
- जुलाई के तीसरे हफ्ते में बुलाया जा सकता है मॉनसून सत्र
- अभी कानून के विशेषज्ञों से ली जा रही है राय
- टीएमसी के 20 सांसदों का मामला सबसे पेचीदा
- अगर फैसला विवादित हुआ तो कोर्ट जा सकता है विपक्ष

मुंबई। महाराष्ट्र में शिवसेना के बागी सांसदों पर फैसला संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले हो जाएगा। उद्धव ठाकरे की शिवसेना के 9 में से 6 सांसदों ने एकनाथ शिंदे गुट का समर्थन किया है। अभी लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला कानूनी विशेषज्ञों से इस मामले में राय ले रहे हैं। उन्हें तृणमूल कांग्रेस के उन 20 सांसदों का भी फैसला करना है, जिन्होंने पाला बदला है। बिरला ने दोनों दलों के बागी सांसदों से बात कर ली है। इस बीच, आदित्य ठाकरे ने उम्मीद जताई है कि उनकी पार्टी को न्याय जरूर मिलेगा।

डीएमके के बागियों पर भी होगा फैसला
शिवसेना और तृणमूल के अलावा डीएमके के बागी सांसदों ने भी संसद में इंडिया ब्लॉक से अलग बैठने की मांग रखी है। स्पीकर बिरला को इस पर भी फैसला लेना है। बताया जा रहा है कि स्पीकर ने तीनों मामलों में संवैधानिक विशेषज्ञों से उनकी राय मांगी है। विशेषज्ञों की राय मिलते ही स्पीकर अपना फैसला देंगे। मॉनसून सत्र अमूमन जुलाई के तीसरे हफ्ते में शुरू होता है। इस लिहाज से अभी संसद का सत्र शुरू होने में करीब 3 हफ्ते बाकी हैं। इतना समय संसद में पुराने पीठासीन अधिकारियों के फैसलों को समझने के लिए भी काफी होगा। भाजपा के एक आला नेता ने बताया कि पार्टी इस मामले में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती, क्योंकि विपक्ष भाजपा पर तोड़फोड़ करने का आरोप लगा सकता है। भाजपा की कोशिश है कि सांसदों के पाला बदलने का मामला पूरी तरह से स्वैच्छिक लगे। सबसे पेचीदा सवाल डीएमके का है, जिसने कांग्रेस के साथ अपना गठबंधन टूटने के बाद संसद में अलग बैठने की मांग की है। डीएमके इंडिया गठबंधन के साथ नहीं बैठना चाहती। यह पेचीदा मामला इसलिए है, क्योंकि डीएमके के कसी सांसद से पाला नहीं बदला है। स्पीकर को बस, उनके लिए अलग से बैठने की व्यवस्था करनी है। कांग्रेस ने हाल के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आई जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके के साथ हाथ मिलाया है।
स्पीकर के सामने यह हैं पेंच
टूट की शिकार दोनों पार्टियों ने ओम बिरला से दलबदल विरोधी कानून के तहत बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने का आग्रह किया है। विपक्ष का तर्क है कि जब तक पूरी पार्टी के दो-तिहाई सांसदों का किसी अन्य दल में विलय न हो जाए, तब तक उन्हें दसवीं अनुसूची के तहत कानूनी सुरक्षा नहीं मिल सकती। अभी तृणमूल और शिवसेना के साथ जो हुआ है, वह सांसदों के व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से पाला बदलने का मामला है, जो कि दलबदल निरोधक कानून के तहत आता है। तृणमूल कांग्रेस ने बागी सांसदों को अयोग्य साबित करने से जुड़ी 20 याचिकाएं स्पीकर को सौंपी हैं। संकट यह है कि अगर स्पीकर ओम बिड़ला का फैसला विवादित रहा तो विपक्ष इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो भाजपा का समूचा मंसूबा गलत साबित हो सकता है, क्योंकि लोकसभा में संख्या बल के सहारे ही एनडीए सरकार संसद में पिरसीमन बिल और कुछ अहम विधायक भी पेश करने की तैयारी में है। सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने पर उसके लटक जाने का जोखिम है।
फ्लॉप रही महाविकास अघाड़ी की बैठक
