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मद्रास हाईकोर्ट ने शीर्ष कोर्ट को दिखाई आंख,उच्चतम न्यायालय का गिर गया साख

लोकतंत्र का अपहरण या न्याय का मजाक?जब मद्रास हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा छह साल तक न्याय को किसने बंधक बनाया?

  • 49 वोटों की हार, 103 वोटों की जीत और दस साल बाद मिला न्याय
  • सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश ने लोकतंत्र की सांसें रोक दीं
  • हाईकोर्ट का सीधा प्रहार यह केवल दुर्भाग्य नहीं, न्याय का उपहास
  • छह महीने में निपटनी थी याचिका, छह साल तक धूल खाती रही फाइल
  • जिसे जनता ने नहीं चुना, वह पूरा कार्यकाल विधायक बना रहा
  • क्या अदालतें अपने ही आदेश भूल जाएं तो लोकतंत्र बच सकता है
  • जस्टिस जयचंद्रन की टिप्पणी ने न्यायपालिका के भीतर की बेचैनी उजागर की
  • यह केवल एक सीट का मामला नहीं, करोड़ों मतदाताओं के अधिकार का सवाल

न्याय की शवयात्रा पर लोकतंत्र का मौन विलाप भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का वोट माना जाता है। चुनाव आयोग चुनाव कराता है, अदालतें विवादों का निपटारा करती हैं और जनप्रतिनिधि जनता की आवाज बनते हैं। लेकिन जब अदालतों की देरी ही लोकतंत्र की हत्या का कारण बन जाए, तब सवाल केवल किसी एक उम्मीदवार की जीत-हार का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे संवैधानिक ढांचे की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है। तमिलनाडु की एक विधानसभा सीट से शुरू हुआ यह विवाद अब देश की न्यायिक व्यवस्था के माथे पर एक ऐसे प्रश्नचिह्न की तरह खड़ा हो गया है जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। 2016 के चुनाव में 49 वोटों से हार घोषित किया गया उम्मीदवार आखिरकार 2026 में 103 वोटों से विजेता घोषित हुआ। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका था। विधायक पांच वर्ष सत्ता का सुख भोग चुका था। जनता अपना प्रतिनिधित्व खो चुकी थी। और न्याय? वह अदालतों की फाइलों में दम तोड़ चुका था। मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन ने जिस तीखेपन से सुप्रीम कोर्ट के रवैये की आलोचना की है, वह भारतीय न्यायिक इतिहास में दुर्लभ घटनाओं में गिनी जाएगी। उन्होंने केवल देरी पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि साफ शब्दों में कहा कि यह न्याय का मजाक है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अदालतें अपने ही बनाए नियमों और सिद्धांतों को भूल जाएं तो लोकतंत्र धीरे-धीरे उन देशों की राह पकड़ सकता है जहां संस्थाएं केवल दिखावे के लिए बची रहती हैं। यह मामला इसलिए भी असाधारण है क्योंकि यहां किसी राजनीतिक दल, सरकार या नौकरशाही की नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। जिस सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं चुनाव याचिकाओं के शीघ्र निपटारे के निर्देश दिए थे, उसी सुप्रीम कोर्ट ने छह वर्षों तक एक स्थगन आदेश को जीवित रखा और अंत में यह कहकर मामला लगभग समाप्त कर दिया कि विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है। यह तर्क कानून की किताबों में भले जगह बना ले, लेकिन लोकतंत्र के इतिहास में यह एक गहरे घाव की तरह दर्ज रहेगा।

दस साल बाद पलटा चुनाव परिणाम, लेकिन क्या लौटा न्याय

2016 का विधानसभा चुनाव संपन्न हुआ। मतगणना हुई। परिणाम घोषित हुआ। एक उम्मीदवार को 49 वोटों से विजयी घोषित कर दिया गया। हारने वाले प्रत्याशी ने परिणाम को चुनौती दी और मतगणना में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए चुनाव याचिका दायर कर दी।
2019 में मद्रास हाईकोर्ट ने पुनर्गणना का आदेश दिया। यह एक महत्वपूर्ण फैसला था क्योंकि अदालत ने पाया कि शिकायत इतनी गंभीर है कि दोबारा मतगणना आवश्यक है। लेकिन यहीं से कहानी न्यायिक भूलभुलैया में प्रवेश कर गई। सुप्रीम कोर्ट पहुंची अपील पर पुनर्गणना के परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी गई। इसके बाद मामला छह वर्षों तक सर्वोच्च अदालत में पड़ा रहा। न सुनवाई पूरी हुई, न अंतिम फैसला आया, न मतदाताओं को न्याय मिला।

छह महीने का कानून, छह साल की खामोशी

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि चुनाव याचिकाओं का निपटारा यथासंभव छह महीने के भीतर होना चाहिए। यह प्रावधान किसी औपचारिकता के लिए नहीं बनाया गया था, कारण साफ है। चुनाव विवादों में समय ही सबसे बड़ा तत्व होता है। यदि पांच साल बाद फैसला आए तो लोकतंत्र का नुकसान पहले ही हो चुका होता है।बयदि दस साल बाद फैसला आए तो वह न्याय नहीं, केवल इतिहास का संशोधन बनकर रह जाता है। मद्रास हाईकोर्ट ने इसी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सबसे तीखा प्रहार किया।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क और हाईकोर्ट की आपत्ति

