
– 15-25% को ही नौकरी नसीब, बाकी बैठे बेरोजगार; करना पड़ रहा है सैलरी से समझौता
– सामान्य ग्रैजुएट्स में केवल 16% को ही नौकरी नसीब
– कॉलेजों के अच्छे कैम्पस में ही कंपनियों को दिलचस्पी, हिंदी पट्टी पिछड़ी
– नौकरी के लिए परीक्षा और इंटरव्यू में भी एआई का बढ़ा बोलबाला
– जिन कॉलेजों में पढ़ाई के साथ सीखने के चांस नहीं, वहां के स्टूडेंट्स नौकरी में पिछड़े
– एआई, मशीन लैंग्वेज, ऑटोमेशन, डेटा, क्लाउड, सायबर सिक्योरिटी पर है कंपनियों का जोर
नई दिल्ली। राजनेता चाहे नौकरी बांटने का जितना भी दावा करें या यूपी-बिहार जैसे राज्यों में राजनीतिक दल अपनी साख बचाने के लिए 8-10 हजार रुपए की ठेके की नौकरियों के चाहे कितने भी नियुक्ति पत्र बांटें, भारत के बेरोजगारों के लिए हालात बिल्कुल उल्टे हैं। विगत सप्ताह को जारी हुई अनस्टॉप टैलेंट रिपोर्ट 2026 ने नरेंद्र मोदी सरकार के रोजगार देने के सारे दावों की पोल खोल दी है।
तमिलनाडु के रिजल्ट में दिखा युवाओं का गुस्सा

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में निजी कंपनियां नौकरी देने के जितने बड़े वादे करती है, कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर जमीनी रिपोर्ट उससे बिल्कुल उलट है। देश के उच्च शिक्षित 26% एमबीए को ही नौकरी मिली है। अगर इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स की बात की जाए तो नौकरी पाने वालों का आंकड़ा उससे भी कम केवल 15% है। सामान्य ग्रैजुएट्स की तो पूछें ही मत। ऐसे स्टूडेंट्स में से केवल 16% को ही नौकरी उपलब्ध है। कुल मिलाकर भारत के 70 से 85% युवा आबादी बेरोजगार बैठी है। युवाओं में बेरोजगारी को लेकर बढ़ता गुस्सा और हताशा राजनीतिक रूप से भी सामने दिखाई देने लगा है। हाल में तमिलनाडु के चुनाव में युवाओं और खासकर जेन जी ने एक्टर से राजनेता बने थलपति विजय को चुनाव जितवाकर यह बता दिया है कि आने वाले दिनों में हर राज्य में सत्ताधारी दल को युवा बेरोजगारों का गुस्सा झेलना पड़ सकता है और उन्हें सत्ता गंवाकर इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
बेरोजगारी की भयावह रिपोर्ट
अनस्टॉप टैलेंट रिपोर्ट 2026 में सबसे खराब हालत कॉलेज में ग्रैजुएशन कर रहे स्टूडेंट्स की दिख रही है। इनमें 84% बिना जॉब के घर बैठे हैं। बाकी बचे 16% जॉब लेटर के इंतजार में हैं, जो अक्सर स्थगित हो जाते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि निजी कॉर्पोरेट कंपनियां कैम्पस प्लेसमेंट पर ज्यादा जोर दे रही हैं। इन कैम्पस में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को नौकरी मिलने के तीन गुना ज्यादा मौके होते हैं। लेकिन जैसे ही स्टूडेंट्स कैंपस से बाहर नौकरी तलाशने की कोशिश करते हैं, उनके पास कंपनियों का विकल्प घटकर 150 से केवल 30 रह जाता है। कैम्पस प्लेसमेंट में भी 40% स्टूडेंट्स को ही सालाना पांच लाख या इससे ज्यादा पैकेज मिल रहा है। हालांकि, इस पैकेज की दौड़ में करीब 73% स्टूडेंट्स होते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि नौकरी पाने के लिए फिलहाल डिग्री से ज्यादा कौशल मायने रख रहा है। नौकरी देने के लिए सबसे बड़ा कौशल एआई हो गया है। यानी जिन्हें एआई की जानकारी है, उन्हें नौकरी देने में पहली तवज्जो मिलती है। ऐसे में ग्रैजुएशन कर रहे युवा पीछे छूट रहे हैं और उन्हें नौकरी पाने के लिए सैलरी में समझौता करना पड़ रहा है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि देश में नई भर्तियों का सिस्टम पूरी तरह स टूट चुका है। इसमें शैक्षणिक प्रदर्शन, ग्रेड, प्रतिशत और मेरिट कोई मायने नहीं रखता। केवल यह मायने रखता है कि अपने कौशल से कोई युवा कैसे किसी मौके को दूसरे से छीन सकता है।
अंडरग्रैजुएट्स पर बुरी मार
