खाये व अघाये लोगो के ऊपर रहता है सनकपन सवार,युद्ध और हिंसा के उन्माद पर हर पल रहते है तैयार
नफरत की लत में डूबा लोकतंत्र जब वोटर विवेक नहीं, ‘किक’ से लेने लगते हैं निर्णय

- लोकतंत्र राजनीतिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक पतन का संकेत
- विकास बनाम नफरत उल्टा होता समीकरण
- ‘गोदी मीडिया’ का वैश्विक मॉडल
- काल्पनिक संकट, असली राजनीति
- नेता अब झूठ बोलने से बचते नहीं, बल्कि उसे रणनीति के तौर पर करते हैं इस्तेमाल
- ‘कोर वोटर’ का मनोविज्ञान ‘नशे’ जैसी मानसिक निर्भरता पर टिका
- गरीबी और भ्रम का गठजोड़
राकेश कायस्थ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों अमेरिका और भारत में एक खतरनाक समानता उभरकर सामने आई है। यहां चुनाव अब विकास, नीति और जवाबदेही पर नहीं, बल्कि डर, भ्रम और नफरत की खुराक पर लड़े जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह प्रवृत्ति उन समाजों की देन है जो आर्थिक रूप से स्थिर हैं लेकिन नैतिक रूप से खोखले होते जा रहे हैं? यह दौर सिर्फ राजनीतिक बदलाव का नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के क्षरण का दौर है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी हो या भारत में नरेंद्र मोदी की लगातार चुनावी सफलता दोनों ही उदाहरण यह बताते हैं कि लोकतंत्र अब ‘तथ्य’ नहीं, ‘भावना’ से संचालित हो रहा है। ट्रंप का पहला कार्यकाल संस्थाओं पर हमलों, नस्ली बयानबाजी और खुले झूठ से भरा रहा। हार के बाद कैपिटल हिल पर हुआ हमला अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास पर एक काला धब्बा था। इसके बावजूद उनकी वापसी यह साबित करती है कि वोटर अब नेता के चरित्र या काम से ज्यादा उसके द्वारा पैदा किए गए ‘उत्तेजना’ से प्रभावित होता है। भारत में भी तस्वीर अलग नहीं है। पिछले एक दशक में चुनावी राजनीति का फोकस विकास से हटकर ‘खतरे’ गिनाने पर आ गया है। कभी घुसपैठ, कभी धर्म, कभी राष्ट्रवाद। सवाल यह नहीं कि समस्याएं हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उनका समाधान हुआ। और अगर नहीं हुआ, तो फिर वही मुद्दे बार-बार क्यों उछाले जाते हैं। दरअसल यह एक सुनियोजित रणनीति है। उग्र दक्षिणपंथी राजनीति पहले एक भय पैदा करती है अक्सर काल्पनिक या अतिरंजित। फिर उस भय का ‘सरल’ समाधान पेश करती है, जो तर्क की कसौटी पर बेहद कमजोर होता है, लेकिन भावनात्मक रूप से बेहद प्रभावी। इस पूरी प्रक्रिया में मीडिया की भूमिका भी बेहद संदिग्ध हो जाती है। वह सत्ता से सवाल करने के बजाय उसके नैरेटिव को बढ़ाता है। परिणामस्वरूप, एक ऐसा इकोसिस्टम बनता है जिसमें झूठ, आधा-सच और प्रचार मिलकर ‘सच्चाई’ का रूप ले लेते हैं। सबसे चिंताजनक पहलू है वोटर का बदलता मनोविज्ञान। अब वह अपने नेता से जवाबदेही नहीं मांगता, बल्कि उससे ‘मनोरंजन’ और ‘उत्तेजना’ चाहता है। उसे पता होता है कि नेता झूठ बोल रहा है, लेकिन वह उसे इसलिए स्वीकार करता है क्योंकि वह उसकी भावनाओं को संतुष्ट करता है। यह प्रवृत्ति सिर्फ समृद्ध वर्ग तक सीमित नहीं रहती। सोशल मीडिया और इंफ्लुएंसर संस्कृति के जरिए यह नीचे तक फैलती है, और धीरे-धीरे वह तबका भी इसका हिस्सा बन जाता है, जिसके असली मुद्दे आज भी रोटी, कपड़ा, शिक्षा और स्वास्थ्य हैं। यह दौर स्थायी नहीं है, लेकिन खतरनाक जरूर है। इतिहास गवाह है कि समाज अंततः संतुलन की ओर लौटता है, लेकिन सवाल यह है कि तब तक लोकतंत्र की कितनी संस्थाएं और सामाजिक मूल्य बच पाएंगे।

* लोकतंत्र अब नीति नहीं, भावनात्मक उन्माद से संचालित हो रहा है
* आर्थिक विकास और नैतिकता का रिश्ता कमजोर पड़ता दिख रहा है
* मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता का उपकरण बन चुका है
* उग्र दक्षिणपंथ काल्पनिक संकट गढ़कर राजनीति करता है
* झूठ अब रणनीति बन चुका है, गलती नहीं
* वोटर का एक वर्ग ‘नफरत की खुराक’ का आदी हो चुका है
* गरीब और वंचित तबका भी इस नैरेटिव में उलझकर अपने असली मुद्दे भूल रहा है




