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धर्म व अध्यात्म की नगरी काशी में डिजिटल दंगा कराने का चल रहा प्रयोग,एआई से माहौल खराब करने का हो रहा उपयोग

बनारस में नकली तस्वीरों का असली खेल: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सांप्रदायिक ज़हर और उत्तर प्रदेश में शुरू होता डिजिटल दंगों का नया दौर

अचूक संघर्ष वाराणसी। इन दिनों केवल धर्म, राजनीति और आध्यात्मिकता की नगरी नहीं रह गई है। अब यह देश के सबसे खतरनाक वाराणसी/डिजिटल प्रयोगों का मैदान भी बनती जा रही है। पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों और वीडियो की बाढ़ आई जिसने पुलिस और खुफिया एजेंसियों की नींद उड़ा दी। पहली नजर में देखने पर ये तस्वीरें बिल्कुल असली लगती थीं।

कहीं मंदिर के बाहर आगजनी दिखाई गई, कहीं धार्मिक झंडे जलते दिखाए गए, कहीं दो समुदायों के बीच हिंसक टकराव का दृश्य तैयार किया गया। लेकिन जांच में सामने आया कि इन तस्वीरों और वीडियो का वास्तविकता से कोई संबंध ही नहीं था। वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से तैयार किए गए डिजिटल हथियार थे।

वाराणसी पुलिस ने कई मामलों में प्राथमिकी दर्ज की है। साइबर इकाइयों को सक्रिय किया गया है और सोशल मीडिया की निगरानी बढ़ा दी गई है। लेकिन सवाल केवल इतना नहीं है कि तस्वीरें नकली थीं। असली सवाल यह है कि आखिर किस उद्देश्य से इन तस्वीरों को तैयार किया गया और क्यों उत्तर प्रदेश को इस डिजिटल प्रयोग के लिए चुना गया।

जांच एजेंसियों से जुड़े सूत्र बताते हैं कि कई तस्वीरें इतनी पेशेवर तरीके से तैयार की गई थीं कि सामान्य व्यक्ति के लिए असली और नकली में फर्क कर पाना लगभग असंभव था। एक तस्वीर में कथित तौर पर धार्मिक स्थल पर हमला दिखाया गया। दूसरी तस्वीर में आगजनी के बीच धार्मिक नारे लिखे गए। तीसरी में भीड़ को हिंसक रूप में दर्शाया गया। तस्वीरों के साथ भावनात्मक और उत्तेजक भाषा जोड़ी गई ताकि लोगों की प्रतिक्रिया और तेजी से भड़क सके।

दिलचस्प और चिंताजनक बात यह रही कि इन तस्वीरों को फैलाने वाले कई सोशल मीडिया खाते नए बने हुए थे। कुछ खातों ने केवल एक ही प्रकार की सांप्रदायिक सामग्री साझा की। जांच एजेंसियों को शक है कि यह स्वतः चलने वाला अभियान नहीं बल्कि योजनाबद्ध डिजिटल नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। कई खातों के संचालन में स्वचालित तकनीक के इस्तेमाल की भी आशंका जताई जा रही है।
वाराणसी के घाटों और पुराने शहर के इलाकों में रहने वाले लोगों का कहना है कि जब ये तस्वीरें वायरल हुईं तो कुछ समय के लिए वास्तविक तनाव जैसी स्थिति बन गई।

कई लोगों ने बिना पुष्टि किए इन्हें सच मान लिया। कुछ इलाकों में दुकानदारों ने जल्दी दुकानें बंद कर दीं। धार्मिक स्थलों के बाहर भीड़ बढ़ गई और पुलिस को अतिरिक्त गश्त करनी पड़ी। हालांकि प्रशासन ने समय रहते स्थिति संभाल ली, लेकिन इस घटना ने यह साबित कर दिया कि आने वाले समय में दंगे केवल सड़कों पर नहीं बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी शुरू हो सकते हैं।

लखनऊ स्थित साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल तकनीकी सुविधा नहीं रही। यह राजनीतिक और सामाजिक नियंत्रण का नया हथियार बनती जा रही है। पहले फर्जी तस्वीरें बनाने के लिए विशेषज्ञता और समय चाहिए होता था। अब कुछ मिनटों में ऐसा दृश्य तैयार किया जा सकता है जो बिल्कुल वास्तविक लगे।

यही कारण है कि जांच एजेंसियां इस नए खतरे को लेकर बेहद गंभीर हैं।
उत्तर प्रदेश का सामाजिक ढांचा इस तरह के डिजिटल प्रयोगों के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां धार्मिक पहचान मजबूत है, जातीय समीकरण गहरे हैं और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अत्यधिक तीखी है।

