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जनगणना ने खोली सरकार की पोल,मोदी सरकार के हर काम में बस झोल ही झोल

यूपी, राजस्थान में संगणकों पर ‘फर्जी’ डाटा लाने का दबाव, कहीं चिट्ठी तो कहीं धमकी से सर्वेयरों का बढ़ा तनाव

  •  राजस्थान में तो जनगणना निदेशालय ने 2 जून को चिट्ठी तक लिख मारी
  •  कहा- जमीनी आंकड़े सरकारी योजनाओं की उपलब्धियों के कागजी दावों से मेल खाने वाले हों
  •  यूपी में सर्वेयर बोले- किसका आंकड़ा झूठा हो और किसका नहीं ? परेशानी यह है
  •  सबसे ज्यादा दिक्कत उज्जवला योजना में, उपले जला रहे हैं लोग

जयपुर/लखनऊ। देश में चल रहे जनगणना 2027 में अभी घरों की गिनती और सुविधाओं की जानकारी ही जुटाई जा रही हैं। लेकिन उत्तरप्रदेश और राजस्थान जैसे भाजपा के डबल इंजन राज में संगणकों पर ‘फर्जी’ जमीनी आंकड़े लाने का अघोषित दबाव बढ़ता जा रहा है। सरकार चाहती है कि संगणक ऐसे आंकड़े लेकर आएं, जिससे सरकारों की कागजी उपलब्धियां और योजनाएं पास हो जाएं।इसके लिए संगणकों को मौखिक रूप से फील्ड पर दोबारा जाने और सरकार के मनमाफिक आंकड़े लेकर आने का दबाव बनाया जा रहा है। राजस्थान सरकार के जनगणना विभाग ने तो जिला जनगणना अधिकारियों और फील्ड सुपरवाइजरों को बकायदा एक चिट्ठी तक जारी कर दी है कि वे फील्ड में दोबारा जाकर अच्छे आंकड़े जुटाएं, ताकि सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं की नाकामी छिप जाए।

फील्ड डेटा ने खोली सरकार की पोल

भारत में आखिरी बार जनगणना का काम 2011 में किया गया था। उसके बाद अब जाकर 16 साल बाद केंद्र सरकार ने जनगणना का काम शुरू किया है। इसके तहत 14 जून तक घरों की लिस्टिंग और उनमें उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी जुटाई जा रही है। उत्तरप्रदेश सरकार के मुताबिक राज्य की अनुमानित आबादी करीब 25 करोड़ 70 लाख है। जनगणना का काम प्रदेश के 75 जिलों, 350 तहसीलों, 17 नगर निगमों, 745 शहरी निकायों, 57 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों और करीब 1.04 लाख राजस्व गांवों में किया जा रहा है। इसके लिए करीब 5.47 लाख कर्मचारियों की तैनाती की गई है, जिनमें 4.5 लाख प्रगणक और 85 हजार सुपरवाइजर शामिल हैं। लेकिन जनगणना कार्य के पहले ही चरण में ऐसे कई जमीनी आंकड़े सामने आ रहे हैं, जिससे राज्य सरकार को परेशानी आ रही है। मिसाल के लिए परिवारों का खुले में शौच का आंकड़ा, घरेलू कुकिंग गैस का उपयोग, नल के स्वच्छ पानी की उपलब्धता के आंकड़े स्वच्छ भारत मिशन, जल जीवन मिशन और उज्ज्वला योजना के हितधारकों के कागजी आंकड़ों से मेल नहीं खा रहे हैं। खासतौर पर उन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जहां सरकार ने कागजों में योजना की सौ फीसदी अमल के दावे किए थे। अब सरकार की पोल खुलने से सर्वेयरों से कहा जा रहा है कि वे दोबारा फील्ड में जाकर आंकड़ों में सुधार करें। अब सर्वेयरों के सामने दिक्कत यह है कि वे किन परिवारों के आंकड़ों में फर्जीवाड़ा करें और किनमें नहीं, क्योंकि जनगणना के दूसरे चरण में सरकारी योजनाओं की कामयाबी की और भी पोल तब खुलेगी, जब आर्थिक डेटा और रोजगार के आंकड़े पूछे जाएंगे। तब आंकड़ों का बड़ा फर्क देश की आर्थिक प्रगति और विकास योजनाओं की पूरी प्लानिंग पर पानी फेर सकता है।

 

