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प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे एक नम्बर का बेईमान,आईएएस अफसर का गिरा दिया सम्मा

लखनऊ हाईकोर्ट में याचिका स्वीकार, विधानसभा अध्यक्ष व प्रमुख सचिव को नोटिस

  • नियुक्ति, सेवा विस्तार और भर्ती प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
  • प्रदीप दुबे विवाद: विधानसभा के प्रमुख सचिव की नियुक्ति से लेकर कथित भ्रष्टाचार तक, मुख्यमंत्री की चुप्पी पर उठ रहे बड़े सवाल
  •  13 दिसंबर 2009 से 6 मार्च 2012 तक की नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल, अभिलेखों में कथित विरोधाभास।
  •  लखनऊ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अधिकार-पृच्छा याचिका स्वीकार कर विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव को जारी किया नोटिस।
  •  भर्ती प्रक्रिया, सेवा नियमावली में संशोधन, कर्मचारियों के कथित उत्पीड़न और प्रशासनिक निर्णयों की वैधता पर उठे सवाल।
  •  जीरो टॉलरेंस की नीति के बीच मुख्यमंत्री की चुप्पी पर विपक्ष और शिकायतकर्ताओं के निशाने।

लखनऊ/विधानसभा प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे विवाद: नियुक्ति, कथित भ्रष्टाचार और मुख्यमंत्री की चुप्पी—क्या उत्तर प्रदेश की जवाबदेही पर उठ रहे हैं बड़े सवाल? उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव पद पर प्रदीप दुबे की नियुक्ति, उनकी सेवा अवधि, कथित सेवा विस्तार, भर्ती प्रक्रिया, नियमावली में संशोधन तथा प्रशासनिक निर्णयों को लेकर उठे विवाद अब केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रह गए हैं। यह प्रकरण संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, विधि के शासन, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। विशेष रूप से तब, जब मामला अब लखनऊ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच के समक्ष विचाराधीन है और विधानसभा अध्यक्ष तथा प्रमुख सचिव को नोटिस जारी किया जा चुका है।

 

प्रदीप दुबे की नियुक्ति को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोपों के अनुसार, 13 दिसंबर 2009 को डिस्पैच संख्या 67 के माध्यम से उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ली। इसके तुरंत बाद डिस्पैच संख्या 68 के जरिए उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय) बनाया गया और उसी दिन उन्हें अस्थायी रूप से विधानसभा के प्रमुख सचिव का कार्यभार भी सौंप दिया गया।

इसके बाद 11 जनवरी 2011 को जारी एक अधिसूचना के माध्यम से उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के भर्ती संबंधी अधिकार विधानसभा सचिवालय को सौंपे जाने का दावा किया गया। आरोप यह भी है कि इस अधिसूचना पर प्रमुख सचिव संसदीय और प्रमुख सचिव विधानसभा—दोनों पदों पर प्रदीप दुबे के हस्ताक्षर मौजूद हैं, जिससे हितों के टकराव और प्रक्रिया की वैधता पर प्रश्न उठ रहे हैं।

सबसे गंभीर आरोप 6 मार्च 2012 की कथित नियुक्ति को लेकर लगाए गए हैं। उस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की मतगणना चल रही थी और पूरे प्रदेश में आदर्श आचार संहिता लागू थी। आरोप है कि इसी दिन प्रदीप दुबे ने तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर की कथित स्वीकृति के आधार पर स्वयं को प्रमुख सचिव नियुक्त कराया।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिस समय यह आदेश जारी होने का दावा किया गया, उस समय तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष आजमगढ़ में अपने विधानसभा क्षेत्र की मतगणना में व्यस्त थे। इसलिए यह आरोप लगाया जा रहा है कि नियुक्ति प्रक्रिया में फर्जी हस्ताक्षरों का उपयोग किया गया। यदि यह आरोप सही सिद्ध होते हैं तो मामला केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक और संवैधानिक प्रश्न बन सकता है।

इसी क्रम में कथित भ्रष्टाचार तथा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अधिकार क्षेत्र में अवैध हस्तक्षेप के आरोपों को लेकर हजरतगंज कोतवाली तथा प्रयागराज के सिविल लाइंस थाने में शिकायतें और मुकदमा दर्ज कराने के लिए तहरीर दिए जाने का भी दावा किया गया है।

यह विवाद अब न्यायिक जांच के दायरे में आ चुका है। लखनऊ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने विधानसभा के पूर्व सूचना अधिकारी कर्मेश प्रताप सिंह द्वारा दायर अधिकार-पृच्छा (क्वो वारंटो) याचिका स्वीकार करते हुए विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव को नोटिस जारी किया है।

याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह ने न्यायालय में तर्क दिया कि प्रमुख सचिव विधानसभा स्पष्ट रूप से एक सार्वजनिक पद है। इसलिए न्यायालय यह पूछ सकता है कि संबंधित अधिकारी किस वैधानिक अधिकार के तहत इस पद पर बने हुए हैं।

