मोदी की नई तानाशाही, सोशल मीडिया पर अब बोलने की मनाही
आईटी नियमों में बदलाव इसी माह- सख्त पहरे में होगी सोशल मीडिया पर बोलने की आजादी, न मानने पर मीडिया प्लेटफॉर्म्स व पर भी कानूनी शिकंजा

– मेटा, गूगल, इंस्टा और ट्विटर जैसे प्लैटफॉर्म्स को मानना होगा सरकारी आदेश
– केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्रालय का फरमान ही अंतिम होगा
– एआई कंटेंट पर शुरू से आखिर तक जरूरी होगी लेबलिंग
– जो सरकार को पसंद न हो, उसे हटाना जरूरी, वरना होंगे ब्लॉक
– सिविल सोसायटी ने कहा- नए नियम तानाशाही के सिवा कुछ नहीं

नई दिल्ली। केंद्र सरकार इसी महीने के आखिर तक आईटी कानून 2021 में बदलाव की अधिसूचना जारी करेगी। केंद्रीय सूचना-तकनीक विभाग के सूत्रों ने बताया कि संशोधित कानून में सोशल मीडिया पर न्यूज कंटेंट देने वाले यूजर्स पर सरकार की कड़ी निगाह बनी रहेगी। इसका मतलब यह कि इन यूजर्स के किसी भी फेक पोस्ट या अमर्यादित कंटेंट को सरकार सोशल मीडिया से हटा सकेगी।
आईटी मंत्रालय ने संशोधित नियमों का प्रारूप 30 मार्च 2026 को जारी किया था। उस पर मंत्रालय को करीब 7 हजार आपत्तियां आई हैं। 7 मई को इन नियमों पर आपत्ति जताने की प्रक्रिया खत्म होने के बाद अब केंद्र सरकार 30 मई तक संशोधित नियमों को जारी करने जा रही है।


