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भारत में अब चलेंगे अदानी-अंबानी के नोट, आम जनता को नोटबंदी जैसी चोट,

रिजर्व बैंक ने कर दिया ऐलान, क्या है मोदी सरकार का पूरा प्लान?

  •  भारत में बढ़ रहा है डिजिटल लेन-देन
  •  10 और 20 रुपए के छोटे नोटों की घटती मांग से छपाई लागत भी कम
  •  फिर भी पॉलिमर नोट चलाने के पीछे मकसद अंबानी और अदानी के पेट्रोकेम कारोबार को बढ़ाना
  •  रिजर्व बैंक ने कहा- प्लास्टिक के नोट चलाने से पहले करेंगे टेस्ट
  •  गुजरात के मुंद्रा में 45 हजार करोड़ का पेट्रोकेम प्लांट लगा रहे हैं अदानी

नई दिल्ली। भारत की डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अब धीरे-धीरे अदानी और अंबानी पर पूरी तरह से समर्पित होने जा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को देश में पॉलिमर के बने नोटों को चलाने का ऐलान कर नोटबंदी जैसी हालत पैदा कर दी है। प्लास्टिक के ये नोट शुरुआती चरण में 10 और 20 रुपए के कागजी नोटों की जगह लेंगे। केंद्र की पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने 2012 में पॉलिमर के नोट चलाने की योजना बनाई थी, लेकिन व्यावहारिक और तकनीकी कारणों से योजना रद्द कर दी गई। अब केंद्र की मोदी सरकार ने नोटों की छपाई की बढ़ती लागत का बहाना बनाकर पॉलिमर नोटों को लाने का मन बना लिया है।

क्या कहा है रिजर्व बैंक के गवर्नर ने

रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को बताया कि पॉलिमर नोटों को लाने का प्रस्ताव अभी शुरुआती चरण में है। आरबीआई इसके संभावित फायदों और चुनौतियों का आकलन कर रहा है। आरबीआई की मौद्रिक नीति की घोषणा के बाद गवर्नर मल्होत्रा ने कहा- हम इसके फायदे और नुकसान की जांच कर रहे हैं और यह भी देख रहे हैं कि इसे लागू करना फायदेमंद होगा या नहीं। यह अभी शुरुआती चरण में है। जानकारी के मुताबिक कागजी नोटों की छपाई की अधिक लागत और बेकार होने वाली मुद्रा की बढ़ती मात्रा के कारण पॉलीमर विकल्प पर विचार किया जा रहा है। बता दें कि एक दशक पहले भी इस तरह की करेंसी नोट लाने की चर्चा हुई थी। यूपीए सरकार की 2012 की योजना को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार ने फरवरी 2014 में संसद को सूचित किया था कि भौगोलिक और जलवायु संबंधी विविधता के आधार पर चुने गए पांच शहर- कोच्चि, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर में ट्रायल के तौर पर 10 रुपए के एक अरब पॉलीमर नोट जारी किए जाएंगे। हालांकि, तकनीकी और परिचालन संबंधी चुनौतियों के कारण बाद में इस पहल को रोक दिया गया था।

तो अब क्या जरूरत आन पड़ी?

भारत में 10 रुपए का नोट छापने की लागत लगभग 96 पैसे से ₹1.01 तक आती है। वहीं, 20 रुपए का नोट छापने की लागत लगभग 95 पैसे से ₹1.00 तक बैठती है। कुल दैनिक लेन-देन में इन छोटे नोटों की मांग अत्यधिक है, जिसके कारण ये बहुत तेजी से घिसते और फटते हैं। केंद्र सरकार की दलील है कि कागज और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयात की जाने वाली महंगी सामग्रियों की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। छोटे मूल्य के नोट (10 और 20 रुपए) आम जनता के हाथों में बहुत ज्यादा घूमते हैं। नमी, गंदगी और अत्यधिक उपयोग के कारण ये बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं, जिससे इन्हें बार-बार नया छापना पड़ता है। भारत में डिजिटल लेन-देन के जोर पकड़ने के बाद से करेंसी नोट प्रिंट करने में होने वाला आरबीआई का खर्च घटा है। वित्त वर्ष 2025-26 में इस खर्च में 23.5 फीसदी की कमी आई है। यह घटकर 4,875.2 करोड़ रुपये रह गया। यही इसके पिछले साल 6,372.8 करोड़ रुपये था। नोटों की छपाई का ऑर्डर कम मिलने से ऐसा हुआ। यानी भारत में करेंसी नोटों की छपाई का खर्च घट रहा है। ऐसे में रिजर्व बैंक का यह बहाना कतई नहीं चल सकता कि सरकार के लिए छाटे करेंसी नोट छापना महंगा पड़ रहा है।

 

क्या डिजिटल लेन-देन नाकाम रहा?

