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गोवंश शातिर भाजपाई सत्ताधीशों की सियासत का शिकार, नीचता की हद पार कर रही भजनलाल सरकार

गौ-रक्षा के नारों और जमीनी हकीकत के बीच दम तोड़ती गायें, खोली व्यवस्था की परतें

  • जैसलमेर की घटना ने झकझोर दिया गौभक्त समाज को
  • गौ-रक्षा के दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई
  • प्रधानमंत्री मोदी भी उठा चुके हैं फर्जी गोरक्षकों पर सवाल
  • मुस्लिम समाज के भीतर भी उठी है गो-संरक्षण की आवाज
  • वोट बैंक की राजनीति में उलझा गोवंश का मुद्दा
  • नेताओं के बयानों ने बढ़ाए वैचारिक विरोधाभास
  • बीफ निर्यात और गौ-रक्षा की राजनीति पर उठते प्रश्न
  • गोवंश संरक्षण को राजनीति नहीं, राष्ट्रीय नीति बनाने की जरूरत

 निर्मल रानी देश में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और धार्मिक विश्वास का केंद्र है। भारतीय समाज में गौ माता को पूजनीय माना जाता है और राजनीतिक मंचों से लेकर धार्मिक सभाओं तक गौ-रक्षा का मुद्दा दशकों से प्रमुखता से उठाया जाता रहा है। किंतु राजस्थान के जैसलमेर में हाल ही में सामने आई घटना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या गौ-रक्षा वास्तव में गोवंश की सुरक्षा का आंदोलन है या फिर यह केवल राजनीतिक लाभ और वोटों की फसल काटने का माध्यम बनकर रह गया है। भाजपा शासित राजस्थान के जैसलमेर जिले में एक डंपिंग यार्ड से 500 से अधिक गायों के सड़े-गले शव, हड्डियां और अवशेष मिलने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। घटनास्थल का दृश्य इतना भयावह था कि स्थानीय नागरिकों, पशु प्रेमियों और गौ-भक्तों में भारी आक्रोश फैल गया। चारों ओर फैली दुर्गंध, बिखरी हड्डियां और सड़ते शव इस बात की गवाही दे रहे थे कि गोवंश की सुरक्षा के तमाम दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात कितने चिंताजनक हैं। बताया गया कि अनेक गायों की मौत प्लास्टिक, जहरीले कचरे और भोजन के अभाव में हुई। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे मृत पशुओं को भी वहां फेंक दिया गया जिन्हें निस्तारण के लिए अधिकृत ठेकेदारों द्वारा लाया गया था। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है जो एक ओर गौ-रक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है और दूसरी ओर गोवंश को कूड़े के ढेर पर मरने के लिए छोड़ देती है।

गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा, लेकिन गायों की सुरक्षा कौन करेगा

पिछले एक दशक में देश ने गौ-रक्षा के नाम पर अनेक विवादित और दुखद घटनाएं देखी हैं। कई मामलों में लोगों को गो-तस्करी या गोमांस रखने के संदेह मात्र पर भीड़ द्वारा पीटा गया, अपमानित किया गया और यहां तक कि उनकी हत्या तक कर दी गई। मोहम्मद अखलाक, पहलू खान, जुनैद और ऐसे कई नाम राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बने। इन घटनाओं ने देश की लोकतांत्रिक छवि पर भी प्रश्नचिह्न लगाए। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की आलोचना हुई और गौ-रक्षा के नाम पर कानून हाथ में लेने वालों की भूमिका पर गंभीर बहस छिड़ी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन घटनाओं के बीच स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक रूप से यह कहना पड़ा कि गौ-रक्षा के नाम पर सक्रिय 70 से 80 प्रतिशत लोग वास्तविक गोरक्षक नहीं हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को फर्जी गोरक्षक बताते हुए राज्य सरकारों से उनकी जांच कराने की सलाह दी थी। पीएम मोदी ने उस समय यह भी कहा था कि गायों को प्लास्टिक और कचरा खाने से बचाना अधिक जरूरी है क्योंकि कटने से ज्यादा गायें इसी कारण मरती हैं। जैसलमेर की घटना ने प्रधानमंत्री के इस कथन को एक बार फिर सच साबित कर दिया है।

क्या गाय केवल चुनावी मौसम की जरूरत

देश में जब भी चुनाव आते हैं, गाय और गौ-रक्षा का मुद्दा अचानक राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाता है। राजनीतिक दल और विभिन्न संगठन इसे भावनात्मक मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही गायें सड़कों, कूड़ाघरों और खेतों में बेसहारा घूमती नजर आती हैं। यदि वास्तव में गौ-रक्षा प्राथमिकता होती तो देशभर में हजारों गायें प्लास्टिक खाकर दम न तोड़तीं। गोशालाओं की दुर्दशा सामने न आती और जैसलमेर जैसी घटनाएं देखने को न मिलतीं।
सवाल यह है कि गाय की रक्षा के नाम पर राजनीति करने वाले संगठन और नेता तब कहां होते हैं जब कोई गाय भूख, बीमारी या प्लास्टिक खाने से मर रही होती है।

