मोदी का सीआईए के साथ कनेक्शन या कन्फ्यूजन,विपक्ष ने पूछा, गम्भीर क्वेश्चन
भारत को अमेरिका की मर्जी से चलाने की ट्रेनिंग ले आए मोदी और उनके 150 अफसर?

- अमेरिकी विदेश मंत्रालय के बयान से मचा बवाल, विपक्ष ने पूछे कड़े सवाल
- अमेरिकी विदेश मंत्रालय की वरिष्ठ अधिकारी बेथनी मॉरिसन ने की पुष्टि
- 1993 में मोदी ने की थी अमेरिका की यात्रा, तीन बार ट्रेनिंग लेने गए
- 3 मंत्री और 150 प्रशासनिक अफसर भी ट्रेनिंग लेकर आए
- भारत की जनता से आज तक यात्राओं के मकसद को छिपाया गया
- यात्राओं का सारा खर्च अमेरिका ने उठाया, भारत की मीडिया ने दबाया

नई दिल्ली। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के इस बयान पर कि 1993 में नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी सरकार के पैसे पर एक लीडरशिप प्रोग्राम के तहत अमेरिका की यात्रा की थी, पूरे देश में इस बात पर बहस छिड़ गई है कि भाजपा ने अभी तक इस यात्रा पर इतने लंबे समय तक चुप्पी क्यों साधे रखी? इस यात्रा का मकसद क्या था? अमेरिकी विदेश मंत्रालय की वरिष्ठ अधिकारी बेथनी मॉरिसन के अनुसार, इस यात्रा में केवल नरेंद्र मोदी ही नहीं, बल्कि वर्तमान मोदी सरकार के 3 कैबिनेट मंत्री और लगभग 150 भारतीय नौकरशाह भी अमेरिका गए थे।
ये यात्राएं अमेरिकी सरकार के विभिन्न एक्सचेंज कार्यक्रमों, जैसे ‘इंटरनेशनल विजिटर लीडरशिप प्रोग्राम’ का हिस्सा थीं। इसका मकसद विदेशी नेताओं और अधिकारियों को अमेरिका की शासन-व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और संस्थागत ढांचे से परिचित कराना था।