याचिका में यह भी अनुरोध किया गया कि अंतिम निर्णय तक प्रदीप दुबे को प्रशासनिक और आधिकारिक शक्तियों के प्रयोग से रोका जाए ताकि बाद में उनके द्वारा लिए गए निर्णयों की वैधता पर विवाद उत्पन्न न हो।

याचिका में यह आरोप भी लगाया गया है कि प्रदीप दुबे की नियुक्ति और सेवा अवधि से जुड़े सरकारी अभिलेखों में गंभीर विरोधाभास हैं। विभिन्न मंचों पर उनकी नियुक्ति की अलग-अलग तिथियां प्रस्तुत किए जाने का दावा किया गया है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रदीप दुबे की आयु 70 वर्ष से अधिक हो चुकी है, फिर भी बिना किसी स्पष्ट वैधानिक सेवा विस्तार के वे पद पर बने हुए हैं। यदि यह तथ्य न्यायालय में प्रमाणित होते हैं, तो इससे न केवल उनकी नियुक्ति बल्कि उनके द्वारा लिए गए प्रशासनिक निर्णयों की वैधता पर भी प्रश्न उठ सकते हैं।

सुनवाई के दौरान प्रदीप दुबे की ओर से प्रस्तुत एक दलील ने पूरे विवाद को नया मोड़ दे दिया। उनके अधिवक्ता ने न्यायालय में यह तर्क रखा कि प्रमुख सचिव विधानसभा “सार्वजनिक पद” नहीं है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तर्क स्वीकार किया जाता है, तो विधानसभा सचिवालय की प्रशासनिक संरचना, सरकारी वेतन, नियुक्ति संबंधी अधिकार, सार्वजनिक धन के उपयोग और संवैधानिक जवाबदेही पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

याचिकाकर्ता पक्ष की अधिवक्ता रीना एन सिंह का कहना है कि प्रमुख सचिव विधानसभा सचिवालय में भर्ती, प्रशासनिक निर्णय और नीतिगत कार्यों में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। इसलिए इस पद को सार्वजनिक पद न मानना संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत होगा।

याचिका में विधानसभा सचिवालय में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी की भर्तियों में व्यापक अनियमितताओं का भी आरोप लगाया गया है।

दावा किया गया है कि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आदर्श आचार संहिता के दौरान सेवा नियमावली में संशोधन किए गए और उन्हें विधानसभा के पटल पर विधिवत प्रस्तुत नहीं किया गया। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह पूरी भर्ती प्रक्रिया और विधायी कार्यवाही की वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।

विवाद केवल नियुक्ति और भर्ती तक सीमित नहीं है। शिकायतकर्ताओं ने विधानसभा सचिवालय में कर्मचारियों के कथित उत्पीड़न, प्रशासनिक दबाव तथा कुछ मामलों में आत्महत्या जैसी घटनाओं की निष्पक्ष जांच की भी मांग की है।

इन आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण न्यायालय और जांच एजेंसियों द्वारा ही किया जाएगा, लेकिन इतने गंभीर आरोपों का वर्षों तक व्यापक जांच के बिना बने रहना प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।

उत्तर प्रदेश सरकार लगातार भ्रष्टाचार के विरुद्ध “जीरो टॉलरेंस” नीति का दावा करती रही है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध इतने वर्षों से गंभीर आरोप लगाए जा रहे थे और मामला अब उच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है, तो क्या सरकार को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच प्रारंभ नहीं करनी चाहिए थी?

राजनीतिक हलकों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुप्पी को लेकर भी चर्चा तेज है। आलोचकों का कहना है कि यदि सरकार भ्रष्टाचार के प्रति वास्तव में शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाती है, तो इतने गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच स्वतः शुरू होनी चाहिए थी।

शिकायतकर्ताओं का यह भी दावा है कि उन्होंने मुख्यमंत्री, राज्यपाल और प्रधानमंत्री सहित विभिन्न संवैधानिक प्राधिकरणों को शिकायतें भेजीं, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है।

वर्तमान समय में यह पूरा विवाद न्यायिक विचाराधीन है। इसलिए आरोपों की सत्यता और नियुक्ति की वैधता पर अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा।

यदि न्यायालय याचिका में लगाए गए आरोपों को सही मानता है, तो यह उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक फैसला साबित हो सकता है। वहीं यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो संबंधित अधिकारियों को न्यायिक राहत मिलेगी और विवाद का पटाक्षेप होगा।

प्रदीप दुबे प्रकरण अब किसी एक अधिकारी की नियुक्ति का विवाद नहीं रह गया है। यह मामला उत्तर प्रदेश में विधि के शासन, सार्वजनिक पदों की वैधता, भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक उत्तरदायित्व की व्यापक परीक्षा बन चुका है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लखनऊ उच्च न्यायालय ने मामले को सुनवाई योग्य मानते हुए नोटिस जारी कर दिया है। अब पूरे प्रदेश की निगाहें न्यायालय की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह विवाद केवल आरोपों तक सीमित रहता है या फिर उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होता.

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