
– लगातार विदेशी कंपनियां खरीद रही हैं हमारी प्राइवेट कंपनियां
– भारत की प्राइवेट पूंजी का हो रहा है विदेशों में पलायन
– टैक्स छूट और सब्सिडी से कंपनियों का मुनाफा सालाना 130% बढ़ा
– यही पैसा भारत में खपाने की जगह जा रहा है सात समंदर पार
– किसी को भारत में अपना और बच्चों का बेहतर भविष्य नहीं दिख रहा
नई दिल्ली। हॉर्मूज संकट को भारत के लिए आर्थिक आपदा की चेतावनी बताने वाले पीएम नरेंद्र मोदी के दावों को भारत की निजी कंपनियां गलत बताने पर तुली हैं। एक ओर जहां भारत कच्चे तेल के बढ़ते दाम से जुझ रहा है। लोग महंगाई की मार से कराह रहे हैं, वहीं भारत की बड़ी प्राइवेट कंपनियों की शॉपिंग जारी है। भारतीय कंपनियां विदेशों में धड़ाधड़ शॉपिंग कर रही हैं, कंपनियां खरीद रही हैं। उधर, गोदी मीडिया दावा कर रहा है कि भारत में घरेलू मांग घटने से कंपनियों का घाटा बढ़ रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हमारी कंपनियां विदेशों में अरबों डॉलर की डील कर रही हैं। ये कंपनियां भारत में निवेश करने की जगह विदेशों में पैसा लगा रही हैं।
विदेशों में फूंक दिए 18 बिलियन डॉलर

इसी साल अप्रैल के आखिर में सन फार्मा ने न्यूयॉर्क में एक ऑर्गेनोन एंड कंपनी को 11.75 बिलियन डॉलर में खरीदा है। बीते दो दशकों में यह विदेशों में किसी कंपनी का सबसे बड़ा अधिग्रहण माना जा रहा है। यह डील हाल में हुई विदेशी डील में सबसे बड़ी मानी जा रही है। इन डील में टाटा मोटर्स की इटली के ट्यूरिन में कोर्फोजे की 2.35 बिलियन डॉलर की डील, अमेरिका की सिलिकॉन वैली में एआई फर्म एनकोरा को खरीदने की डील और बजाज समूह द्वारा 2025 की शुरुआत में अलायंज एसई के 23% शेयर खरीदने की डील भी शामिल है। डेटा कंसल्टेंसी फर्म ग्रांट थॉर्नटन के आंकड़े बताते हैं कि बीते साल करीब 162 भारतीय कंपनियों ने विदेशों में 18 बिलियन डॉलर पैसा लगाया और कंपनियों की शॉपिंग की। यह बीते साल के मुकाबले 34% ज्यादा है। ग्रांट थॉर्नटन के पार्टनर सुमित अबरोल बताते हैं कि साल 2026 की पहली छमाही में ही यह आंकड़ा 15 बिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है। दो दशक पहले टाटा मोटर्स ने जगुआर लैंड रोवर और कोरस स्टील को खरीदकर तहलका मचा दिया था। उस समय की डील को भारत की ताकत के रूप में पेश किया गया था। लेकिन इस बार की डील कुछ अलग है। आर्थिक मामलों के जानकार कहते हैं कि भारतीय कंपनियां अब रणनीतिक और संचालन संबंधी जरूरतों के कारण विदेशों में शॉपिंग कर रही हैं। उनका कहना है कि साल 2000 के शुरू में भारत का शेयर बाजार खरीदारी का था। विदेशी पैसा खूब आ रहा था। विदेशी कंपनियां भारत के शेयरों में निवेश कर रही थीं।
पैसा कहां से आ रहा है?