राजस्थान ने सुना दिया फरमान

राजस्थान सरकार के जनगणना निदेशालय ने 2 जून को जारी पत्र में कहा है कि न केवल शौचालय और ईंधन, बल्कि बिजली, इंटरनेट और अन्य बुनियादी सुविधाओं के बारे में भी जुटाए गए आंकड़ों को दोबारा भरकर लाएं, क्योंकि जमीनी आंकड़े सरकार की उपलब्धियों से मेल नहीं खाते। सरकार को सबसे ज्यादा परेशानी खुले में शौच के आंकड़ों से है। परिवार कह रहे हैं कि उनके घर में शौचालय नहीं है, इसलिए वे बाहर खुले में जाते हैं। ऐसे में अब जनगणना निदेशालय ने सर्वेयरों से कहा है कि वे पड़ोस के सबसे नजदीकी शौचालय या सुलभ शौचालय का विकल्प लें, ताकि आंकड़ों में यह दिखाया जा सके कि परिवार के पास शौचालय की सुविधा उपलब्ध है। यही स्थिति पीने के नल को लेकर भी सामने आ रही है। यहां भी बगल के नल का विकल्प दिया जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी दिक्कत घरेलू कुकिंग गैस की है। परिवार गोबर के उपलों, यहां-वहां से बटोरकर लाई गई सूखी लकड़ियों, घास में घासलेट मिलाकर खाना पका रहे हैं। लोगों का कहना है कि उनके पास उज्ज्वला योजना का कनेक्शन तो है, लेकिन गैस भरवाने के पैसे नहीं है, क्योंकि गैस महंगी है। कुछ परिवार यह भी कह रहे हैं कि लगातार सिलेंडर न भरवाने से उनका कनेक्शन कट गया है। वे भी अब लकड़ियों के सहारे ही खाना बना रहे हैं। सर्वेयरों को गांव-देहात के इलाकों से ज्यादा दिक्कत शहरी आंकड़ों में सामने आ रही है।

बेसिक मोबाइल नहीं तो इंटरनेट यूजर कैसे लिखें?

सर्वेयरों के सामने एक दूसरी दिक्कत यह भी है कि परिवारों के पास जब बेसिक मोबाइल फोन ही न हों तो उन्हें इंटरनेट का उपयोगकर्ता कैसे बना दें? हालांकि ऐसे आंकड़ों को बदलने के मामले में सरकार के पास भी कोई जवाब नहीं है। परिवार यह भी बता रहे हैं कि वे नदी-नाले या झरनों का पानी लाकर उसे ही पीने और निस्तार के लिए उपयोग करते हैं। इसके बावजूद सर्वेयरों को पानी के स्रोत घर के भीतर ही लिखना पड़ रहा है। सर्वेयर जब घर में बिजली की उपलब्धता के बारे में पूछते हैं तो परिवारों का कहना होता है कि बिजली नहीं है, या फिर कनेक्शन ही कट चुका है, तब सही आंकड़े जुटाने में परेशानी हो रही है। जनगणना मामलों के महापंजीयक और आयुक्त का कहना है कि इस बार सरकार का पूरा जोर आंकड़ों की गुणवत्ता पर है, ताकि सही आंकड़े आएं। लेकिन वे इस सवाल पर कन्नी काट जाते हैं कि फिर सर्वेयरों पर सरकार की ओर से दोबारा सही आंकड़े लाने का दबाव क्यों बनाया जा रहा है, जबकि जमीनी स्थिति योजनाओं के सरकारी आंकड़ों से बिल्कुल उलट है?

 

महिला शिक्षामित्र की मौत

उत्तर प्रदेश के बिजनौर से एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। यहां के गांव अकबरपुर तिगरी में सरकार द्वारा चलाए जा रहे जनगणना की ड्यूटी में लगी एक महिला शिक्षामित्र अचानक जमीन पर गिरकर बेहोश हो गईं। आनन-फानन में उन्हें नजदीकी चिकित्सक के पास ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। परिजनों और शिक्षक संघ का आरोप है कि महिला सरकारी ड्यूटी के अत्यधिक काम और प्रशासनिक दबाव के कारण पिछले कुछ समय से गंभीर रूप से मानसिक तनाव में चल रही थीं, जिसके चलते उन्हें दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ा और उनकी असमय जान चली गई। शिक्षामित्र के परिवार में कोहराम मचा हुआ है।

 

हम झूठ कैसे बोलें

एक सर्वेयर ने अपना दुखड़ा बांटते हुए कहा कि अगर हम जनगणना के मोबाइल ऐप में यह लिख दें कि घर की छत टीन की है तो हमें दोबारा फील्ड में आकर पक्की छत का आंकड़ा डलवाया जा रहा है। ऐसे में हम झूठ कैसे बोलें। जिस घर की छत ही पक्की न हो, वहां शौचालय की उपलब्ध अकल्पनीय है। ऐसे में सर्वेयरों को पहले छत पक्की बताकर उसमें शौचालय होने का आंकड़ा देना पड़ रहा है। इससे समूची जनणगना पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

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