
– कांग्रेस आलाकमान के फैसले के पीछे के 5 कारण
– गुटबाजी और किचन पॉलिटिक्स से अलग रहा पार्टी का फैसला
– जमीनी राजनीति और सहयोगी दलों की इच्छा को मिली तवज्जो
– केरलम में यूडीएफ की जीत के हीरो सतीसन को ही मिला सीएम का ताज

नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नीत यूडीएफ की केरलम में जीत जितनी अप्रत्याशित नहीं था, उससे कहीं ज्यादा अप्रत्याशित राज्य के भावी सीएम की घोषणा है। विगत सप्ताह जब नई दिल्ली में केरलम की प्रभारी कांग्रेस महासचिव दीपा दास मुंशी ने वीडी सतीसन को राज्य का भावी सीएम घोषित किया तो बीते 10 दिन से जारी गुटबाजी और पार्टी हाईकमान पर बढ़ते दबाव का अंत हो गया।
केरल में कल तक भावी सीएम के रूप में जिस केसी वेणुगोपाल के पोस्टर-बैनर तक छप गए थे, वे वीडी सतीसन के आगे सीएम की रेस हार गए। कई राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वेणुगोपाल को पार्टी हाईकमान के प्रति अपनी अटूट वफादारी की कीमत चुकानी पड़ी। हालांकि, बाद में मीडिया से बातचीत करते हुए वेणुगोपाल ने कांग्रेस हाईकमान के चुनाव को यह कहते हुए स्वीकार कर लिया कि पार्टी जो हुक्म दे, उन्हें मानना हर कार्यकर्ता का फर्ज है।


वे 5 कारण, जिनमें पिछड़े वेणुगोपाल
1. अलग राजनीति: वीडी सतीसन और केसी वेणुगोपाल दोनों ही यूं तो अपर कास्ट मानी जाने वाली नायर जाति से आते हैं, लेकिन दोनों की राजनीति में बड़ा फर्क यह है सतीसन जहां जमीनी राजनीति करते हैं, वहीं ‘केसी’ और ‘वेणु’ के नाम से कांग्रेस संगठन में पहचाने जाने वाले वेणुगोपाल की राजनीति युवा कांग्रेस से शुरू हुई और राज्य की अलप्पुझा सीट से पहले विधायक और फिर सांसद के रूप में पार्टी आलाकमान से नजदीकी के रूप में आ पहुंची। लेकिन सतीसन केरलम में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष रहे। उन्होंने न केवल राज्य विधानसभा में अपने सवालों से वाम मोर्चे की सरकार को आफत में डाला, बल्कि पूरे प्रदेश में अपनी जमीनी पकड़ बनाई और लोकप्रियता में वेणुगोपाल से आगे निकल गए। आखिरकार, कांग्रेस हाईकमान को भी सतीसन को ही तवज्जो देनी पड़ी।
2. प्रियंका से नजदीकी काम आई: अगर वेणुगोपाल को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का करीबी माना जाता है तो समीसन को पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी का नजदीकी समझा जाता है। केसी वेणुगोपाल का कद तब और ऊंचा उठा, जब उन्होंने 2019 में राहुल गांधी को यूपी में अमेठीक के साथ ही केरल में वायनाड से भी चुनाव लड़ने की सलाह दी। भले ही इसका नतीजा यह रहा कि राहुल अमेठी से तत्कालीन केंद्रीय महिला-बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी से चुनाव हार गए, लकिन वायनाड से जीतकर लोकसभा में आन के बाद केरल में यूडीएफ गठबंधन ताकतवर हो गई। उसने राज्य में 20 में से 19 सीटें जीतीं। माना जाता है कि केरल में कांग्रेस के संगठन में नई जान फूंकने में वेणुगोपाल क बड़ा हाथ रहा। लेकिन हाल के विधानसभा चुनाव में जीत के हीरो सतीसन रहे और यही बात वेणुगोपाल पर भारी पड़ गई। यहां यह भी अहम है कि प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस मामले में सतीसन का खुलकर साथ दिया, जिसके कारण कांग्रेस अध्यक्ष मल्लकार्जुन खड़गे को भी उनके पक्ष में फैसला देना पड़ा।
3. आईयूएमएल सतीसन पर अड़ गई: सतीसन की मजबूत दावेदारी का यही निर्णायक फैक्टर रहा। बीते 10 दिन में केरलम के सीएम पद की दौड़ में रमेश चेन्नीथला, वेणुगोपाल, केरल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के.