भारत में डिजिटल लेन-देन ने पिछले तीन वर्षों (वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25) में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की है। कुल डिजिटल भुगतान लेनदेन की संख्या वित्त वर्ष 2022-23 में 13,462 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में 23,834 करोड़ हो गई है। इस दौरान कुल लेनदेन का मूल्य 4,580 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। इसका मतलब यह हुआ कि लोगों में ऑनलाइन यूपीआई पेमेंट और डिजिटल लेन-देन का चलन लगातार बढ़ रहा है। भारत के कुल डिजिटल भुगतानों में यूपीआई की हिस्सेदारी सबसे अधिक (लगभग 80% से 90%) है। मई 2026 तक, यूपीआई ने अकेले मासिक स्तर पर 22.35 बिलियन (2,235 करोड़) से अधिक लेनदेन को पार कर लिया है। वर्तमान में, हर दिन औसतन 75 करोड़ से अधिक यूपीआई लेनदेन होते हैं। इन डिजिटल भुगतानों में 50 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता और 6.5 करोड़ से अधिक व्यापारी शामिल हैं। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 के दौरान लगभग 23.8 अरब गंदे और क्षतिग्रस्त नोट वापस लिए गए, जबकि वित्त वर्ष 2024 में यह संख्या 21.24 अरब थी। यानी एक साल में इसमें 12.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वापस लिए गए नोटों में सबसे अधिक 500 रुपये और उसके बाद 100 रुपये के नोट शामिल रहे। इससे साफ है कि वापस किए जा रहे नोटों में अभी 100 रुपए और 500 रुपए के नोट ही ज्यादा हैं। लेकिन सरकार 10 और 20 रुपए की छोटी मुद्राओं को पॉलिमर में बदलना चाहती है। ऐसे में बजाय इसे और बढ़ावा देने के, केंद्र की मोदी सरकार पॉलिमर नोट क्यों लाना चाहती है?

 

असली वजह तो अदानी और अंबानी हैं

भारत में पॉलिमर नोट बनाने के लिए फिलहाल एक ही केमिकल प्लांट मुकेश अंबानी का जामनगर में बना हुआ है। अब गौतम अदानी का भी एक पेट्रोकेमिकल प्लांट इसी साल दिसंबर में गुजरात के मुंद्रा में 35 हजार करोड़ रुपए की लागत से बनने जा रहा है। इससे 6 महीने पहले ही भारतीय रिजर्व बैंक का देश में पॉलिमर नोट चलाने का ऐलान सवाल खड़े करता है। रिजर्व बैंक ने जून 2026 में पॉलीमर नोटों के पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा की और दिसंबर में अदानी का पीवीसी प्लांट चालू हो रहा है। इन नोटों के लिए पीवीसी ग्रेड के पॉलीमर की जरूरत होगी और मुंद्रा में अदानी उसी श्रेणी का 45 हजार करोड़ का पेट्रोकेम क्लस्टर बना रहा है। भारत में पीवीसी ग्रेड के पॉलीमर की मांग बीते 3 वर्षों में 6.2% से 6.5% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़कर 4.7 मिलियन मीट्रिक टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा पीवीसी खरीदार और आयातक देश बन चुका है। भारत में कुल पीवीसी रेजिन की मांग 4.75 मिलियन मीट्रिक टन दर्ज की गई, जिसमें पिछले वर्ष की तुलना में 10% से 11% की वार्षिक वृद्धि देखी गई है। औद्योगिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह मांग लगातार मजबूत बनी हुई है और आने वाले समय में इसके तकरीबन 8% सालाना की दर से बढ़कर 5.5 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है। भारत में पीवीसी ग्रेड के पॉलीमर (पॉलीविनाइल क्लोराइड) का उत्पादन करने वाली सबसे मुख्य और सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड है। रिलायंस अपने ‘रिऑन’ ब्रांड के तहत विभिन्न ग्रेड के पीवीसी रेज़िन का भारी मात्रा में उत्पादन करती है। अब इसमें अदानी के पेट्रोकेम प्लांट का भी नाम जुड़ने वाला है। ऐसे में अंबानी और अदानी दोनों के प्लांट में से निकलने वाले पॉलिमर की घरेलू खपत के लिए केंद्र की मोदी सरकार को देश में पॉलिमर नोट चलाने की बड़ी जरूरत है। रिजर्व बैंक के शुक्रवार के ऐलान के पीछे मुख्य मकसद यही है।

बढ़ेगी महंगाई और घटेगा विकास- रिजर्व बैंक

शुक्रवार को मौद्रिक नीति समिति की बैठक में के बाद आरबीआई ने देश की आर्थिक वृद्धि को सहारा देने और कमजोर होते रुपये को संभालने के बीच अपनी नीतिगत ब्याज दरों को 5.25% पर बरकरार रखा है। वहीं जीडीपी ग्रोथ में गिरावट का अनुमान जताया है। वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर के अनुमान को बढ़ा दिया है। अप्रैल की बैठक में इसके 4.6% रहने का अनुमान जताया गया था, जिसे अब बढ़ाकर 5.1% कर दिया गया है। आरबीआई ने वित्तीय वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है।

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