उद्धव ने अपने 6 सांसदों की बगावत के बाद महाविकास अघाड़ी की बैठक बुलाई थी, जिसमें शरद पवार के तुतारी गुट के सारे विधायक नहीं पहुंचे। उद्धव ठाकरे ने पूछा कि हम कागजों में भले ही साथ हों, लेकिन हकीकत में नहीं हैं। महाविकास अघाड़ी की एकता सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि अगर गठबंधन सच में साथ है तो यह बात सड़क और सदन के भीतर भी दिखनी चाहिए। इससे साफ है कि कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी एनसीपी (एसपी) के रवैए से खुश नहीं है। उद्धव ठाकरे को लगता है कि उनके संकट के दौर में महाविकास अघाड़ी का कोई साथी उनके साथ खड़ा नजर नहीं आया। बैठक में महाविकास अघाड़ी के 60 में से 37 विधायक ही पहुंचे थे और 23 विधायक शामिल नहीं हुए। गठबंधन के बड़े नेताओं में से भी कोई शरीक नहीं हुआ। एनसीपी (एसपी) के नेता जयंत पाटिल भी नहीं पहुंचे और न ही शरद पवार शामिल हुए।
महाराष्ट्र की राजनीति में उभरते नए समीकरण
महाविवकास अघाड़ी की बैठक में आला नेताओं और विधायकों की गैरमौजूदगी महाराष्ट्र की राजनीति में उभरते नए समीकरणों की ओर साफ इशारा करती है। सूत्रों का कहना है कि उद्धव गुट के बाद अब भाजपा की नजर शरद पवार की एनसीपी की तरफ भी है। ऐसे में शरद पवार पर अपनी घरेलू लड़ाई को सुलझाने का दबाव है, जिसका केंद्र उनकी बहू सुनेत्रा पवार हैं। महाराष्ट्र की डिप्टी सीएम के रूप में सुनेत्रा अपनी ताकत बढ़ाना चाहती हैं। उनका मंसूबा एनसीपी पर पूरा कब्जा करने का है। उधर, उद्धव ठाकरे के 40 विधायकों को शिंदे ने 2022 में अपने साथ मिला लिया था। उसके बाद अब शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसदों ने बगावत कर शिंदे का दामन थाम लिया है। इस तरह शिंदे ने दो बार उद्धव ठाकरे को सियासी झटका ही नहीं दिया, बल्कि उनकी राजनीति को हिलाकर रख दिया है। उद्धव इन सबके पीछे भाजपा और शिंदे को जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन महाविकास अघाड़ी को लेकर उनका गुस्सा इसलिए भी है, क्योंकि जब भी उनकी पार्टी में तोड़फोड़ हुई, अघाड़ी की तरफ से उन्हें वैसा साथ नहीं मिला, जिसकी वे उम्मीद करते थे। शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी के साथ अपना 25 साल पुराना गठबंधन तोड़कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिलाया था। उद्धव ने वैचारिक मतभेद के बाद भी कांग्रेस और एनसीपी से मिलकर सरकार बनाई, लेकिन जब उनकी पार्टी में बगावत हुई तो महाविकास अघाड़ी साथ नहीं खड़ी हुई। एकनाथ शिंदे के बागवत के समय उद्धव ठाकरे अकेले पड़ गए थे, कांग्रेस और शरद पवार नहीं दिखे। इसी तरह जब शिवेसना (यूबीटी) के सांसदों ने अगावत की, तब भी कांग्रेस और शरद पवार उद्धव के साथ नहीं दिखे। यानी कांग्रेस और शरद पवार ने उद्धव का भरोसा बार-बार तोड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, महाविकास अघाड़ी में शिवसेना यूबीटी सबसे कमजोर कड़ी रही है, क्योंकि उद्धव ठाकरे कभी भी अपने पिता बालासाहेबा ठाकरे की विरासत से बाहर नहीं निकल सके। उन्होंने उसी विरासत को वोटों में बदलने की सोची और हर बार नाकामयाब हुए। उन्होंने बाला साहेब ठाकरे के हिंदुत्व से किनारा किया और मराठा राजनीति से अलग होते गए। इसी के कारण पैदा हुए शून्य को विदर्भ की राजनीति से तेजी से भरा। यही हाल एनसीपी का भी हुआ, जो शरद पवार के साए से कभी निकल ही नहीं सकी। जब निकलना चाहा तो पार्टी के दो हिस्से हो गए और अजित पवार उभरकर आए। अब पार्टी की कमान सुनेत्रा पवार के हाथ में