लेकिन अब वक्त बदल गया है। विदेशी निवेशक भारत के शेयर बाजार से पैसा निकालकर भाग रहे हैं। चारों ओर बिकवाली का अलम है। टैक्स में मिली छूट का फायदा उठाकर घरेलू क्षेत्र में पैसा लगाने की बजाय निजी कंपनियां विदेशों में पैसा लगाना ज्यादा सुरक्षित मान रही हैं। वह भी तब, जबकि केंद्र मी नरेंद्र मोदी सत्ता उन्हें उत्पादन आधारित सब्सिडी तक दे रही हैं। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन कहते हैं, साल-दर-साल कॉर्पोरेट का मुनाफा करीब 31% की दर से बढ़ रहा है। इसके बाद भी मुनाफे के ढेर पर बैठी देश की टॉप 500 कंपनियां भारत में पैसा नहीं लगा रही हैं। भारत सरकार लगातार निजी कंपनियों को भारत में पैसा लगाने को कह रही हैं, लेकिन ऐसा न करने के पीछे विशेषज्ञों ने एक ही कारण बताया कि देशी कंपनियों का भारत के आर्थिक माहौल से मोह भंग हो चुका है। ऐसे में कंपनियां उन देशों में जा रही हैं, जहां औद्योगिक जमीन मुफ्त हो और कार्यशील पूंजी आसानी से मिल जाए। वे अमेरिका जैसे उन देशों में पैसा लगाना चाहतीं हैं, जहां उनके माल की खपत हो। आर्थिक मामलों के जानकार अब अमेरिका में मुकेश अंबानी के 300 बिलियन डॉलर मूल्य की तेल रिफाइनरी लगाने के प्रस्ताव को अपने दावे की मिसाल मान रहे हैं। वे कहते हैं कि सन फार्मा और रिलायंस इंडस्ट्रीज तो बड़ी मछलियां हैं। लेकिन दर्जनभर छोटी कंपनियां भी विदेशों में शॉपिंग करने निकल पड़ी हैं। जिन कंपनियों की आर्थिक स्थिति मजदूत है और बैंकों से जिन्हें आसानी से लोन मिलने की उम्मीद है, उनमें विदेशी कंपनियां खरीदकर अपना पैसा लगाने का चलन बढ़ गया है।
कंपनियां खरीदो, पैसा लगाओ, मुनाफा कमाओ
भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों को इसलिए भी खरीद रही हैं, क्योंकि वहां फैक्ट्रिया लगाने में सालों बीत जाएंगे। इसके बजाय लगी-लगाई फैक्ट्रियां खरीदकर उनमें पैसा लगाने से उत्पादन और मुनाफे में बढ़ोतरी का फायदा जल्दी मिलने लगता है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि हॉर्मूज से होकर आवाजही के बंद होने और भारत सरकार की इस मामले में निष्क्रियता ने भी कंपनियों का रुख उन देशों की ओर किया है, जहां सप्लाई चेन में ज्यादा रुकावट नहीं है और टैरिफ भी कम है। साफ है कि निर्यात के बजाय भारत सरकार की ओर से आयात को प्रोत्साहन ने भी कंपनयों को हतोत्साहित किया है। बीते 12 साल के राज में भारत की नरेंद्र मोदी सरकार विदेशों में अपने माल को खपाने के लिए नया बाजार ढूंढने में नाकाम रही है। उसकी इस नाकामी का फायदा चीन ने उठाया है, जिसने दक्षिण अमेरिकी देशों और अफ्रीका में नए बाजार को तलाशकर अपने इकोनमी में निर्यात केंद्रित बना दिया है, जबकि भारत लगातार खुद को आयात केंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने में जुटा है। इस तरह की आर्थिक नीतियों से कंपनियों का पलायन नहीं रोका जा सकता।
विदेशों में पैसा लगाना जोखिम का काम
टाटा स्टील ने बड़े जोर-शोर से कोरस स्टील को जरूर खरीदा, लेकिन दशकों बाद भी आज तक टाटा अपने शेयर धारकों को इस खरीद का लाभ नहीं दे सका है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इसे देखते हुए विदेशों में पैसा लगाना भारतीय कंपनियों के लिए जोखिम भरा भी साबित हो सकता है। हाल ही में सन फार्मा ने शॉपिंग के लिए भले ही मोटी रकम चुकाई हो, लेकिन उसमें भी रिस्क है। घरेलू कंपनियों के पलायन को देखते हुए भारत सरकार ने बीते कुछ साल में ईयू, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से ट्रेड डील की है, लेकिन यहां भी एक रुकावट जो आड़े आ रही है- वह है बिरता रुपया। भारत में शिक्षा के गिरते स्तर को देखते हुए नई पीढ़ी ज्यादा से ज्यादा संख्या में विदेशों में पढ़ाई करना चाहती है। वहीं भारत में रोजगार नहीं होने से उनकी इच्छा विदेशों में ही जाकर रोजगार करने की है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत की कॉर्पोरेट कंपनियां अपने पैसों को डॉलर या विदेशी मुद्रा में तब्दील कर बाहर ही बस जाना चाहती हैं। भारत का जॉब मार्केट तकनीकी रूप से पश्चिमी देशों के मुकाबले पिछड़ा हुआ है। लोगों की आय बेहद कम है, जिसके कारण वह अपने जीवनस्तर को बेहतर करने के लिए ज्यादा खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं। इस सोच को हालिया भू-राजनैतिक अस्थिरता ने और भी बढ़ाया है। इसी को देखते हुए आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की कॉर्पोरेट कंपनियां आगे भी ज्यादा मात्रा में विदेशी निवेश कर अपनी जमीन को छोड़ने की कोशिश करेंगी।
ट्रंप सरकार भी पलायन के पक्ष में
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके मंत्रियों ने भारत और भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर लगातार नकारात्मक बयान दिए हैं। अमेरिका के एक मंत्री तो खुलेआम सार्वजनिक मंच से कहा कि उनका देश भारत की इकोनमी को कमजोर करने पर विचार कर रहा है। ऐसे में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जेयी गोर का यह कहना कि इस बार अमेरिका में भारतीय कंपनियों ने रिकॉर्ड 20.5 बिलियन का निवेश किया है, यह दिखाता है कि अमेरिका किस कदर भारतीय कंपनियों के पलायन से खुश है।




