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कानून का रखवाला ही कानून का निकाल रहा दिवाला

जब न्याय की मांग करने वाली महिलाओं की आवाज पर सवाल उठने लगें

बलिया/लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत न्याय, संविधान और कानून का शासन है। जब कोई महिला न्याय की उम्मीद लेकर प्रशासन, पुलिस या न्यायालय का दरवाजा खटखटाती है, तब उसकी शिकायत का उत्तर तथ्यों और कानून से दिया जाना चाहिए, न कि व्यक्तिगत टिप्पणियों या सार्वजनिक आरोपों से।

हाल के दिनों में जनपद मऊ का एक प्रकरण लगातार चर्चा में है। इस मामले में शिकायतकर्ता द्वारा अधिवक्ता प्रमोद कुमार पालीवाल एवं उनके परिवार के कुछ सदस्यों के विरुद्ध विभिन्न गंभीर शिकायतें पुलिस, प्रशासन और अन्य सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत की गई हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।

इसी प्रकरण के दौरान मेरे विरुद्ध भी सार्वजनिक मंचों एवं सोशल मीडिया पर टिप्पणियां की गईं। मुझे “डिजिटल क्रिएटर” कहकर मेरी पत्रकारिता और सामाजिक कार्यों पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास किया गया। मेरा मानना है कि किसी पत्रकार या समाजसेवी का मूल्यांकन उसके कार्यों से होना चाहिए, न कि सोशल मीडिया प्रोफाइल पर लिखे किसी तकनीकी शब्द से।

शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि अधिवक्ता प्रमोद कुमार पालीवाल तथा उनके परिवार के कुछ सदस्यों के आचरण के संबंध में जो शिकायतें की गई हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि किसी महिला ने अपने साथ अभद्र व्यवहार, धक्का-मुक्की या अन्य अनुचित आचरण के आरोप लगाए हैं, तो ऐसे मामलों में जांच ही सत्य तक पहुंचने का उचित माध्यम है।

यह भी चर्चा का विषय है कि प्रमोद कुमार पालीवाल लंबे समय तक सरकारी अधिवक्ता के रूप में कार्यरत रहे। यदि किसी नागरिक को उनके सार्वजनिक दायित्व के दौरान किए गए कार्यों के संबंध में प्रश्न हैं, तो सूचना के अधिकार अधिनियम और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना तथा सक्षम अधिकारियों से समीक्षा की मांग करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। ऐसी किसी भी समीक्षा का निष्कर्ष केवल संबंधित प्राधिकारी ही निकाल सकते हैं।

मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं है। मेरा आग्रह केवल इतना है कि प्रमोद कुमार पालीवाल से संबंधित शिकायतों सहित पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच हो। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो, और यदि आरोप असत्य सिद्ध होते हैं तो वह भी स्पष्ट रूप से सामने आए।

आज आवश्यकता व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि कानून के सम्मान की है। महिला सुरक्षा केवल सरकारी नारा नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। यदि कोई महिला या पत्रकार स्वयं को असुरक्षित महसूस करता या करती है, तो उसकी शिकायत को गंभीरता से सुनना और निष्पक्ष जांच करना राज्य का दायित्व है।

मैं उत्तर प्रदेश शासन, जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, बार काउंसिल तथा अन्य सक्षम संस्थाओं से आग्रह करती हूं कि प्रमोद कुमार पालीवाल एवं उनके परिवार के संबंध में शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों तथा पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराई जाए। जांच से जो भी तथ्य सामने आएं, उन्हीं के आधार पर विधिसम्मत कार्रवाई की जाए।

अंततः, किसी भी लोकतांत्रिक समाज की शक्ति व्यक्ति-विशेष नहीं, बल्कि कानून की सर्वोच्चता होती है। न्याय तभी सार्थक होगा जब हर शिकायत को निष्पक्ष रूप से सुना जाएगा, हर पक्ष को अवसर मिलेगा और निर्णय केवल साक्ष्यों एवं कानून के आधार पर होगा।

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