मुस्लिम समाज की बदलती सोच और पहल

देश में अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि गौ-रक्षा का मुद्दा केवल हिंदू समाज की चिंता है। जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और व्यापक है। पिछले वर्षों में अनेक मुस्लिम धार्मिक नेताओं, उलेमाओं और संगठनों ने भी सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए गाय की हत्या से बचने की अपील की है। कई इस्लामी विद्वानों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत जैसे देश में बहुसंख्यक समाज की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। कई मुस्लिम संगठनों ने तो गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग तक का समर्थन किया। उनका मानना है कि ऐसा होने से गौ-रक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा और सांप्रदायिक तनाव में कमी आ सकती है। यह पहल बताती है कि गोवंश का प्रश्न केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक सद्भाव से भी जुड़ा हुआ विषय है।

राजनीतिक बयानों का विरोधाभास

गोवंश के मुद्दे पर विभिन्न नेताओं द्वारा समय-समय पर दिए गए बयान भी इस बहस को जटिल बनाते हैं। एक ओर गौ-रक्षा को सांस्कृतिक पहचान का विषय बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर कई नेता व्यक्तिगत खान-पान की स्वतंत्रता के नाम पर गोमांस सेवन का समर्थन करते दिखाई देते हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, पूर्व केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू तथा विभिन्न राज्यों के नेताओं द्वारा दिए गए बयान समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय बनते रहे हैं। इन बयानों से यह प्रश्न उठता है कि क्या गोवंश संरक्षण को लेकर देश में कोई स्पष्ट और समान दृष्टिकोण मौजूद है, या फिर यह विषय केवल राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।

बीफ निर्यात का बड़ा विरोधाभास

भारत लंबे समय से दुनिया के प्रमुख बीफ निर्यातक देशों में शामिल रहा है। यह तथ्य अक्सर उन लोगों द्वारा उठाया जाता है जो गौ-रक्षा और बीफ व्यापार के बीच मौजूद विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाते हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि गाय की सुरक्षा प्राथमिकता है तो फिर गोवंश से जुड़े आर्थिक कारोबार और निर्यात नीति पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए। केवल भावनात्मक नारों से समस्या का समाधान संभव नहीं है।

गोशालाओं की वास्तविकता

देश के अनेक राज्यों में संचालित गोशालाओं की स्थिति भी चिंता का विषय रही है। कई जगहों पर गायों के लिए पर्याप्त चारा नहीं है, चिकित्सा सुविधाएं सीमित हैं और वित्तीय संसाधनों की भारी कमी है। कई बार गोशालाओं में भूख और बीमारी से गायों की मौत की खबरें सामने आती रही हैं। इसके बावजूद गौ-रक्षा पर राजनीति करने वाले वर्गों की सक्रियता अक्सर केवल प्रतीकात्मक मुद्दों तक सीमित दिखाई देती है।

आस्था बनाम जिम्मेदारी

गाय को माता कहने वाला समाज यदि वास्तव में अपनी आस्था के प्रति ईमानदार है तो उसे केवल भावनात्मक नारों से आगे बढ़ना होगा। गाय की सुरक्षा का अर्थ केवल गोवध का विरोध नहीं बल्कि उसके जीवन, स्वास्थ्य, भोजन और संरक्षण की संपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है। जब तक गायें सड़कों पर भटकती रहेंगी, प्लास्टिक खाती रहेंगी और कूड़े के ढेरों में मरती रहेंगी, तब तक गौ-रक्षा के दावे अधूरे ही माने जाएंगे।

गोवंश नहीं, राजनीति कटघरे में

जैसलमेर की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समस्या किसी एक धर्म, समुदाय या व्यक्ति की नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या देश में गोवंश संरक्षण को ईमानदारी से लागू किया जा रहा है या नहीं। गोवंश की दुर्दशा यह संकेत देती है कि वह धार्मिक विवादों से अधिक राजनीतिक स्वार्थों का शिकार बन चुका है। आवश्यकता इस बात की है कि गौ-रक्षा को चुनावी भाषणों, सांप्रदायिक बहसों और भावनात्मक नारों से बाहर निकालकर एक ठोस राष्ट्रीय नीति का विषय बनाया जाए। जिस दिन गाय की सुरक्षा राजनीति से ऊपर उठकर वास्तविक प्रशासनिक और सामाजिक जिम्मेदारी बन जाएगी, उसी दिन जैसलमेर जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रुक सकेगी। तब गौ-भक्ति केवल नारे नहीं बल्कि व्यवहार में दिखाई देगी। यही गोवंश के प्रति सच्ची श्रद्धा और वास्तविक सम्मान होगा।

◆ जैसलमेर डंपिंग यार्ड में 500 से अधिक गोवंशों के अवशेष मिलने से मचा विवाद।
◆ गौ-रक्षा के दावों और वास्तविक स्थिति के बीच गहरी खाई उजागर।
◆ पीएम मोदी पहले भी फर्जी गोरक्षकों पर सवाल उठा चुके हैं।
◆ प्लास्टिक और कचरा गोवंश की मौत का बड़ा कारण बन रहा है।
◆ मुस्लिम समाज के कई संगठनों ने भी गो-संरक्षण की वकालत की है।
◆ राजनीतिक बयानों और नीतियों में दिखाई देता है विरोधाभास।
◆ गोशालाओं और संरक्षण तंत्र की स्थिति पर गंभीर प्रश्न।
◆ गोवंश संरक्षण को राजनीति नहीं, राष्ट्रीय दायित्व बनाने की जरूरत।

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