21 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, इसलिए अब इस विवाद पर निर्णय देना निरर्थक होगा। कानूनी दृष्टि से यह तर्क व्यावहारिक लग सकता है। लेकिन हाईकोर्ट ने पूछा कि यदि सर्वोच्च अदालत छह वर्षों तक मामले को रोके रखे और फिर कहे कि अब फैसला निरर्थक है, तो इस निरर्थकता का जिम्मेदार कौन है? क्या अदालत स्वयं अपनी देरी का लाभ उठा सकती है? क्या न्याय में विलंब का पुरस्कार भी न्यायपालिका को मिलना चाहिए? यहीं से विवाद ने नैतिक और संवैधानिक आयाम ग्रहण कर लिया।

हाईकोर्ट का सबसे बड़ा आरोप मतदाताओं के अधिकार की हत्या

जस्टिस जयचंद्रन ने कहा कि यह मामला केवल उम्मीदवारों के बीच का विवाद नहीं है। असल पीड़ित उस विधानसभा क्षेत्र के मतदाता हैं। यदि वास्तव में गलत व्यक्ति विधायक बना रहा, तो पूरे क्षेत्र का लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हुआ। मतदाताओं ने जिस व्यक्ति को चुना था, वह सदन में नहीं पहुंचा।
जिसे जनता ने नहीं चुना, वह पांच साल तक विधायक बना रहा। यह केवल एक चुनावी गलती नहीं, बल्कि मताधिकार की मूल भावना पर प्रहार है।

न्याय का गंभीर मजाक अदालत की अदालत में सुनवाई

भारतीय न्यायिक इतिहास में बहुत कम अवसर आए हैं जब किसी हाईकोर्ट ने इतने स्पष्ट शब्दों में सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए हों। जस्टिस जयचंद्रन ने कहा कि मामले को इस तरह समाप्त करना न्याय का गंभीर उपहास है। यह टिप्पणी केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी। यह न्यायिक जवाबदेही की मांग थी।
उन्होंने संकेत दिया कि यदि सर्वोच्च संस्थाएं भी अपने मानकों का पालन नहीं करेंगी तो लोकतंत्र कमजोर होगा।

तानाशाही की चेतावनी क्यों महत्वपूर्ण

सबसे अधिक चर्चा हाईकोर्ट की उस टिप्पणी पर हो रही है जिसमें उन्होंने कहा कि यदि संस्थाएं अपने दायित्वों से विमुख होती रहीं तो देश उन राष्ट्रों की राह पर जा सकता है जहां लोकतांत्रिक ढांचा केवल औपचारिकता बनकर रह गया। यह टिप्पणी किसी राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं थी। यह न्यायिक संस्थाओं की जवाबदेही पर आधारित चेतावनी थी। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र संस्थाओं की विश्वसनीयता से चलता है और जब संस्थाओं पर जनता का भरोसा कमजोर होता है तो लोकतांत्रिक ढांचा भीतर से खोखला होने लगता है। रंजन गोगोई प्रकरण से लेकर आज तक क्या न्यायपालिका आत्मालोचना से बचती रही है? लेख में जिस तरह पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के विवादास्पद मामले का उल्लेख किया गया है, वह न्यायपालिका के भीतर आलोचना की संस्कृति पर प्रश्न उठाता है। अक्सर देखा गया है कि न्यायपालिका अपने भीतर की त्रुटियों पर सार्वजनिक चर्चा से बचती है। लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती का आधार आत्मसमीक्षा होती है। यदि संसद की आलोचना हो सकती है, सरकार की आलोचना हो सकती है, मीडिया की आलोचना हो सकती है, तो न्यायपालिका भी आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती।

लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा सबक

यह पूरा प्रकरण एक मूल प्रश्न छोड़ जाता है, क्या विलंबित न्याय, न्याय कहलाने योग्य है? यदि चुनाव याचिकाएं दस-दस वर्षों तक लंबित रहेंगी तो मतदाता का अधिकार केवल कागजों में रह जाएगा। यदि अदालतें अपने ही निर्देशों को लागू नहीं करा पाएंगी तो कानून की नैतिक शक्ति कमजोर होगी। यदि लोकतंत्र की रक्षा करने वाली संस्थाएं ही समय पर निर्णय नहीं देंगी तो लोकतंत्र का वास्तविक नुकसान जनता को भुगतना पड़ेगा। यह मामला किसी एक विधानसभा सीट का विवाद नहीं, बल्कि उस प्रश्न का प्रतीक है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी अदालत भी क्या समय के प्रति जवाबदेह है? मद्रास हाईकोर्ट ने जो आईना दिखाया है, उसमें केवल सुप्रीम कोर्ट नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था अपना चेहरा देख सकती है। लोकतंत्र में न्याय देर से नहीं, समय पर मिलना चाहिए क्योंकि देर से मिला न्याय अक्सर न्याय नहीं, उसका मृत्युलेख बन जाता है।

* 2016 चुनाव में 49 वोट से हार घोषित उम्मीदवार 2026 में 103 वोट से विजेता घोषित हुआ।
* मद्रास हाईकोर्ट ने 2019 में पुनर्गणना का आदेश दिया था।
* सुप्रीम कोर्ट ने परिणाम पर रोक लगाकर मामला छह वर्षों तक लंबित रखा।
* विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विवाद को निरर्थक बताया।
* हाईकोर्ट ने इसे न्याय का गंभीर मजाक कहा।
* चुनाव याचिकाओं के छह महीने में निपटारे के कानूनी प्रावधान की याद दिलाई गई।
* मतदाताओं के अधिकारों के हनन को लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बताया गया।
* न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही और आत्मसमीक्षा की बहस फिर से तेज होने की संभावना।

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