अनस्टॉप टैलेंट रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भर्तियों के नए सिस्टम के टूटने से सबसे बुरी मार कॉलेज में पढ़ रहे अंडरग्रैजुएट्स पर पड़ी है। ऐसे स्टूडेंट्स को नौकरियों के ऑफर मिलने में एक से तीन महीने तक की देरी हो रही है। इनमें ज्यादातर स्टूडेंट्स ऐसे कैम्पस के होते हैं, जहां नियोक्ताओं का ध्यान कम होता है और वे उन कैम्पस में नौकरियों के ऑफर्स लेकर कम ही जाते हैं। यही वह कैम्पस होते हैं, जहां मुख्य रूप से थ्योरी, यानी सैद्धांतिक बातें स्टूडेंट्स को ज्यादा पढ़ाई जाती हैं, लेकिन बाहरी औद्योगितक या कामकाजी दुनिया से उनका संबंध कम ही रहता है। इससे उन्हें अच्छी इंटर्नशिप नहीं मिल पाती और वे पढ़ते हुए नहीं सीख पाते। इससे उनका करिअर शुरू होने से पहले ही खराब होने लगता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आजकल कंपनियां भर्तियों में काफी सिलेक्टिव हो गई हैं। उनकी भर्तियों में समानता नहीं है। तकनीकी रूप से उनकी भर्तियां हिंदी बेल्ट से अलग महाराष्ट्र और दक्षिणी भारत में ज्यादा होती हैं, क्योंकि वहां उन्हें ऐसे कैम्पस मिल रहे हैं, जो स्टूडेंट्स के कौशल पर ध्यान देते हैं। हिंदी बेल्ट में इस तरह के कैम्पस गिने-चुने ही हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस समय 95% स्टूडेंट्स की मर्जी कैम्पस के बाहर नियुक्ति पाने में है, क्योंकि कैम्पस के भीतर प्रतिस्पर्धा ज्यादा है। वे चाहते हैं कि प्लेसमेंट एजेंसियों के इतर वे गैर परंपरागत रास्तों को आजमाएं। लेकिन परेशानी की बात यह है कि नियोक्ताओं ने अब युवा बेरोजगारों में परिवर्तन की इस नई लहर को अपनाया नहीं है। वे अभी भी कैम्पस प्लेसमेंट पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में अगर कॉलेज या यूनिवर्सिटी का नेटवर्क कॉर्पोरेट्स या कैम्पस प्लेसमेंट एजेंसियों से नहीं है तो फिर वहां पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को इसका फायदा नहीं मिल पाता है।
9 लाख का पैकेज केवल 14% को
अगर किसी स्टूडेंट को पांच लाख से अधिक का पैकेज चाहिए तो उसे उन 14 प्रतिशत स्टूडेंट्स से मुकाबला करना होगा, जिन्हें 9 लाख तक का पैकेज मिल पाता है। अब नियोक्ताओं को नौकरी के पहले दिन से ही रिजल्ट चाहिए और यही बात स्टूडेंट्स के लिए डिग्री और मार्क्स से कहीं ज्यादा अहम साबित हो रही है। इसमें उन्हें कॉलेज, कैम्पस और डिग्री के स्कोर तक को नकारना पड़ रहा है। यही वजह है कि इस समय 30% एमबीए और 39% इंजीनियरों को 10 लाख से कम सैलरी में समझौता करना पड़ रहा है। अगर किसी स्टूडेंट को एंट्री लेवल पर जॉब पाना हो तो उसे एआई कौशल में माहिर होना ही होगा। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 80-86% स्टूडेंट्स ने माना कि उन्होंने नौकरी के अपने आवेदन में जब जेन एआई का उपयोग किया तो उन्हें कामयाबी मिली। लेकिन इस तरह से तकनीक का उपयोग करना आधे से अधिक युवा नहीं जानते। लिहाजा उन्हें कामयाबी नहीं मिल पा रही है। नौकरी पाने के लिए होने वाली भर्ती परीक्षाओं में भी 57% कंपनियां एआई का उपयोग कर रही हैं। यही हाल इंटरव्यू का भी है, जहां 55% इंटरव्यू एआई केंद्रित हो रहे हैं। अगर नौकरी के लिए कौशल की बात करें तो एआई/ मशीन लैंग्पेज, डेटा, क्लाउड, सायबर सिक्योरिटी के बारे में ज्यादा पूछा जाता है, न कि अकादमिक डिग्री के बारे में।
अगर सीखना है तो सैलरी से समझौता करें
रिपोर्ट के अनुसार, अगर फ्रेशर स्टूडेंट्स को इंडस्ट्री से कुछ सीखना है तो उन्हें हर हाल में अपनी सैलरी से समझौता कर नौकरी हासिल करनी पड़ रही है। यह समझौता फिलहाल 90% से अधिक स्टूडेंट्स करने को तैयार हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा जॉब मार्केट में सीखने, जॉब एक्सपोजर और इंडस्ट्री की डिमांड के मुताबिक खुद को ढालने के लिए ऐसा करना जरूरी है, वरना बेरोजगारी का खतरा सिर पर मंडराने की आशंका हो सकती है।