मोदी ने 3 यात्राएं कीं
इस पूरे विवाद में दो अहम सवाल पैदा होते हैं। पहला सवाल यह कि भारत के राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को अमेरिका की शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और संस्थागत ढांचों से क्या लेना-देना है? उनके लिए इस बारे में ट्रेनिंग के क्या मायने हो सकते हैं? उन्हें भारतीय शासन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की जानकारी होनी चाहिए, न कि अमेरिका की। यही पर आकर अमेरिकी लीडरशिप प्रोग्राम विवाद का विषय बन जाता है, क्योंकि इसमें पहली बात तो विपक्ष के नाम पर केवल भाजपा और आरएसएस से जुड़े नेताओं का चुनाव हुआ, दूसरा भारत के प्रशासनिक अधिकारियों को भी इस प्रोग्राम में चुना गया था। दूसरा सबसे अहम सवाल इस तरह की अमेरिकी फेलोशिप प्रोग्राम की चुनाव प्रक्रिया है। क्या अमेरिका युवा भारतीयों में लीडरशिप विकसित करने के लिए केवल एक दल विशेष के लोगों को ही चुनता है, जो सत्ता से बाहर हों? अगर ऐसा है तो फिर अमेरिका के इस कार्यक्रम को लेकर ही कई गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। अमेरिका ने आज तक किसी कांग्रेसी, समाजवादी पार्टी, दक्षिण भारत के दलों और पूर्वी भारत के युवा नेताओं को क्यों नहीं बुलाया? क्या उनमें नेतृत्व विकास की अमेरिका को कोई भी संभावना नहीं दिखीं? अब भारत में विपक्षी दल यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर भारत के किस कानून के तहत देश चलाने के लिए जिम्मेदार 150 प्रशासनिक अफसरों को अमेरिका में वहां की प्रशासनिक, आर्थिक व्यवस्था और संस्थागत प्रक्रियाओं के बारे में ट्रेनिंग दिलवाई गई? खासकर नरेंद्र मोदी ने आखिरी बार 1999 में अमेरिका की यात्रा की और उनकी भारत वापसी के दो साल बाद गुजरात में केशुभाई पटेल को अचानक सीएम पद से हटाकर मोदी को सीएम बना दिया गया?
क्या मोदी इसीलिए अमेरिका भक्त हैं?
कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कटाक्ष करते हुए कहा कि सुप्रिया श्रीनेत ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से एक वीडियो और पोस्ट शेयर करते हुए दावा किया कि बेथनी मॉरिसन ने खुलासा किया है कि 1993 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तब भाजपा कार्यकर्ता), तीन वर्तमान कैबिनेट मंत्री और लगभग 150 भारतीय सिविल अधिकारी अमेरिकी सरकार द्वारा प्रायोजित एक्सचेंज कार्यक्रमों के तहत अमेरिका गए थे। श्रीनेत ने पूछा है कि क्या यही है मोदी की अमेरिका भक्ति?
क्या अमेरिका ने मोदी को सीएम बनाया?
यूथ कांग्रेस के उदय भानु छिब कहते हैं, आप सबने नरेंद्र मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले की पुरानी तस्वीरें ज़रूर देखी होंगी जिनमें वे अमेरिका के दौरे पर नज़र आते हैं। एक तस्वीर में तो वे व्हाइट हाउस के बाहर भी खड़े दिखाई देते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नरेंद्र मोदी का पहला अमेरिका दौरा 1993 में हुआ। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के 3 दौरे और किए। मोदी का आख़िरी अमेरिकी दौरा 1999 में हुआ जहां उन्होंने कथित तौर पर ट्रेनिंग भी ली थी। ये ट्रेनिंग किस विषय की थी, किसने दी, कहां दी- इस बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। गौरतलब बात ये है कि इस इस दौरे पर ट्रेनिंग लेने के तुरंत बाद 2001 में रहस्यमय तरीके से गुजरात के मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल का इस्तीफ़ा ले लिया गया जो कि भाजपा को गुजरात में बहुमत दिलवाकर लाए थे। केशुभाई पटेल की जगह कई सीनियर नेताओं को दरकिनार करके नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया, जो उस समय विधायक तक नहीं चुने गए थे। नरेंद्र मोदी के शपथ लेते ही कुछ महीने के अंदर अंदर गुजरात में दंगे करवाए गए। वही दंगे, जिन पर अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वयं मीडिया के सामने नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह दे दी थी।
यह है अमेरिका के आगे सरेंडर होने का राज !
उदय भानु छिब ने अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर लिखा है कि आज जब हम प्रधानमन्त्री के रूप में नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर बड़े सवाल उठते हैं। सारे प्रोटोकॉल तोड़ते हुए, सभी नियमों को ताक़ पर रखते हुए नरेंद्र मोदी ने ट्रम्प के चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया। भारत की नीतियों की बलि चढ़ाते हुए ट्रम्प ने भी जमकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए प्रचार किया। इसके बाद मोदी सरकार अमेरिका के आगे हर मुद्दे पर सरेंडर करती हुई नज़र आती हैं। चाहे वो टैरिफ़ लगाने का मामला हो, अदानी के केस का मामला हो, अमेरिका द्वारा भारतीयों को बेड़ियों में बांधकर वापस भेजने का मामला हो, किसान विरोधी ट्रेड डील हो, ऑपरेशन सिंदूर हो, या अमेरिका द्वारा 3 भारतीय नाविकों की हत्या का मामला हो, नरेंद्र मोदी हर मामले में ऐतिहासिक रूप से अमेरिका के आगे झुके हुए दिखाई दिए हैं। एक के बाद एक मौक़े पर नरेंद्र मोदी वही करते दिखाई दिए हैं, जो जो अमेरिका चाहता गया है। ऊपर बताए हुए किसी भी मामले में नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के सामने भारत का स्टैंड नहीं रखा। हमेशा एक दब्बू प्रधानमंत्री बनकर अमेरिका की जी-हुजूरी में लगे रहे हैं और अमेरिका के पक्ष में भारत के हितों को सूली चढ़ा दिया। हाल ही में ट्रम्प ने कहा भी था कि पहले के प्रधानमंत्रियों के शासन में अमेरिका को नुक़सान होता रहा, लेकिन जब से उनके परम मित्र मोदी आए हैं, तब से अमेरिका को फायदे पहुंचाए जा रहे हैं।
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है
प्रताप भानु छिब आगे लिखते हैं कि अमेरिका के पास मोदी के बारे में ऐसा क्या है कि उसने कठपुतली की तरह अपने इशारों पर नचाया हुआ है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प कहते हैं कि वो एक झटके में नरेंद्र मोदी का राजनैतिक कैरियर खत्म कर सकते हैं, तो वो ऐसे ही नहीं बोल रहे। ज़रूर कुछ ना कुछ ऐसा है जो पूरी दुनिया से छुपाया हुआ है अमेरिका ने, ज़रूर कोई न कोई फाइल है जो अमेरिकी सरकार या उनके ख़ुफ़िया विभाग सीआईए के पास है। वरना हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री को कोई देश झुका दे दुनिया में, यह संभव ही नहीं है। अब अमेरिका सरकार की एक उच्च अधिकारी ने बताया है कि नरेंद्र मोदी उस प्रोग्राम का हिस्सा थे जो अमेरिकी सरकार द्वारा संचालित है और वो “मिशन इंडिया” का अहम हिस्सा रहे हैं। गौरतलब है कि अमेरिका और सीआईए इस तरह के अभियान चलाने में कुख़्यात रहा है। दूसरे देशों में अपने कठपुतली राष्ट्राध्यक्ष बैठाना, चुनावों को प्रभावित करके सत्ता में हस्तक्षेप करना जैसे कामों में सीआईए को महारथ हासिल है। नरेंद्र मोदी और भाजपा को उनके विदेश दौरों की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, देश को पता होना चाहिए कि नरेंद्र मोदी ने अमेरिका में किस संस्था के साथ ट्रेनिंग ली, कैसी ट्रेनिंग थी? उनका अमेरिका के साथ क्या रिश्ता है? अमेरिका के सामने घुटने क्यों टिके रहते हैं नरेंद्र मोदी के? अमेरिका की ख़ुशामद के चक्कर में भारत के हितों को कैसे दांव पर लगा सकते हैं नरेंद्र मोदी?




