्रभाव केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय पर पड़ा है, जिस पर 18271 करोड़ से ज्यादा का बकाया है। वहीं उच्च शिक्षा विभाग पर 14359 करोड़ रुपए बकाया है। सीएजी की रिपोर्ट यह भी कहती है कि 12754 करोड़ रुपए का फंड जिन मदों के लिए केंद्र सरकार से जारी हुआ था, उन मदों में यह पैसा खर्च ही नहीं हुआ। इनमें से 8742 करोड़ रुपया गलत तरीके से खर्च के हिस्से में डाल दिया गया, जिसका उद्देश्य वह नहीं था, जिसके लिए पैसा आवंटित हुआ था। मिसाल के लिए परमाणु ऊर्जा विभाग ने 3089 करोड़ रुपए के खर्च को संचालन व्यय बताया है, लेकिन उसे विभाग ने पूंजीगत हिस्से में डाला गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह नियमों के सख्त खिलाफ है और कानून आपराधिक कार्रवाई के लायक है। इसी तरह सीबीडीटी और सीबीआईसी ने 4011 करोड़ रुपए से अधिक की रकम टैक्स राजस्व के रूप में डाल रखी है। इसकी प्राप्तियां भी टैक्स की रसीद के रूप में है। इससे साफ पता चलता है कि अफसरों ने आपसी मिलीभगत से इस पैसे का गबन कर लिया है। ऑडिट रिपोर्ट में साफ कहा गया है किसरकार के विभिन्न् मंत्रालयों के अधिकारियों ने देश के खजाने को चूना लगाया है। इससे देश को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।

विविध खर्च बताकर देश को लूटा

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में सरकारी अधिकारियों के उस रवैए पर सख्त ऐतराज जताया है, जिसमें वे विविध खर्च के रूप में छोटे-छोटे मदों में सरकारी पैसा डाल देते हैं और बाद में उसे विविध खर्च बताकर बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन असल में इस तरह के खर्च का कोई हिसाब नहीं होता। 2024-25 में सरकारी खर्च का 4957 करोड़ रुपए से अधिक तीन प्रमुख मदों में डाला गया, जिसे ‘’अन्य’’ नाम दिया गया। यह कुल आवंटित सरकारी पैसे का 50 फीसदी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस गैरकानूनी मद से यह साफ हो जाता है कि अधिकारियों ने सरकारी धन का गबन करने के इरादे से यह मद बनाया है और इसकी रसीदों से यह जाहिर नहीं होता कि इस पैसे को उसी मकसद को पूरा करने के लिए खर्च किया गया है, जिसके लिए यह आवंटित हुआ था। रिपोर्ट में केंद्रीय वित्त मंत्रालय से सरकारी पैसे के इस कदर दुरुपयोग को रोकने के लिए लेखा नियमों के सख्ती से पालन और पब्लिक फाइनेंस मैनेजमेंट सिस्टम को मजबूती से लागू करने की सिफारिश की गई है। सीएजी का कहना है कि ऐसा करने पर ही नियमों पर अमल करने वाली एजेंसियों को खर्च का रिकॉर्ड रखने और वास्तविक खर्चों को रिपोर्ट करने में आसानी होगी।

कश्मीर से गायब हो गईं 918 झीलें

कश्मीर की 518 झीलें या तो गायब हो चुकी हैं या सिकुड़ गई हैं। डल झील भी लगातार घट रही है, जिससे पर्यावरण और जल संकट की गंभीर आशंका बढ़ गई है। जम्मू कश्मीर में पर्यावरण को लेकर एक बड़ी चेतावनी भरी तस्वरी सामने आई है। कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि प्रदेश की सैकड़ों प्राकृतिक झीलें या तो पूरी तरह गायब हो चुकी हैं या उनका आकार लगातार घटता जा रहा है। यह स्थिति न सिर्फ पारिस्थितिक संतुलन के लिए खतरा है, बल्कि आने वाले समय में जल संकट को भी गहरा कर सकती है। कुल मिलाकर 28,990 हेक्टेयर झील क्षेत्र प्रभावित हुआ है, जिसमें से 2,851 हेक्टेयर से ज़्यादा क्षेत्र घट चुका है। कश्मीर की मशहूर डल झील भी इस संकट से अछूती नहीं है। डल झील, जो कश्मीर की पहचान मानी जाती है, पिछले एक दशक में अपने जल क्षेत्र का 10 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा खो चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, 2007 में जहां इसका खुला जल क्षेत्र 1540 वर्ग किलोमीटर था, वहीं 2020 में यह घटकर 1291 वर्ग किलोमीटर रह गया।

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