है और अब वे पूरी पार्टी को हड़पना चाहती हैं। शिवसेना (यूबीटी) के कई नेताओं को आशंका है कि भविष्य में महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। उद्धव ठाकरे पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव झेल रहे हैं। एक तरफ एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में टूट का असर अब भी दिखाई दे रहा है, तो दूसरी तरफ पार्टी के कुछ सांसदों के बगावती तेवरों ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। उद्धव ठाकरे की लड़ाई अब सिर्फ बीजेपी या शिंदे गुट से नहीं है, बल्कि उन्हें अपने सहयोगियों के बीच भी राजनीतिक स्पेस और सम्मान बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
ध्वस्त हो चुकी महाराष्ट्र की इकॉनमी
शिवसेना (यूबीटी) ने गुरुवार को दावा किया कि 2026-27 के वार्षिक बजट के महज तीन महीने बाद महायुति सरकार द्वारा 97,706.40 करोड़ रुपए की पूरक मांगें पेश करने का कदम महाराष्ट्र के वित्तीय अनुशासन में आई गिरावट को उजागर करता है। पार्टी ने कहा कि सार्वजनिक ऋण लगभग 11 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने, 60,000 करोड़ रुपए के वार्षिक ब्याज बोझ और राज्य के खजाने से मनमाने ढंग से खर्च किए जाने के कारण महाराष्ट्र सरकार की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई है। पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में कहा कि वर्तमान स्थिति उस अर्थशास्त्र के छात्र की तरह है, जो परीक्षा के दौरान अपनी उत्तर पुस्तिका में एक के बाद एक कई अनुपूरक प्रश्न जोड़ता है, और परिणाम घोषित होने पर मुश्किल से उत्तीर्ण हो पाता है। संपादकीय में तर्क दिया गया कि किसी भी सरकार के लिए बजट के तुरंत बाद पूरक मांग बेहद शर्मनाक होता है। “अनुत्पादक गतिविधियों पर अंधाधुंध खर्च के कारण राज्य सरकार की वित्तीय योजना पूरी तरह से पटरी से उतर गई है। इन चार वर्षों के दौरान महायुति सरकार ने लगभग 5 लाख करोड़ रुपए की पूरक मांगें लाने का सिलसिला जारी रखा है। यह बजट से अधिक खर्च का विश्व रिकॉर्ड है।” शिवसेना (यूबीटी) का कहना है कि आवंटन आजकल जानबूझकर मुख्य बजट में छिपाए जाते हैं, और राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूरक मार्गों के माध्यम से हजारों करोड़ रुपए की मांग की जाती है। अगले बजट में पूरे नौ महीने शेष रहते हुए सरकार के राजस्व और व्यय अनुमान पहले तीन महीनों में ही धराशायी हो गए। उन्होंने कहा कि जब महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सत्ता में थी और उसने काफी कम पूरक मांगें रखी थीं, तब मौजूदा सरकार के नेताओं (जो उस समय विपक्ष में थे) ने वित्तीय अनुशासन के पूर्ण पतन का आरोप लगाते हुए उनकी कड़ी आलोचना की थी।
संपादकीय में आगे कहा गया, “आज वही विपक्षी नेता राज्य के मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। उनके कार्यकाल के चार वर्षों में पूरक मांगें 5 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो जाने के बावजूद वह अब इसे वित्तीय अनुशासनहीनता नहीं मानते।”
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने व्यंग्य करते हुए कहा कि पूरक उपलब्धि समर्थक सरकार पूरक मांगों का नया रिकॉर्ड बना रही है और उस राज्य की अर्थव्यवस्था को सार्वजनिक रूप से अपमानित कर रही है जो कभी अपनी वित्तीय अनुशासन के लिए प्रसिद्ध था। सरकार खुलेआम उस राज्य की आर्थिक विरासत को नष्ट कर रही है जिसे कभी वित्तीय ईमानदारी के लिए सम्मान दिया जाता था।