क्या बदलाव होंगे नए नियमों में?
केंद्र सरकार आईटी कानून 2021 के नियम 3(4) को बदलने जा रही है। इस नियम में सोशल मीडिया प्लैटफॉर्मों को सरकारी आदेश, स्पष्टीकरण, निर्देश और मानक संचालन प्रक्रिया को मानना जरूरी कर दया गया है। इसी के आधार पर सरकार उन्हें सेक्शन 79 के तहत कानूनी सुरक्षा दे पाएगी। इसका मतलब यह हुआ कि अगर सरकार को सोशल मीडिया पर कोई खबर या कंटेंट आपत्तिजनक लगता है तो सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को उसे एक निश्चित समयसीमा के तहत हटाना ही होगा। वे इसे मानने से इनकार नहीं कर सकती। अगर वे सरकारी आदेश को मानने से इनकार करती हैं तो आईटी कानून के तहत उन्हें भी मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने दूसरा बदलाव नियम 8(1) में किया है। इस नियम में केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्रालय को किसी कंटेंट को हटाने या यूजर को ब्लॉक करने का आदेश देने के लिए अधिकार संपन्न किया गया है। यानी सूचना-प्रसारण मंत्रालय को यह अधिकार होगा कि वह किसी कंटेंट को सोशल मीडिया से हटवाए या फिर उस यूजर को ब्लॉक कर दे। इसमें खबर और करेंट अफेयर्स से जुड़ी जानकारियां शेयर करने वाले यूजर भी शामिल होंगे। इसके दायरे में डिजिटल मीडिया का कंटेंट भी शामिल होगा। खासकर वे लोग या कंपनियां, जो पब्लिशर के रूप में पंजीकृत नहीं हैं, लेकिन न्यूज कंटेंट शेयर करती हैं। बताया जाता है कि अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार और सूचना उद्योग के भागीदारों के बीच बंद दरवाजे की बैठक में दोनों ही नियमों में बदलाव का भारी विरोध हुआ था और अचूक संघर्ष ने इस संबंध में आपको खबर भी दी थी। मेटा, स्नैपचैट, यूट्यूब और गूगल जैसी बड़ी कंपनियों ने सरकार के इन नियमों का विरोध किया था।
भागीदारों ने जताईं ये चिंताएं
केंद्र सरकार और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म के बीच हुई इस परिचर्चा में दो प्रमुख मुद्दों पर भागीदारों ने चिंताएं जताईं- पहला तो यह कि सरकार मध्यस्थों, यूजर और पब्लिशर के बीच किस तरह से फर्क करेगी और दूसरा क्या सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म के किसी पोस्ट या कंटेंट को नहीं हटाने पर उसे मिली कानूनी सुरक्षा खत्म हो जाएगी ? पहले सवाल में मामला केवल सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म तक ही सीमित नहीं है, क्योंकि डिजिटल न्यूज मीडिया में कंटेंट क्या जाएगा यह प्रकाशक तय करता है। परिचर्चा में यह पूछा गया था कि ऐसे में क्या सरकार पब्लिशर को मध्यस्थ मान लेगी? दोनों सवालों के जवाब में आईटी मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि संशोधित नियमों में केंद्र सरकार ने पब्लिशर और यूजर के बीच अंतर को साफ करने की कोशिश की है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म का कहना था कि उन्हें प्रकाशक के साथ जोड़कर फंसाया न जाए। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई न्यूज पोर्टल गलत, भ्रामक या आपत्तिजनक खबर या कंटेंट प्रकाशित करता है तो सोशल मीडिया पर दिखने वाले उस कंटेंट को हटाने के लिए प्लैटफॉर्म को मजबूर न किया जाए। लेकिन केंद्र सरकार ने बदले हुए नियमों में यह भी साफ कर दिया है कि इस बारे में केंद्रीय सूचना-प्रसारण मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र सर्वोपरि रहेगा और केंद्र इस शर्त को नहीं बदलेगा। हालांकि, व्यंग्यात्मक कंटेंट और पैरोडी को सरकार ने इन नियमों के दायरे से बाहर रखा है।
खुश नहीं है सिविल सोसायटी
इंडस्ट्री के साथ बैठक के फौरन बाद केंद्र सरकार ने संशोधित आईटी नियमों को लेकर सिविल सोसायटी के सदस्यों से भी बात की थी। लेकिन सिविल सोसायटी का कहना है कि केंद्र सरकार गाहे-बगाहे किसी तरह से अपने नियमों को लागू करवाना चाहती है। उसने सिविल सोसायटी की चिंताओं और सवालों के जवाब देना जरूरी नहीं समझा। ऐसे में सिविल सोसायटी ने सरकार के बदले हुए नियमों को सेंसरशिप बताते हुए कहा कि केंद्र ने इस साल फरवरी में एआई और डीपफेक को लेकर जो ढांचा सुझाया था, उसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। सरकारी अधिकारी भी इस बात को मान रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ऐसे सिंथेटिक कंटेंट के मामले में कड़े नियमों में कोई बदलाव करने के मूड में नहीं हैं। केंद्र ने फरवरी में ही साफ कर दिया था कि एआई से बने वीडियो, ऑडियो या ऐसे कंटेंट, जिसे बनाने में कंप्यूटर का उपयोग हुआ है, वे भले ही कितने ही जीवंत लगें, उनका उपयोग एक सीमित मात्रा में ही संभव है। इन्हें कुछ छूट के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इन सभी में यूजर को एआई का लेबल लगाना जरूरी होगा। नए नियमों में इस लेबल को लगातार कंटेंट में स्पष्ट रूप से दिखाना जरूरी होगा, न कि केवल शुरुआत में। वहीं, सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को ऐसे एआई कंटेंट का सोर्स बताना जरूरी होगा।
उक ही साल में आईटी कानून में दो बार बदलाव करने के पीछे सरकार भले ही यह मंशा जता रही हो कि वह अवैध कंटेंट को ही निशाना बनाना चाहती है, लेकिन इस बार भी सरकार पर यह आरोप लग रहे हैं कि इन बदलावों के पीछे उसकी नीयत लोगों को आलोचनाओं से रोकने की ही है। विशेषज्ञों का कहना है कि संशोधित नियम पहले के मसौदे से अलग हैं। पहले प्रस्ताव में हर तरह के एआई से बने कंटेंट को चिन्हित करने की बात थी, लेकिन अब फोकस केवल भ्रामक या गुमराह करने वाली सामग्री पर किया गया है। इससे नियम ज्यादा व्यावहारिक हो गए हैं। एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी है कि यदि सरकार या अदालत किसी डीपफेक सामग्री को हटाने का आदेश देती है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उसे तीन घंटे के भीतर हटाना होगा। पहले यह समय सीमा 36 घंटे थी। नए नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि एक बार एआई लेबल या मेटाडाटा लगा दिए जाने के बाद उसे हटाया या दबाया नहीं जा सकेगा। प्लेटफॉर्म को अवैध, यौन शोषण से जुड़ी या भ्रामक एआई सामग्री को पहचानने और रोकने के लिए ऑटोमेटेड टूल्स का इस्तेमाल करना होगा।