सुधाकरन और सतीसन तीनों प्रमुख रूप से शामिल थे। तीनों के समर्थकों ने कांग्रेस-यूडीएफ के चुनाव जीतने के बाद से अपने नेताओं को सीएम बनवाने के लिए पूरा जोर लगा दिया था। लेकिन यहां एक फैक्टर को बहुत से राजनीतिक समीक्षकों ने नजरअंदाज किया और वह है आईयूएमएल, यानी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग। कांग्रेस पार्टी के सूत्रों ने बताया कि आईयूएमएल ने बीते दिनों तमिलनाडु में जोसेफ विजय की टीवीके को भी समर्थन दिया है। यही पार्टी केरल में भी कांग्रेस के साथ यूडीएफ की सरकार बनाने के लिए समर्थन में है। बताया जा रहा है कि वीडी सतीसन को आईयूएमएल का समर्थन हासिल था, जो असल में निर्णायक बन गया। कांग्रेस के एक बड़े नेता ने अपना नाम जाहिर न करते हुए बताया कि आईयूएमएल सतीसन के नाम पर अड़ गई थी। अगर कांग्रेस आलाकमान उसकी बात नहीं मानती तो मुमकिन था कि तमिलनाडु में विजय की टीवीके सत्ता को समर्थन वापस भी लिया जा सकता था। ऐसे में 120 विधायकों के साथ सरकार बनाने वाले विजय की सरकार गिर भी सकती थी।
4. किचन कैबिनेट को दी चुनौती : केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्नीथला दोनों ही कांग्रेस आलाकमान के बेहद नजदीकी माने जाते हैं। लेकिन सतीसन ने अपनी मजबूत दावेदारी जताकर राहुल और खड़गे की किचन कैबिनेट को जोरदार चुनौती दी। वही किचन कैबिनेट, जिसे वेणुगोपाल और चेन्नीथला चलाते हैं। इनमें केरल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के.सुधाकरन भी शामिल थे। लेकिन केरलम के युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं और चुने हुए अधिकांश विधायकों का कहना था कि अगर पार्टी को वाम दलों पर 10 साल बाद मिली जीत को बदलाव की दिशा में मोड़ना है तो वीडी सतीसन को आगे बढ़ाना होगा, जो कांग्रेस की गुटबाजी से अलग बिल्कुल नए चेहरे हैं। सतीसन पांच बार से कांग्रेस के विधायक रहे हैं। उनकी पार्टी के संगठन और केरल की राजनीतिक जमीन पर वेणुगोपाल और बाकी के तीन अन्य दावेदारों के मुकाबले कहीं ज्यादा पकड़ है। असल में वेणुगोपाल सीएम की रेस में कहीं थे ही नहीं। उनका नाम राहुल कैंप की ओर से आया, क्योंकि वे केरलम से सांसद और राहुल गांधी के राजनीतिक सलाहकार भी हैं। सतीसन की केरल के अपर कास्ट नायर वोटों पर भी काफी पकड़ है। प्रियंका गांधी ने आखिर में राहुल और खड़गे को समझाया कि अगर भाजपा को केरल में रोकना है तो सतीसन के जरिए राज्य में नायर वोटों को भाजपा के खिलाफ एकजुट करना होगा और यह काम वेणुगोपाल और रमेश चेन्नीथला नहीं कर सकते, क्योंकि दोनों की जमीन पर उतनी पकड़ नहीं है।
5. इसीलिए भी भारी पड़े वीडी सतीशन: वीडी सतीशन 2001 से लगातार परवूर विधानसभा सीट से विधायक हैं। 2021 में उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था और इसके बाद उन्होंने विधानसभा में लेफ्ट सरकार को कई मुद्दों पर घेरा। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, प्रशासनिक विफलता और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों पर उनकी आक्रामक राजनीति ने उन्हें जनता और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय बना दिया। चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने पूरे राज्य में कांग्रेस के लिए जमकर प्रचार किया। उन्होंने राज्य के ताकतवर इसाई समुदाय और चर्च के साथ गहरे संबंध कायम किए। कांग्रेस नेतृत्व को लगा कि सतीशन ऐसा चेहरा हैं जो संगठन, कार्यकर्ताओं और गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर चल सकते हैं। यही वजह रही कि आखिर में उनके नाम पर मुहर लग गई।
क्या होता अगर वेणुगोपाल सीएम चुने जाते?
यह भी कांग्रेस आलाकमान के लिए राज्य के नए नेतृत्व का चुनाव करने की दिशा में एक बड़ा निर्णायक फैक्टर रहा। आलाकमान ने अगर सतीसन की जगह वेणुगोपाल को चुना होता तो उसे दो उपचुनाव लड़ने पड़ते और दोनों में पार्टी को गुटबाजी और भितरघात का सामना करना पड़ता। साथ में आईयूएमएल का विरोध भी झेलना पड़ता। वेणुगोपाल अलप्पुझा से सांसद हैं। सीएम चुने जाने के बाद उन्हें अपनी सांसदी छोड़नी पड़ती और संसदीय उपचुनाव लड़ना पड़ता। वहीं उन्हें अगले 6 माह में केरलम की किसी एक सीट से विधानसभा का चुनाव भी लड़ना पड़ता और दोनों या किसी एक उपचुनाव में पार्टी और संगठन को अगर हार का सामना करना पड़ता तो यह कांग्रेस के लिए एक बड़ी फजीहत होती।