ऐसे माहौल में यदि कोई समूह डिजिटल माध्यम से डर, गुस्सा या असुरक्षा फैलाना चाहता है तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता उसके लिए सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है। वाराणसी की हालिया घटनाओं ने इसी आशंका को मजबूत किया है।
कुछ साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल शुरुआत है। आने वाले समय में नकली वीडियो, कृत्रिम आवाजें और यहां तक कि नेताओं के फर्जी भाषण भी सोशल मीडिया पर दिखाई दे सकते हैं। यानी जनता के सामने जो दिखेगा, वह जरूरी नहीं कि सच हो। लेकिन डिजिटल भीड़ के लिए सच और झूठ का अंतर लगातार महत्व खोता जा रहा है।

जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ वायरल तस्वीरों को दूसरे राज्यों और पुराने दंगों की वास्तविक तस्वीरों के साथ मिलाकर प्रस्तुत किया गया। यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनी सामग्री को वास्तविक घटनाओं के साथ जोड़कर अधिक विश्वसनीय बनाने की कोशिश की गई। यही वह तकनीक है जिसे साइबर विशेषज्ञ “भावनात्मक हेरफेर” कहते हैं।

इसका उद्देश्य केवल अफवाह फैलाना नहीं बल्कि लोगों की सामूहिक मानसिकता को प्रभावित करना होता है।
वाराणसी के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है कि यदि इस तरह की सामग्री पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया तो समाज में अविश्वास की खाई और गहरी हो सकती है। उनका कहना है कि अब किसी भी वायरल तस्वीर के बाद लोग पहले प्रतिक्रिया देते हैं और बाद में उसकी सच्चाई जांचते हैं। यही प्रवृत्ति सबसे खतरनाक मानी जा रही है।

राजनीतिक हलकों में भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हो चुकी है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रचार और दुष्प्रचार बड़े पैमाने पर देखने को मिल सकता है। कारण साफ है। एक नकली वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच सकता है और कुछ ही घंटों में राजनीतिक माहौल बदल सकता है।

यही वजह है कि अब राजनीतिक दलों के डिजिटल प्रकोष्ठ पहले से कहीं अधिक सक्रिय हो चुके हैं।

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा कानूनी ढांचा इस नए खतरे से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। किसी तस्वीर को नकली साबित करने में समय लगता है, लेकिन उसके वायरल होने में केवल कुछ मिनट लगते हैं। कई बार जब तक जांच पूरी होती है, तब तक सामाजिक नुकसान हो चुका होता है। यही कारण है कि पुलिस अब केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई नहीं बल्कि पहले से डिजिटल निगरानी बढ़ाने पर जोर दे रही है।

वाराणसी पुलिस के एक अधिकारी ने स्वीकार किया कि सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं बल्कि लोगों की मानसिकता है। यदि लोग बिना सत्यापन के हर तस्वीर और वीडियो पर विश्वास करते रहेंगे तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अफवाहें और तेजी से फैलेंगी। लेकिन वास्तविकता यह भी है कि सोशल मीडिया का पूरा ढांचा ही भावनात्मक प्रतिक्रिया पर आधारित है। जितनी उत्तेजक सामग्री होगी, उतनी तेजी से वह फैलेगी।

इस पूरे घटनाक्रम ने पत्रकारिता के सामने भी नई चुनौती खड़ी कर दी है। पहले पत्रकार को केवल घटना की पुष्टि करनी होती थी। अब उसे यह भी जांचना पड़ता है कि कहीं तस्वीरें और वीडियो तकनीक की मदद से तैयार तो नहीं किए गए। यानी डिजिटल युग में सत्य की जांच पहले से कहीं अधिक कठिन हो चुकी है।

वाराणसी की यह घटना केवल कुछ नकली तस्वीरों का मामला नहीं है। यह उस नए दौर का संकेत है जहां तकनीक का इस्तेमाल समाज को जोड़ने से अधिक तोड़ने के लिए किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश जैसे संवेदनशील राज्य में इसका असर और भी गहरा हो सकता है। क्योंकि यहां हर अफवाह केवल अफवाह नहीं रहती, वह राजनीति, धर्म और समाज की दिशा भी बदल सकती है। और शायद यही कारण है कि बनारस में शुरू हुआ यह डिजिटल खेल अब केवल साइबर अपराध नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने खड़ी एक नई चुनौती माना जा रहा है।

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